आलेख
सत्य नारायण याज्ञवल्क्य
आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा का यह पावन दिवस भारतीय संस्कृति में गुरु-तत्त्व के प्रति कृतज्ञता, श्रद्धा और आत्मसमर्पण का पर्व है। गुरु पूर्णिमा केवल किसी व्यक्ति-विशेष के सम्मान का अवसर नहीं, बल्कि उस दिव्य चेतना के प्रति नमन का दिन है, जो अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के आलोक की ओर ले जाती है। गुरु वह हैं, जो केवल शिक्षा नहीं देते, बल्कि जीवन को दिशा देते हैं; केवल शास्त्र नहीं पढ़ाते, बल्कि आत्मा को उसके स्वरूप का बोध कराते हैं। इसलिए मेरे लिए गुरु पूर्णिमा वर्ष में एक बार आने वाला उत्सव नहीं है। यह तो प्रतिदिन, बल्कि दिन में अनेक बार अपने गुरु-मंडल का स्मरण करने का सहज अवसर बनकर आती है।
भारतीय परंपरा में माता को प्रथम गुरु कहा गया है। मेरे जीवन में भी गुरु-तत्त्व की प्रथम अनुभूति मां के रूप में हुई। मेरे लिए मां भगवती केवल जगज्जननी महादेवी नहीं, बल्कि अनंत करुणा, वात्सल्य और संरक्षण की साक्षात् अधिष्ठात्री शक्ति हैं। उनके बिना जीवन का एक क्षण भी असंभव प्रतीत होता है। जब-जब मन डगमगाता है, उनकी करुणामयी उपस्थिति ही भीतर विश्वास का दीप प्रज्वलित करती है।
मेरे आध्यात्मिक जीवन में आदिगुरु भगवान शिव का स्थान सर्वोपरि है। समस्त योग, ध्यान, मौन, तंत्र और तत्त्वज्ञान का मूल स्रोत शिव ही हैं। वे हमें सिखाते हैं कि संसार के समस्त विष को धारण करते हुए भी अंतःकरण में करुणा और शांति का अमृत सुरक्षित रखा जा सकता है। उसी प्रकार भगवान सूर्य मेरे लिए ऐसे गुरु हैं, जो प्रतिदिन बिना किसी अपेक्षा के समस्त जगत को प्रकाश, ऊर्जा और जीवन प्रदान करते हैं। उनका प्रत्येक उदय कर्मयोग का मौन उपदेश है कि स्वयं तपकर भी दूसरों के जीवन को प्रकाशित करना ही श्रेष्ठ साधना है।
महर्षि याज्ञवल्क्य का तेजस्वी व्यक्तित्व मेरे चिंतन को सदैव प्रेरित करता रहा है। सूर्य से ब्रह्मविद्या प्राप्त करने वाले इस महर्षि ने केवल अध्यात्म का ही नहीं, सामाजिक व्यवस्था का भी पुनर्संयोजन किया। उनके स्मृति-ग्रंथ भारतीय समाज की वैचारिक यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं। महापंडित रावण भी मेरे लिए केवल पौराणिक पात्र नहीं हैं। उनका विलक्षण ज्ञान, वेदों पर अधिकार, शिवभक्ति और परम सत्ता से भी प्रश्न करने का साहस यह सिखाता है कि ज्ञान जितना ऊँचा हो, उतनी ही विनम्रता और आत्मसंयम आवश्यक है; अन्यथा वही ज्ञान पतन का कारण भी बन सकता है। आदि शंकराचार्य ने दार्शनिक गूढ़ता और भक्ति की सरसता का जो अद्भुत समन्वय किया, वह भारतीय आत्मा की अनुपम अभिव्यक्ति है। उनके स्तोत्रों में दर्शन भी है, काव्य भी है और ईश्वर के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण की अनुभूति भी।
मेरे पिता पंडित श्री पुरुषोत्तम नारायण जी याज्ञवल्क्य गुरुजनों के अत्यंत प्रिय और विश्वासपात्र थे। हिंदी,अंग्रेजी और संस्कृत पर उनका विशेषाधिकार तथा इन भाषाओं की हजारों पुस्तकों के सानिध्य के साथ ही घर पर आएदिन पधारने वाले संतों की गोद में खेलने का सौभाग्य अबोधावस्था में मिलता रहा। जीवन में प्रत्यक्ष गुरु-परंपरा का शुभारंभ परमपूज्य चित्रकूट वाले गुरुजी के श्रीचरणों से हुआ। तीन वर्ष की बाल्यावस्था से लेकर तेरह वर्ष की आयु तक उनके सान्निध्य में देववाणी संस्कृत, शास्त्र और व्याकरण का अध्ययन करना मेरे जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है। बालमन पर पड़े वे संस्कार आज भी मेरे समस्त चिंतन और लेखन का आधार हैं। बाद में आर्य समाज में संपन्न हुए यज्ञोपवीत संस्कार ने वैदिक जीवन-दृष्टि से परिचित कराया। जीवन की यात्रा आगे बढ़ी तो विभिन्न परंपराओं, मतों और विचारधाराओं के अनेक विद्वानों का सान्निध्य मिला। तब अनुभव हुआ कि सत्य किसी एक पंथ की जागीर नहीं होता; जहाँ भी सद्ज्ञान है, वहीं गुरु-तत्त्व विद्यमान है।
इसके पश्चात् शैक्षणिक, वैचारिक, दार्शनिक, सामाजिक और व्यावहारिक जीवन में मार्गदर्शन देने वाले गुरुओं का एक अंतहीन क्रम प्रारंभ हुआ, जो आज भी चल रहा है। मेरे लिए गुरु की कोई जाति नहीं, कोई संप्रदाय नहीं, कोई धर्म, भाषा, देश अथवा आयु नहीं। जिसने भी मेरे जीवन में किसी भी रूप में कुछ सिखाया, वह मेरा गुरु है। जिन्होंने स्नेह दिया, वे भी गुरु हैं; जिन्होंने कठोरता दिखाई, वे भी गुरु हैं। जिन्होंने सफलता का मार्ग बताया, वे भी गुरु हैं; जिन्होंने असफलताओं के माध्यम से धैर्य और आत्मचिंतन का पाठ पढ़ाया, वे भी गुरु हैं। जीवन की प्रत्येक घटना, प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक अनुभव अपने भीतर किसी न किसी शिक्षा का बीज लेकर आता है।
पुस्तकें मेरे लिए मौन गुरु हैं। वे शब्दों के माध्यम से नहीं, बल्कि युगों के अनुभवों के माध्यम से संवाद करती हैं। प्रकृति स्वयं एक विराट विश्वविद्यालय है। नदी प्रवाह सिखाती है, पर्वत धैर्य सिखाते हैं, वृक्ष परोपकार का पाठ पढ़ाते हैं, आकाश विस्तार का बोध कराता है और पृथ्वी सहनशीलता की चरम सीमा का परिचय देती है। समय सबसे कठोर गुरु है, क्योंकि उसकी शिक्षा परीक्षा के बाद नहीं, परीक्षा के माध्यम से प्राप्त होती है।
धीरे-धीरे मैंने अनुभव किया कि गुरु किसी एक शरीर में सीमित नहीं होते। वे चेतना बनकर हमारे भीतर प्रतिष्ठित हो जाते हैं। मेरा विस्तृत गुरु-मंडल, गुरु-परिवार और उनकी अखंड शिष्य-परंपरा मेरे जीवन की अमूल्य निधि है। स्वयं को मैं इस विशाल परंपरा का अत्यंत अल्पज्ञ, त्रुटिपूर्ण और अयोग्य शिष्य ही मानता हूँ। किंतु गुरुकृपा का स्वरूप ही ऐसा है कि वह पात्रता नहीं देखती, केवल समर्पण देखती है।
जीवन के किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय के समय मैं कुछ क्षण आँखें बंद कर अपने गुरु-मंडल का स्मरण करता हूँ। आश्चर्य होता है कि जिस विषय पर मन दुविधा में होता है, उसी क्षण अंतर्मन में जैसे कोई मौन प्रकाश फूट पड़ता है। ऐसा लगता है मानो मेरे किसी कारणरहित कृपालु गुरु ने भीतर बैठकर उचित दिशा का संकेत दे दिया हो। यह अनुभव तर्क से परे है, परंतु साधना और श्रद्धा के पथ पर चलने वाला प्रत्येक साधक इसे कभी न कभी अवश्य अनुभव करता है।
भारतीय दर्शन कहता है—गुरु वह नहीं जो अपने प्रति आकर्षित करे; गुरु वह है जो साधक को उसके वास्तविक स्वरूप तक पहुँचा दे। गुरु वह है जो स्वयं लक्ष्य न बनकर लक्ष्य तक पहुँचने का सेतु बने। अंततः गुरु का परम कार्य शिष्य को अपने भीतर स्थित उस दिव्य गुरु से मिला देना है, जो आत्मा के रूप में सदैव विद्यमान है।
आज गुरु पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर मैं अपने दृश्य और अदृश्य, ज्ञात और अज्ञात, स्थूल और सूक्ष्म, भूत, वर्तमान और अनंत काल तक मेरा मार्गदर्शन करने वाले समस्त गुरु-मंडल के श्रीचरणों में कोटिशः प्रणाम अर्पित करता हूँ। मेरी यही प्रार्थना है कि उनकी अकारण करुणा, कृपा और संरक्षण की छाया सदैव मेरे जीवन पर बनी रहे। कण-कण में व्याप्त, क्षण-क्षण मेरा पथ आलोकित करने वाले गुरुदेवों से विनम्र निवेदन है कि अपने इस अल्पज्ञ, त्रुटिपूर्ण और कुशिष्य को सदैव सत्य, सेवा, साधना और विनम्रता के पथ पर अग्रसर होने का सामर्थ्य प्रदान करते रहें।
–लेखक बरिष्ठ पत्रकार और दैनिक शुभ चौपाल के संपादक हे।