सी के पारे
सनातन धर्म में देव सोनी ग्यारस, जिसे देवशयनी एकादशी भी कहा जाता है, का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। मान्यता है कि इस पावन तिथि पर सृष्टि के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसी दिन से चातुर्मास का शुभारंभ होता है, जो चार माह तक चलता है। भगवान विष्णु के शयनकाल के दौरान सभी मांगलिक एवं शुभ कार्यों पर विराम लग जाता है।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु सृष्टि के पालनकर्ता हैं। वे धर्म की स्थापना और भक्तों की रक्षा के लिए समय-समय पर विभिन्न अवतार धारण करते हैं। जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में जाते हैं, तब देवताओं के लिए भी यह काल तप, साधना और संयम का माना जाता है। यही कारण है कि चातुर्मास के दौरान संत-महात्मा एक स्थान पर रहकर धार्मिक प्रवचन, पूजा-पाठ और जनकल्याण के कार्य करते हैं।
देव सोनी ग्यारस केवल एक व्रत या पर्व नहीं है, बल्कि यह मनुष्य को अपने जीवन में संयम, सादगी और आध्यात्मिक जागृति का संदेश देता है। इस दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने, व्रत रखने तथा “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से जीवन के कष्ट दूर होते हैं तथा सुख, समृद्धि और शांति का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
भगवान विष्णु के चार माह के शयनकाल को आत्मचिंतन और धर्म साधना का सर्वोत्तम समय माना गया है। इस अवधि में दान-पुण्य, भजन-कीर्तन, धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन और सेवा कार्यों का विशेष महत्व बताया गया है। देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागृत होते हैं और उसी के साथ विवाह, गृह प्रवेश तथा अन्य मांगलिक कार्यों की पुनः शुरुआत होती है।
देव सोनी ग्यारस हमें यह संदेश देती है कि जीवन की भागदौड़ के बीच कुछ समय आत्मा की शांति, ईश्वर की भक्ति और मानव सेवा के लिए भी समर्पित करना चाहिए। भगवान श्रीहरि विष्णु का यह शयनकाल श्रद्धालुओं के लिए भक्ति, संयम और आध्यात्मिक उन्नति का अनुपम अवसर माना जाता है।