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शरद पूर्णिमा विशेष-सोलह कलाओं से पूर्ण भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला से जुड़ी है पावन रात्रि

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मां लक्ष्मी की आराधना और ऋणमुक्ति की कामना का विशेष पर्व

शरद पूर्णिमा की चाँदनी में बरसेगी अमृतमयी आभा, घर-घर बनेगी खीर और मावा के लड्डू

मावा के लड्डुओं का दान कर महिलाएं निभाती हैं सदियों पुरानी परंपरा, आस्था के आगे मावा के भाव भी पड़े फीके

कमल याज्ञवल्क्य बरेली रायसेन

भारतीय वैदिक एवं सनातन परंपरा में शरद पूर्णिमा का पर्व आध्यात्मिक साधना, श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं, चंद्रमा की शीतल चांदनी और मां लक्ष्मी की आराधना का अनुपम संगम माना जाता है। वर्षा ऋतु की विदाई और शरद ऋतु के आगमन के बीच आने वाली यह पूर्णिमा प्रकृति की निर्मलता, मन की शांति और धार्मिक आस्था का विशेष संदेश देती है। इस पावन अवसर पर घर-घर में खीर बनाने, भगवान को भोग लगाने, रात्रि में चंद्रमा की पूजा करने तथा प्रसाद ग्रहण करने की परंपरा निभाई जाती है। रायसेन जिले के ग्रामीण अंचलों में भी शरद पूर्णिमा को लेकर विशेष उत्साह और श्रद्धा का वातावरण है। यद्यपि कुछ क्षेत्रों में रविवार को शरद पूर्णिमा मनाई जा रही तो कहीं कहीं सोमवार को भी शरद पूर्णिमा मनाई जाने की खबरें हैं। यहाँ शाम पांच बजे से शरद पूर्णिमा उत्सव के कार्यक्रम शुरू हो जाएंगे, जो रातभर चलेंगे।

चंद्रमा की सोलह कलाएं और अमृतमयी चांदनी की मान्यता

हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस रात्रि चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होकर अपनी शीतल चांदनी से धरती को आलोकित करता है। लोकपरंपरा में इस चांदनी को अमृतमयी माना गया है। यही कारण है कि शरद पूर्णिमा की रात खुले आकाश के नीचे खीर रखने और अगले दिन उसे प्रसाद स्वरूप ग्रहण करने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है।परिवारों में दूध, चावल और मेवे से खीर तैयार की जाती है। रात्रि में भगवान को भोग अर्पित करने के बाद खीर को चंद्रमा की रोशनी में रखा जाता है। श्रद्धालु इसे भगवान की कृपा और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता के प्रतीक के रूप में देखते हैं। धार्मिक आस्था के अनुसार, चंद्रमा की शीतल किरणों में रखे इस प्रसाद को ग्रहण करना शुभ और कल्याणकारी माना जाता है।

भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला से जुड़ी है पावन रात्रि

शरद पूर्णिमा का श्रीमद्भागवत महापुराण की परंपरा में विशेष महत्त्व है। भागवत के दशम स्कंध में वर्णित शरद ऋतु की रात्रि में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोपियों के साथ की गई महारास लीला भक्ति, प्रेम और परमात्मा के साथ जीव के आध्यात्मिक मिलन का प्रतीक मानी जाती है।वैष्णव परंपरा में भगवान श्रीकृष्ण को पूर्ण पुरुषोत्तम तथा सोलह कलाओं से पूर्ण परमात्मा के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की निर्मल चांदनी में संपन्न महारास लीला ने भक्ति साहित्य और भारतीय लोकसंस्कृति को गहराई से प्रभावित किया है। इसीलिए अनेक स्थानों पर रासलीला, भजन-कीर्तन, श्रीकृष्ण पूजन और धार्मिक प्रवचनों का आयोजन किया जाता है। ईश्वर के प्रति निष्काम प्रेम, समर्पण और श्रद्धा ही सच्ची भक्ति का आधार हैं।

मां लक्ष्मी की आराधना और कोजागरी पूर्णिमा का महत्त्व

शरद पूर्णिमा को अनेक क्षेत्रों में कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है। लोकमान्यता के अनुसार, इस रात्रि मां लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और जागरण करने वाले श्रद्धालुओं पर अपनी कृपा बरसाती हैं। ‘को जागर्ति’ अर्थात ‘कौन जाग रहा है’ की मान्यता से इस पर्व का नाम कोजागरी प्रचलित हुआ है। इस अवसर पर श्रद्धालु दीप प्रज्वलित करते हैं और मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना कर सुख, समृद्धि, शांति तथा परिवार की मंगलकामना करते हैं। पूजा में स्वच्छता, सात्त्विकता, श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार दान का विशेष महत्त्व माना जाता है।

ऋण मुक्ति के लिए विशेष है शरद पूर्णिमा

धार्मिक परंपरा में शरद पूर्णिमा को ऋणमुक्ति की कामना के लिए भी विशेष माना गया है। श्रद्धालु मां लक्ष्मी से आर्थिक संकट दूर होने, परिश्रम का उचित फल मिलने और जीवन में स्थिर समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। हालांकि, ऋण से मुक्ति के लिए पूजा के साथ विवेकपूर्ण आर्थिक व्यवहार, नियमित बचत और समय पर भुगतान का प्रयास भी आवश्यक है।

महिलाओं की विशेष आस्था, व्रत-पूजन और मावा के लड्डुओं का दान

रायसेन जिला सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में शरद पूर्णिमा के अवसर पर महिलाओं की धार्मिक आस्था का विशिष्ट स्वरूप देखने को मिलता है। परंपरानुसार अनेक महिलाएं व्रत रखती हैं, तुलसी के पौधे के समीप ही आसन पर लड्डू गोपाल को विराजमान करके दीप प्रज्वलित कर भगवान का स्मरण करती हैं तथा विधि-विधान से पूजा-अर्चना करती हैं।
अंचल में प्रचलित एक विशेष लोकपरंपरा के अनुसार, महिलाएं निश्चित संख्या में मावा के लड्डू तैयार करती हैं। इन्हें श्रद्धापूर्वक दान करने के साथ प्रसाद के रूप में स्वयं भी ग्रहण करती हैं। परिवारों में इस परंपरा को सुख-समृद्धि, मंगलकामना और धार्मिक संकल्प से जोड़कर देखा जाता है।

मावा की मांग बढ़ी तो भाव भी बढे

इस परंपरा के चलते शरद पूर्णिमा के आसपास मावा की मांग बढ़ जाती है। आसपास के अनेक गांवों के लोग मावा खरीदने के लिए आसपास के शहरों के बाजारों का रूख करते हैं और मिठाई की दुकानों से अच्छा मावा खरीदने मशक्कत करते हैं। कई बार अच्छी गुणवत्ता का शुद्ध मावा तलाशने में भी परेशानी होती है। यह बात अलग है कि शरद पूर्णिमा के अवसर पर मावा के भाव बढ़ने के बावजूद श्रद्धालुओं के उत्साह में कमी नहीं दिखाई देती। स्थानीय बाजार में मावा की कीमत लगभग 350 रुपये प्रति किलोग्राम तक बताई गई है। कुछ लोगों ने बताया कि मावा तो उपलब्ध हो गया, लेकिन उन्हें मनचाही गुणवत्ता का शुद्ध और देशी मावा तलाशने में कठिनाई हुई।
इसके बावजूद धार्मिक परंपरा निभाने के लिए महिलाओं ने मावा के लड्डू तैयार किए और दान-पुण्य की तैयारी की। बाजार में मावा के भाव चाहे जितने हों, लेकिन श्रद्धालुओं के लिए इस पर्व का महत्त्व केवल खरीदारी तक सीमित नहीं है। यह उनके परिवार की आस्था, पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा और धार्मिक विश्वास से जुड़ा अवसर है।

खीर का भोग, चंद्र दर्शन और पारिवारिक मंगलकामना

शरद पूर्णिमा की रात्रि में खीर तैयार कर भगवान को भोग लगाने और चंद्रमा की रोशनी में रखने की परंपरा पर्व का प्रमुख आकर्षण है। श्रद्धालु चंद्र दर्शन कर सुख-शांति और आरोग्य की कामना करते हैं। अनेक परिवार रात्रि में भजन-कीर्तन और भगवान के स्मरण के साथ समय व्यतीत करते हैं। इसी रात्रि को कुछ स्थानों पर अस्थमा/ श्वांस के रोगियों को आयुर्वेदिक औषधि युक्त मंत्रोक्त खीर भी दी जाती है। आयुर्वेद में भी चंद्रमा, ऋतुचर्या और आहार-विहार के संदर्भ में प्रकृति के प्रभावों पर विचार किया गया है। हालांकि, चांदनी में रखी खीर के औषधीय प्रभावों को लेकर प्रचलित धार्मिक मान्यताओं को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध स्वास्थ्य-लाभ नहीं मानना चाहिए। खीर को स्वच्छता के साथ ढककर रखना और सुरक्षित तापमान पर रखना आवश्यक है।

भारतीय संस्कृति में प्रकृति, भक्ति और लोकपरंपरा का उत्सव

शरद पूर्णिमा केवल चंद्रमा की पूजा या खीर ग्रहण करने का पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में प्रकृति के प्रति सम्मान, परिवार की मंगलकामना, दानशीलता और आध्यात्मिक चेतना का उत्सव भी है। भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला, मां लक्ष्मी की आराधना, चंद्रमा की शीतलता और ग्रामीण अंचलों की लोकपरंपराएं इस पर्व को विशिष्ट बनाती हैं।

रायसेन जिले सहित आसपास के गांवों में मावा के लड्डुओं का दान, तुलसी पूजन और रात्रि में खीर का भोग लगाने जैसी परंपराएं आज भी जीवंत हैं। आधुनिक जीवन की व्यस्तता के बीच ये परंपराएं नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ती हैं।

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