डॉ.धीरज जॉनसन दमोह
शहर से जबलपुर की ओर जाने सड़क मार्ग पर जबेरा से करीब 7 किमी दूर ग्राम करनपुरा-खैरी के समीप स्थित हरियाली,पहाड़ और मटक कुंड झरना अपनी प्राकृतिक सुंदरता,जैव विविधता, जंगल और रोमांचकारी ट्रैकिंग मार्ग के कारण लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है। वर्षभर यहां प्रकृति प्रेमियों, फोटोग्राफर और एडवेंचर के शौकीनों की आवाजाही बनी रहती है।

मुख्य सड़क मार्ग से जंगल की शुरुआत जोगन कुंड तक, अब सड़क निर्माण हो जाने से पर्यटकों के लिए पहुंचना पहले की अपेक्षा अधिक सुगम हो गया है। इसके बाद लगभग दो किलोमीटर का पैदल सफर तय कर मटक कुंड तक पहुंचना होता है जो दुर्गम जरूर है, लेकिन रोमांच से भरपूर है। रास्ते में बहते नाले, पानी से भरे प्राकृतिक मार्ग, चट्टानें, ऊबड़-खाबड़ पगडंडियां और तीन ओर से घिरी पहाड़ियां लोगों को प्रकृति के करीब ले जाती हैं। पेड़ों के बीच से गुजरती पगडंडियों में हर कदम पर मनमोहक दृश्य और फोटोग्राफी के अनगिनत अवसर प्रदान करता है।

प्रकृति का जीवंत संगीत है मटक कुंड
राजस्थान के बिट्स पिलानी के गणित विभाग के डॉ. शैलेश त्रिवेदी ने उक्त स्थान के भ्रमण के बाद कहा कि प्रकृति की गोद में बसे दमोह के इस खूबसूरत मटक कुंड झरने तक पहुंचते ही शहर की भागदौड़, थकान और शोर स्वतः पीछे छूट जाता है। यहां का सौंदर्य केवल आंखों से देखने का विषय नहीं, बल्कि आत्मा से महसूस करने का अनुभव है।
उन्होंने बताया कि सदियों पुरानी परतदार विशाल चट्टानों के बीच से बहती दूधिया जलधारा जब ऊंचाई से प्राकृतिक कुंड में गिरती है तो उसका दृश्य अद्भुत होता है। झरने की गूंज, हवा में बिखरती पानी की महीन फुहारें और आसपास का शांत वातावरण मन को गहरी शांति प्रदान करता है।

औषधीय वनस्पतियों से भरपूर है क्षेत्र
डॉ. ऋषिभा दीक्षित एवं दीपा पांडे ने बताया कि मटक कुंड के आसपास फैली हरियाली, चट्टानों के बीच उगने वाली वनस्पतियां और यहां पाई जाने वाली अनेक औषधीय प्रजातियां इस क्षेत्र की जैव विविधता को विशेष बनाती हैं। उनका कहना है कि चट्टानों के बीच से रिसता स्वच्छ जल प्राकृतिक गुणों से भरपूर प्रतीत होता है। उन्होंने कहा कि झरने से गिरते पानी की निरंतर गूंज, ठंडी हवाएं, पानी की फुहारें और प्राकृतिक वातावरण मानसिक तनाव को कम करने का अनुभव कराते हैं। यही कारण है कि मटक कुंड प्रकृति की गोद में स्थित एक प्राकृतिक हीलिंग डेस्टिनेशन के रूप में पहचान बना रहा है।
डॉ एन पी कुमार बताती है कि यदि यहां आवश्यक सुरक्षा, सुविधाएं और विकास किया जाए तथा पर्यावरण संरक्षण के साथ इसे व्यवस्थित रूप से विकसित किया जाए, तो यह इको-टूरिज्म स्थलों में अपनी और बेहतर पहचान बना सकता है। यहां महसूस होता है कि वास्तविक सुकून किसी आलीशान सुविधा में नहीं, बल्कि प्रकृति के इस अनछुए और जीवंत स्वरूप में बसता है।