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संपादकीय :: कृष्ण को पूजने से ज्यादा जरूरी है, कृष्ण को समझना

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संपादकीय

कृष्ण को पूजने से ज्यादा जरूरी है, कृष्ण को समझना

कृष्ण जन्माष्टमी फिर आ गई है। मंदिर सजेंगे, झांकियां निकलेंगी, भजन गूंजेंगे और आधी रात को श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव मनाया जाएगा। लेकिन इस उत्सव के बीच एक सवाल भी पूछा जाना चाहिए—क्या हम कृष्ण को केवल भगवान मानकर पूज रहे हैं या उनके विचारों को अपने जीवन और समाज में उतार भी रहे हैं?
कृष्ण का जीवन आसान परिस्थितियों का जीवन नहीं था। जन्म से ही संकट, सत्ता का अत्याचार, षड्यंत्र, संघर्ष और युद्ध उनके सामने थे। लेकिन उन्होंने परिस्थितियों के आगे समर्पण नहीं किया। उन्होंने समय को समझा, समाज की नब्ज को पहचाना और जहां जरूरी हुआ वहां रणनीति के साथ अन्याय का मुकाबला किया।
यही कारण है कि कृष्ण केवल आध्यात्मिक प्रतीक नहीं हैं। वे जीवन की जटिल परिस्थितियों में विवेक से रास्ता निकालने की कला भी सिखाते हैं।
आज राजनीति में सत्ता सबसे बड़ा लक्ष्य दिखाई देती है। सार्वजनिक जीवन में विचारों की जगह आरोप-प्रत्यारोप बढ़ रहे हैं। समाज में असहमति को स्वीकार करने का धैर्य कम होता जा रहा है। ऐसे समय में कृष्ण का जीवन हमें बताता है कि विरोधी विचार का होना दुश्मनी नहीं है और संवाद की क्षमता किसी भी लोकतंत्र की ताकत होती है।
कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध के मैदान में केवल लड़ने के लिए प्रेरित नहीं किया। उन्होंने उसे अपने कर्तव्य, निर्णय और जिम्मेदारी को समझने का रास्ता दिखाया। आज के युवा के सामने भी अपनी तरह का कुरुक्षेत्र है—करियर की चुनौती, प्रतियोगिता, बेरोजगारी, सोशल मीडिया का दबाव और भविष्य को लेकर अनिश्चितता। ऐसे समय में कृष्ण का कर्मयोग बेहद प्रासंगिक हो जाता है।
कृष्ण की सबसे बड़ी सीख शायद यही है कि परिणाम की चिंता में कर्म को कमजोर मत होने दो।
लेकिन इस संदेश को सत्ता और समाज दोनों को समझने की जरूरत है। लोकतंत्र में जनता केवल वोट देने वाली भीड़ नहीं है। वह सवाल पूछने वाली शक्ति है। प्रशासन केवल आदेश देने वाली व्यवस्था नहीं है। उसकी जिम्मेदारी जनता की समस्याओं का समाधान करना है। और राजनीति केवल चुनाव जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने की जिम्मेदारी भी है।
कृष्ण ने अन्याय को केवल इसलिए स्वीकार नहीं किया कि वह शक्तिशाली व्यक्ति या सत्ता के केंद्र से आया था। यही बात आज के समाज के लिए भी महत्वपूर्ण है। जहां अन्याय हो, वहां सवाल उठना चाहिए; जहां व्यवस्था गलत हो, वहां सुधार की मांग होनी चाहिए और जहां सत्य कमजोर दिखाई दे, वहां उसके पक्ष में खड़े होने का साहस होना चाहिए।
आज हम कृष्ण की मूर्तियों पर फूल चढ़ाते हैं, लेकिन क्या हम उनके बताए विवेक को अपने फैसलों में जगह देते हैं? हम गीता पढ़ते हैं, लेकिन क्या उसके कर्मयोग को अपने व्यवहार में उतारते हैं? हम कृष्ण की जय बोलते हैं, लेकिन क्या अन्याय के सामने खड़े होने का साहस भी रखते हैं?
कृष्ण को समझने का अर्थ किसी एक विचारधारा या राजनीतिक खांचे में उन्हें बांधना नहीं है। कृष्ण का व्यक्तित्व इतना व्यापक है कि उसमें बाल-सुलभ आनंद भी है, मित्रता की गर्माहट भी, नीति की गहराई भी और संकट के समय निर्णय लेने का साहस भी।
आज कृष्ण की सबसे ज्यादा जरूरत मंदिरों में नहीं, हमारे आचरण में है।
जरूरत है कि युवा उनके कर्मयोग को समझें, राजनीति उनके लोककल्याण के दृष्टिकोण को समझे, प्रशासन उनकी परिस्थितिजन्य बुद्धिमत्ता से सीखे और समाज उनके संवाद तथा सह-अस्तित्व के संदेश को अपनाए।
जन्माष्टमी पर मध्यरात्रि में जब मंदिरों में घंटियां बजेंगी, तब हमें अपने भीतर भी एक सवाल की घंटी बजानी चाहिए—
क्या हमारे भीतर का कृष्ण जागा है?
अगर इस सवाल का जवाब खोजने की कोशिश शुरू हो जाए, तो जन्माष्टमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं रहेगी। वह समाज और व्यक्ति—दोनों के भीतर परिवर्तन का अवसर बन जाएगी।
कृष्ण का जन्म हर वर्ष होता है, लेकिन कृष्ण का संदेश तभी जीवित रहता है, जब हम उसे अपने कर्म में उतारते हैं।

— दीपक कांकर चीफ एडिटर

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