राष्ट्रवादी विचारधारा के पैरोकार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को अपनी स्थापना के शताब्दी वर्ष में इससे बेहतर उपहार कोई हो नहीं सकता था कि जिसने बंग भूमि से उपजे राष्ट्रवादी चिंतन को अपनी वैचारिक आधार भूमि बनाया, उसी प्रांत में संघ की राजनीतिक शाखा भाजपा अपने दम पर सरकार बनाए। भले ही इस घड़ी को आने में डेढ़ सौ साल लगे हों। भाजपा ने पूरा चुनाव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चेहरे पर लड़ा। पार्टी की बंगाल विजय कई मायनों में अहम है। जहां एक तरफ उसने कभी बरसों लाल रंग में रंगे बंगाल पर भगवा फहराकर समूचे उत्तर भारत में अपने अश्वमेध यज्ञ की पूर्णाहुति दी है, वहीं देश में तमाम विपक्षी पार्टियों को अपनी राजनीति की दिशा और दशा पर पुनर्विचार करने पर विवश कर दिया है
। यूं सोमवार को प. बंगाल सहित चार राज्यों और एक केन्द्रित शासित प्रदेश के विधानसभा चुनाव नतीजे आए। इनमें से तीन राज्यों में परिवर्तन की लहर साफ दिखी, लेकिन अगर अकेले बीजेपी की बात करें तो वह दो राज्यों में सत्ता में लौटी और एक राज्य में पहली बार सत्ता में आ रही है। यही नहीं, दक्षिण में जहां कमल अब भी खिलने के लिए सही सरोवर की तलाश में है, उस केरलम् में उसे कुछ सफलता िमली है। जबकि केरलम में कांग्रेस नीत यूडीएफ ने दस साल बाद सत्ता में दमदार वापसी की हैl बंगाल के बाद सबसे चौंकाने वाला चुनाव परिणाम द्रविड़ राजनीति का गढ़ माने जाने वाले तमिलनाडु का है, जहां एक फिल्म अिभनेता थलपति विजय जोसेफ और उनकी नवोदित पार्टी टीवीके ने द्रविड़ राजनीति से हटकर अपनी कामयाबी का झंडा गाड़ा है। यह इस बात का संकेत है कि तमिलनाडु की जनता अब द्रविड़ राजनीति से इतर कोई रास्ता तलाशना चाहती है। हालांकि तमिलनाडु में भाजपा शून्य पर ही रही, लेकिन मानकर चलें कि बंगाल के बाद उसका अगला लक्ष्य तमिलनाडु ही होगा। इस हिसाब से थलपति विजय की पार्टी टीवीके के उदय को एक संक्रमण काल समझा जाना चाहिए।

बहरहाल, पश्चिम बंगाल में पूरा विधानसभा चुनाव किसी महायुद्ध की तर्ज पर और खूंखार जिद के साथ लड़ा गया। बंगाल बीते 15 सालों से मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी की अपनी राजनीति और उनकी पार्टी टीएमसी का अभेद्य गढ़ बना हुआ था। ममता ने पूर्व में कम्युनिस्टों के किले को ढहाकर पहला चुनाव भले ही भारी जन समर्थन से जीता हो, लेकिन उसके बाद उन्होंने सत्ता में बने रहने के हर हथकंडे अपनाए। जिसमें महिलाअों को रेवड़ी और अति तुष्टिकरण से लेकर गुंडागर्दी तक का हथकंडा शामिल था। विकास पर ध्यान देने की जगह उन्होंने भाजपा के राष्ट्रवाद का मुकाबला क्षेत्रीय और बंगाली अस्मिता से करने की भरपूर कोशिश की। हर बात पर पंगे लेना उनके जुझारू व्यक्तित्व का ऐसा पहलू रहा कि जिससे वहां के लोग ही ऊबने लगे थे। ममता मानकर चल रही थीं कि राज्य के लगभग तीस फीसदी मुस्लिम वोट और लगभग इतना ही हिंदू वोट पाकर वो अजेय रहेंगी। लेकिन वो खुद भी भवकनीपुर सीट से हार गईंl उधर भाजपा ने ममता के इस गढ़ को ढहाने के लिए साम-दाम-दंड-भेद हर तरीके का सहारा लिया। देश के चुनाव इतिहास में पहली बार इतने भारी पैमाने पर केन्द्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती की। ममता बैनर्जी ने इसे ‘लोगों को डराने की चाल’ भले ही बताया हो, लेकिन जिस तरह से बंगाल में वोटिंग का रिकाॅर्ड बना, उससे साफ है कि ममता ने विरोधी वोट को किस दबंगई से दबा रखा था। जब विरोधी वोटर इतने दबाव में हो तो उसे मतदान के िलए बाहर निकालने के लिए वो तमाम तरीके आजमाना जरूरी था, जिनसे आम मतदाता में सुरक्षा का भाव जगे और उसे चुनाव पश्चात हिंसा से बचाने में सहायक हों। बंगाल के इस चुनाव को कई जुमलों ने भी पारिभाषित किया। मसलन इसे ‘ममता बनाम जनता’ चुनाव भी कहा गया। अगर इसे सही मानें तो उस जनता ने ही ममता को हरा दिया, जिसके समर्थन का वो आखिर तक दम भरती रहीं। यह नारा भी खूब चला ‘पलटानों दरकार, बीजेपी सरकार।‘
चुनावी रणनीति की दृष्टि से बात करें तो केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि परिस्थिति, लक्ष्य, रणनीति और उस पर ठोस अमल कराने में उनका कोई सानी नहीं है। इस बार चुनाव में ममता अपना एक भी एजेंडा सेट नहीं कर पाईं। उल्टे वह एसआईआर, घुसपैठिए, गुंडागर्दी और स्त्री-सुरक्षा के मुद्दों पर भाजपा की पिच पर ही खेलती नजर आईं और उसका अपने तरीके से प्रतिकार करती रहीं। जबकि 2011 के विस चुनाव में उन्होंने अपने प्लास्टर चढ़े पैर के साथ व्हीलचेयर पर बैठकर पूरे बंगाल में प्रचार कर जबर्दस्त सहानुभूति बटोरी थी और भारी बहुमत से सत्ता में लौटी थीं। लेकिन इस बार भाजपा ने उन्हें किसी तरह का ‘विक्टिम कार्ड’ खेलने का मौका नहीं दिया। उलटे उनके सारे स्क्रू कस दिए। हालांकि आलोचकों ने इस घेराबंदी को ‘प्लेइंग लेवल’ के खिलाफ माना। लेकिन भाजपा के रणनीतिकारों ने इसकी परवाह नहीं की। भाजपा की बंपर जीत में पार्टी कार्यकर्ताअों की मेहनत के अलावा पिछले दिनो पड़ोसी बांग्लादेश में हिंदुअोंपर हुए हमले और नरसंहार ने भी पहली दफा बंगाली हिंदुअों को भीतर से हिला दिया। यह डर उनमें गहरे पैठ गया कि जनसांख्यिकी बदलाव यूं ही जारी रहा तो कल ऐसा उनके साथ भी हो सकता है। और यह डर केवल काल्पनिक नहीं था। इसी ने उस बंगाली भद्रलोक को भी विचलित कर िदया, जिसकी सामाजिक तथा धार्मिक सद्भाव की अलग परिभाषा और दुनिया रही है। लिहाजा बंगाल में पहली बार हिंदू वोट बड़े पैमाने पर ध्रुवीकृत हुआ।
इस चुनाव ने यह भी सिद्ध कर िदया कि अब नकद रेवड़ी योजनाएं चुनाव जीतने की सौ फीसदी गारंटी नहीं रहीं। वरना पैसा तो सभी सरकारें बांट रही थीं। लेकिन मतदाता और खासकर महिलाएं अब नकद नारायण के साथ सुशासन को भी जोड़कर देखने लगी हैं तो यह अच्छी बात है। दूसरे, यह व्यक्तिवादी और वंशवादी पार्टियों के लिए भी झटका है। इस हार के बाद ममता के भतीजे अभिषेक बैनर्जी और स्टालिन के बेटे उदयनिधि के राजनीतिक भविष्य पर भी प्रश्न चिन्ह लग गया है। तमिलनाडु में तो सनातन हिंदुत्व के खिलाफ झंडा बुलंद करने वाले मुख्यमंत्री स्टालिन ही हार गए हैं। तीसरे, बंगाल की इस पराजय ने राष्ट्रीय राजनीति में ममता के बढ़ते ग्राफ पर भी ग्रहण लगा दिया है। कहां वो दिल्ली पर विजय पताका फहराने वाली थी, कहां राइटर्स बिल्डिंग से उनका झंडा उतर गया है। उससे भी बड़ा झटका देश में समूचे विपक्ष और क्षेत्रीय पार्टियों को लगा है। उनके सामने अब यह संकट खड़ा है कि वो आखिर किस तरह की राजनीति करें और कैसे अपना वजूद कैसे बचाए रखें। ये पार्टियां अभी तक अल्पसंख्यक तुष्टिकरण, क्षेत्रवाद, भाषावाद, जातिवाद अथवा उत्तर दक्षिण की राजनीति करती आ रही थीं, िजसमें उन्हें सफलता भी मिल रही थी। लेकिन यह रास्ता उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत और आवश्यक विपक्ष की अोर नहीं ले जाता। क्योंकि भाजपा हजार हाथों से राजनीति करती है। संसाधन उसके पास हैं हीं। इसके अतिरिक्त देश के मुसलमानों को भी सोचना होगा कि किसी भी कीमत पर भाजपा को हराने की उनकी सोच उन्हे मुख्य धारा से किस तरह अलग थलग कर रही है।

लेखक ‘ सुबह सवेरे’ के कार्यकारी प्रधान संपादक हैं।