शरद शर्मा बेगमगंज रायसेन
अंतिम दिन श्री राम महायज्ञ एवं हनुमत प्रतिष्ठा के साथ कार्यक्रम का समापन विश्राम दिवस में यज्ञ पूर्णाहुति के दिन यज्ञाचार्य कथा व्यास पं. कमलेश कृष्ण शास्त्री जी महाराज ने
पंचम दिवस एवं अंतिम दिन पंडित कमलेश कृष्ण शास्त्रीने कहा मनुष्य यदि अपने जीवन में स्थायी सुख, अखण्ड आरोग्य और निर्मल प्रसन्नता की कामना करता है, तो उसे अपने आचरण को सुव्यवस्थित, संयमित और सद्गुणमय बनाना अनिवार्य है; क्योंकि जीवन की समृद्धि बाह्य साधनों में नहीं, अपितु अंतःकरण की शुद्धि और दिनचर्या की संतुलित साधना में निहित होती है।
जब मनुष्य अपने जीवन को नियम, संयम और विवेक से अभिसिंचित करता है, तब उसका अंतःकरण निर्मल होकर आत्मतत्त्व के साक्षात्कार के योग्य बनता है। समयानुसार जागरण और निद्रा, आहार की शुद्धता और मर्यादा, तथा इन्द्रियों का संयम ये सभी साधक के लिए केवल लौकिक अनुशासन नहीं, वरन् आत्मोन्नति के सोपान हैं। संतुलित आहार से शरीर पुष्ट होता है, संयमित दिनचर्या से चित्त स्थिर होता है, और उचित विश्रांति से प्राणशक्ति का संवर्धन होता है।
“पूज्य आचार्यश्री जी” के उपदेशों में भी यह स्पष्ट परिलक्षित होता है कि मनुष्य को केवल बाह्य उन्नति पर ही नहीं, अपितु अपने व्यवहार, विचार और संस्कारों की पवित्रता पर विशेष ध्यान देना चाहिए। जीवन में उचित विनोद, मर्यादित मनोरंजन और सत्संग ये ऐसे साधन हैं, जो मन को विक्षेपों से बचाकर उसे प्रसन्नता और शांति की ओर अग्रसर करते हैं। साथ ही, श्रेष्ठ आचरण और मधुर व्यवहार ही वह सेतु हैं, जो मनुष्य को समाज में आदर, विश्वास और आत्मीयता प्रदान करते हैं।
साधक को चाहिए कि वह अपने परिवेश में विद्यमान श्रेष्ठताओं को ग्रहण करने का अभ्यास विकसित करे। प्रत्येक शुभ विचार, प्रत्येक सद्गुण और प्रत्येक प्रेरणादायी प्रसंग जीवन को उन्नत बनाने का माध्यम बन सकते है। जो व्यक्ति सज्जनों के आचरण से शिक्षा ग्रहण करता है और उसे अपने जीवन में आत्मसात करता है, वही वास्तविक अर्थों में प्रगति के पथ पर अग्रसर होता है। इस प्रकार का दृष्टिकोण अंतःकरण को सकारात्मकता से परिपूर्ण करता है और मन को स्थैर्य प्रदान करता है।
उच्च चरित्र का निर्माण किसी एक दिन का कार्य नहीं, अपितु यह निरंतर साधना और अनुशासन का परिणाम होता है। नियमों का पालन, मर्यादाओं का निर्वाह और आत्मसंयम ये सभी मिलकर व्यक्तित्व को गरिमा प्रदान करते हैं। जो मनुष्य अपने जीवन को नियमित दिनचर्या में ढालता है, वह आलस्य और प्रमाद से दूर रहकर कर्मपथ पर स्थिर रहता है। अनुशासन ही वह आधारशिला है, जिस पर सफलता का भव्य भवन निर्मित होता है।
संस्कारों की पवित्रता जीवन की वास्तविक सम्पदा है। ये ही वे सूक्ष्म बीज हैं, जो व्यक्तित्व में सद्गुणों के रूप में विकसित होकर जीवन को सुगंधित करते हैं। जब मनुष्य अपने विचारों, वाणी और कर्मों में शुद्धता स्थापित करता है, तब उसका सम्पूर्ण जीवन एक आदर्श रूप धारण कर लेता है। इस प्रकार, सुव्यवस्थित दिनचर्या, संयमित आहार, मर्यादित आचरण और श्रेष्ठ संस्कार ये सभी मिलकर मनुष्य को न केवल स्वस्थ और प्रसन्न बनाते हैं, अपितु उसे एक उच्च, सफल और सार्थक जीवन की ओर उन्मुख करते हैं।
अतः यह निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि जो साधक अपने जीवन में अनुशासन, संयम और सदाचार को धारण करता है, वही वास्तविक सुख, शांति और पूर्णता का अनुभव करता है; और वही जीवन की श्रेष्ठता का अधिकारी बनता है