सुरेन्द्र जैन सांकरा रायपुर
महातपस्वी दिगंबर जैन अचार्यश्री 108 विद्यासागरजी महामुनिराज को बर्तमान के वर्धामान धरती के चलते फिरते तीर्थ यूं ही नहीं कहा जाता बर्तमान में उनके जैंसा महातपस्वी संसार मे कोई दूसरा नहीं उनकी आहार चर्या का शौभाग्य भी ऐंसे पुण्यशाली परिवारों को मिलता है जो धर्म अध्यात्म के प्रति समर्पित होते हैं जो जीवन मे त्याग को महत्व देते हैं भले ही वह अमीर हों या गरीब लेकिन संसारी जीवन मे नियम संयम से रहते हों नित्य पुजन अभिषेक करते हो ऐंसे श्रावकों को ही महातपस्वी के आहारदान का पुण्य मिलता है।

दिगंबर जैन आचार्यो मुनियों की त्याग तपस्या में बर्तमान समय मे आचार्यश्री विद्यासागर की चर्या जैंसी चर्या कठिन तपस्या की बराबरी कोई नहीं कर सकता इसीलिए भारत ही नहीं अपितु विदेशों में भी लोग आचार्यश्री की भक्ति करते हैं और समय समय पर आचार्यश्री के दर्शनार्थ आते रहते हैं।
रायपुर के ह्रदय स्थल मालवीय रोड जैन मंदिर के समीप आचार्यश्री की आहारचार्य नरेंद्र जैन गुरुकृपा परिवार प्रदीप जैन विश्व परिवार और कवि राजेश जैन रज्जन परिवार के चौके में हुई आचार्यश्री का पड़गाहन कर आहार दान का पुण्य कमाने वाले श्रावक श्राविकाओं के नैन खुशी से भर आये आहारचार्य उपरांत आचार्यश्री कुछ समय जैन मंदिर के सामने देशभर से आये श्रबको को अपना मंगल आर्शीवाद दिए तत्प्श्चात आहार दान का शौभाग्य प्राप्त करने वाले परिवार जनों ने झूमते गाते हुए खुशियां मनाई यहां सुरेन्द्र जैन ने आहार चर्या पर लिखी अपनी त्वरित रचना प्रस्तुत कर आहारदान का शौभाग्य प्राप्त करने वाले परिवार जनों के पुण्य की अनुमोदना की।

56 साल पहले ही त्याग दिए थे नमक शकर हरि सब्जियां व फलफ्रूट
दिगंबर जैन आचार्यश्री विद्यासागरजी महामुनिराज की आहार चर्या एक तरह से नाम मात्र की रूखी सूखी आहार चर्या है आचार्यश्री महातपस्वी महात्यागी हैं उन्होंने 56 साल पहले ही नमक का त्याग शकर व सभी प्रकार के मीठे का त्याग कर दिया था फल फ्रूट फलों का जूस हरि सब्जियों का भी आचार्यश्री त्याग कर चुके हैं
चौबीस घंटे में एक बार ही विधि मिलने पर जब उनकी आहार चर्या होती है तभी आहार के समय जल भी मात्र 24 अंजुली ही लेते हैं कुंआ का छना हुआ गर्म किया शुद्ध जल जैन मुनियों के आहार बनाने में उपयोग होता है।
शुद्ध धोती दुपट्टा में ही आहारदान
जैन मुनि आचार्यो की आहार चर्या कराने वाले परिवारजन जो चौका लगाते हैं वह पूरी तरह स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण कर ही आहार बनाते हैं एक दिन पहले श्रावक ओर श्राविकाएं अपने धोती दुपट्टा धोकर डालते हैं उन्हें कोई भी न छुए यदि किसी पेंट शर्ट वाले ने छू लिया तो समझिए वह वस्त्र अशुद्ध हो गए पूर्ण शुद्ध धोती दुपट्टा में आहार बनाने और फिर सावधानी पूर्वक घर के सामने चौक पूरकर पड़गाहन करते है विधि मिलने पर जब पड़गाहन होता है तब मुनिराज से मन शुद्धि वचन शुद्धि क़ाय शुद्धि आहार जल शुद्ध है कहते हुए परिक्रमा उपरांत चौके में मुनिराज को ले जाते हैं जहां पूजन के उपरांत आहार चर्या होती है जैन मुनि किसी भी प्रकार के थाली में नहीं अपितु अपने दोनो हाथों की अंजुली बनाकर हाथों को ही पात्र बनाकर आहार ग्रहण करते हैं।