सागर। निर्यापक मुनि श्री अभय सागर महाराज ने कहा कि जीवन में धर्म को केवल सुनना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे आत्मसात करना आवश्यक है। आचार्य श्री के ग्रंथों का अध्ययन कर आज लाखों लोग अपने जीवन को कल्याण के मार्ग पर अग्रसर कर रहे हैं।
महाराज श्री ने कहा कि क्रोध और द्वेष संसार में भटकने के प्रमुख कारण हैं। यदि मनुष्य इन पर नियंत्रण कर ले, तो उसका जीवन सुखमय बन सकता है। छोटा-सा मंत्र भी जीवन में बड़े परिवर्तन का कारण बन सकता है, बशर्ते उसे श्रद्धा और भावना के साथ अपनाया जाए।
28 नवंबर से आयोजित होने वाले समवशरण विधान का आयोजन अपने अनूठे स्वरूप और चारों दिशाओं से भगवान के दर्शन की विशेष व्यवस्था के कारण अद्भुत होगा। सभी श्रद्धालुओं को इसमें सहभागी बनकर धर्मलाभ लेना चाहिए।
कान से नहीं, ध्यान से सुनें धर्म की वाणी : मुनि श्री निरीह सागर महाराज
मुनि श्री निरीह सागर महाराज ने प्रवचन में कहा कि धार्मिक कार्यों में सफलता के लिए श्रद्धा के साथ युक्तिपूर्वक कार्य करना आवश्यक है। आज अनेक लोग व्यस्तता के कारण मंदिर और प्रवचन तक नहीं पहुंच पाते, लेकिन सच्ची श्रद्धा हो तो व्यक्ति समय निकालकर धर्म से जुड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि प्रवचन केवल कानों से नहीं, बल्कि ध्यान और मन की एकाग्रता से सुनने चाहिए। जिस प्रकार धर्म की बातों को ध्यानपूर्वक सुनने से जीवन में परिवर्तन आता है, उसी प्रकार घर-परिवार में भी दूसरों की बातों को समझदारी और धैर्य से सुनना चाहिए।
महाराज श्री ने उदाहरण देते हुए बताया कि एक व्यक्ति ने प्रवचन से प्रेरणा लेकर घर में सास-बहू के विवाद के समय तत्काल प्रतिक्रिया देने के बजाय शांत रहना सीखा। इससे उसके घर का वातावरण सुखमय हो गया।
मुनि श्री ने कहा कि कान से सुनने पर विवाद और बंटवारे की स्थिति बन सकती है, जबकि ध्यान से सुनने पर घर स्वर्ग बन सकता है।