सुरेन्द्र जैन रायपुर
डोंगरगढ़ – संत शिरोमणि 108 आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ससंघ चंद्रगिरी डोंगरगढ़ में विराजमान है। आज के प्रवचन में आचार्य श्री ने कहा कि गुरु महाराज को बार – बार नमस्कार करता हूँ। अपने सम्यग्ज्ञान के माध्यम से आँखों कि ज्योति जो नेत्र रूप है उसमे केवल मोक्षमार्ग दिखाया है उसमे रंग, रस, गंध आदि गुण भी रहते हैं उसे नहीं दिखाते हैं। ये गुरु हमें सम्यग्ज्ञान दिखाते हैं। रूप के साथ स्वरुप को भी दिखा देते हैं। समवशरण में भगवान हमारी संकाओ का समाधान करा सकते हैं लेकिन कोई उनके चरण स्पर्श नहीं कर सकता है किन्तु गुरु के माध्यम से सब उपलब्ध हो रहा है। गुरु के पास जो गुण है हमें उन्ही का गुणगान कर उन्ही के समान बनना चाहते हैं। हमारे पास मान, सम्मान है। मान के कारण ही हमारा कल्याण नहीं हो पाता है। मान के त्याग में ही सम्मान निहित है। सम्मान पाना चाहते हो तो ऐसी चर्या अपनाओ जिसमे तिरश्कार और सम्मान दोनों स्थिति में शान्ति से रह सको। कभी कोई विपरीत शब्द कह देता है तो तूफ़ान आ जाता है। ये तूफ़ान अज्ञान के कारण आ जाता है। यह अज्ञान रुपी तिमिर चारों ओर फैला है जिसे गुरु टार्च के प्रकाश के समान हमें सत्मार्ग दिखाते हैं। जब सूर्य, चन्द्र नहीं आते हैं तो जो तारे टिमटिमाते हैं उन्ही के थोड़े प्रकाश में पकडंडी दिखाई दे देती है। और उस समय अपनी छाया भी पथ प्रदर्शन का काम करती जाती है। हजारो – हजारो वर्षों से यह धरती गुरुओं से पवित्र हुई है जिसे पथिक देखता है तो उसे विश्वास हो जाता है कि हमें अब और किसी कि आवश्यकता नहीं है हमें अपने गुरु के चरण चिन्ह मिल गए हैं हमें भी इसी मार्ग में आगे बढ़ते जाना है इस पर एक भजन है जिसकी गहराई बहुत अच्छी लगती है। प्रत्यक्ष या परोक्ष में भी वे यही भावना करते हैं कि किसी जीव को कष्ट ना हो। उनकी साधना का एक अंश भी हो जाये तो काफी है। एक उदाहरण दिया कि एक बैलगाड़ी को किसान चला रहा था जिसे वह तेज चलाने के लिये बैल को छड़ी मारकर संकेत दे रहा था। उस बैलगाड़ी के निचे छाव में एक श्वान (कुत्ता ) चलने लगता है इससे वह आसानी से बैलगाड़ी कि छाव के साथ – साथ रास्ते के दूसरे श्वानो (कुत्तों) से भी बच जाता है। जब बैलगाड़ी गंतव्य तक पहुच जाती है तो वह श्वान (कुत्ता ) सोचता है कि उसने ही यह बैलगाड़ी को यहाँ तक लाया है। गुरु बार – बार ग्रंथों में लिखते हैं कि इसमें कोई भी गलती या त्रुटी हुई हो उसके लिये मै क्षमा चाहता हूँ कृपया कर इसे शोध कर पढ़े। आज का दिन गुरु पूर्णिमा का दिन है कभी प्रभु पूर्णिमा नहीं आती। गुरु बिना प्रभु बोल नहीं पाते। प्रभु में इतनी गहराई होती है द्वादशांग रहता है जिसे परोसने वाले गुरु देव हैं। यदि बड़े घड़े में पानी भरा हो और उससे आप पानी पियेंगे तो पूरा पानी आपके ऊपर ही गिर जाएगा इसके लिये आपको एक जग कि आवश्यकता होती है जिसके माध्यम से आप एक धार से पानी पी लेते हैं। इसी भांति गुरु धारदार जग से हमारी प्यास बुझा रहे हैं।भगवान कि दिव्य ध्वनि को गणधर परमेष्ठी झेल कर उसे खोल कर ग्रंथो के माध्यम से हमें उपलब्ध करते हैं। आज गणधर परमेष्ठी का दिन है। भगवान महावीर स्वामी कि दिव्य ध्वनि ६६ दिन बाद गणधर परमेष्ठी कि उपस्तिथि में ही खीरी थी जो गुरु के माध्यम से हमें प्राप्त होती है। कल वीर शासन जयंती है इसी दिन भगवान महावीर स्वामी कि दिव्य ध्वनि खीरी थी। आज आचार्य श्री विद्यासागर महाराज को नवधा भक्ति पूर्वक आहार कराने का सौभाग्य ब्रह्मचारिणी अनामिका दीदी, अर्चना दीदी परिवार को प्राप्त हुआ।