ईमानदारी को हतोत्साहित करके बेईमानी को पुरस्कार आखिर कब तक
मनोज कुमार द्विवेदी,अनूपपुर मप्र
मध्यप्रदेश सहित अन्य राज्यों में मुफ्त बिजली योजना से अलग चुनाव के वक्त एक मुश्त बिजली बिल माफ करने का चलन है। अब ऐसा गरीब उपभोक्ताओं को मदद के लिये किया जाता है या मतदाताओं को प्रभावित करने के लिये…इसकी विवेचना अलग – अलग हो सकती है।

शहडोल से प्रकाशित एक खबर ने सुबह से लोगों का ध्यान आकर्षित किया है। इस खबर में सत्यता है तो यह बिजली बिल जमा नहीं करने का अजब , बेशर्म और खतरनाक सी कोशिश हो सकती है। सरकार को यह विचार करना ही होगा कि ऐसे उपभोक्ता जो पूरी ईमानदारी से बिजली समय पर जमा करते हैं और दूसरी ओर एक ऐसा वर्ग जो सक्षम होने के बावजूद बिजली बिल इस मंशा से जमा नहीं करते कि सरकार उनका बिल माफ कर ही देती है तो जमा क्यों करें ? ऐसे उपभोक्ताओं शासन की किसी छूट योजना से बकाएदारों (जो कई महीने व सालों से बिल जमा नहीं करते) को लाभ मिलता है तो ऐसे में समय पर हर माह बिल जमा करने वाले ईमानदार मेहनतकश उपभोक्ता स्वयं को ठगा हुआ महसूस करते हैं।

बाद में ऐसे उपभोक्ता भी बिल जमा नहीं करते और बकाया बढऩे देते हैं। गरीब ,अक्षम लोगों को एक सीमा तक मदद उचित है। लेकिन इसकी आड में सक्षम लोगों द्वारा बिजली बिल जमा नहीं करने से उसका अतिरिक्त भार ईमानदार उपभोक्ताओं को उठाना पडता है। बिजली कंपनियाँ बिल वसूली ना होने, बिजली चोरी होने की दशा में घाटा दिखला कर टैरिफ और तमाम तरह के टैक्स लाद कर उपभोक्ताओं की कमर तोडते रहे हैं। सरकार विचार करे कि ईमानदारी को प्रोत्साहित करने की जगह लापरवाह, लालची उपभोक्ताओं की बेईमानी को कब तक पुरस्कृत करती रहेगी ?

-लेखक अनूपपुर मप्र के वरिष्ठ पत्रकार हें।