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रोक के बावजूद भी  गांवों में जल रही है नरवाई,धधक रहे खेत

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मुकेश साहू दीवानगंज रायसेन 

नेशनल ग्रीन ट्रव्यूबनल (एनजीटी) ने खेतों में खरपतवार अथवा पराली को जलाने पर रोक लगा रखी है। इसके बाद खुलेआम पराली और खेत में बचे ठूंठों को जला रहे हैं। इससे न सिर्फ पर्यावरण को नुकसान हो रहा है बल्कि खेतों की उर्वरा शक्ति भी प्रभावित हो रही है।

दीवानगंज क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले कई गांवों में रात के समय और सुबह के समय खेतों में आग लगाकर खेतों का ठूंठ जला रहे हैं। जबकि कुछ दिनों पहले ही जनसामान्य के हित, सार्वजनिक सम्पत्ति, पर्यावरण एवं लोक व्यवस्था को बनाए रखने के उद्देश्य से कलेक्टर एवं जिला दण्डाधिकारी अरुण कुमार विश्वकर्मा ने सम्पूर्ण जिले की भौगोलिक सीमा में खेत में खड़े डंठलों ,नरवाई में आग लगाने पर तत्काल प्रभाव से दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 144 के तहत प्रतिबंध लगाया हुआ है। इस आदेश का उल्लंघन पर भादवि की धारा 188 के अंतर्गत दण्डनीय होगा। इसके बावजूद भी कई खेतों में रोज नरवाई जल रही है। जिससे क्षेत्र में चारों ओर धुआं ही धुंआ नजर आ रहा है। सुबह के समय सांस लेने में भी कई लोगों को धुएं से तकलीफ भी होती है।

अपनी सुविधा के लिए खेत में आग लगाकर डंठलों,नरवाई को नष्ट कर खेत साफ किया जाता है। आग लगाने से हानिकारक गैसों का उत्सर्जन होता है, जिससे पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इसे नरवाई में आग लगाने की प्रथा के नाम से भी जाना जाता है नरवाई में आग लगाना खेती के लिए नुकसानदायक होने के साथ ही पर्यावरण की दृष्टि से भी हानिकारक है। इसके कारण इस वर्ष और विगत वर्षो में गंभीर अग्नि दुर्घटनाएं घटित हुई हैं तथा व्यापक सम्पत्ति की हानि हुई है। साथ ही बढ़ते जल संकट में इससे बढ़ोत्री तो होती ही है। साथ ही कानून, व्यवसायी के लिए भी विपरीत स्थितियां निर्मित होती है। खेत की आग के अनियंत्रित होने पर जनसम्पत्ति व प्राकृतिक वनस्पति, जीव-जन्तु आदि नष्ट हो जाते हैं। साथ ही खेत की मिट्टी में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले लाभकारी सूक्ष्य जीवाणु इससे नष्ट होते हैं जिससे खेत की उर्वरा शक्ति भी धीरे-धीरे घट रही है और उत्पादन प्रभावित हो रहा है। नरवाई जलाने से हानिकारक गैसों का उत्सर्जन होता है जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है। यदि फसल अवशेषों, नरवाई को एकत्र कर जैविक खाद जैसे भू-नाडेप वर्मी कम्पोस्ट आदि बनाने में उपयोग किया जाए तो यह बहुत जल्दी सड़कर पोषक तत्वों से भरपूर खाद बना सकते है। इसके अतिरिक्त खेत में कल्टीवेटर, रोटावेटर या डिस्क हेरो की सहायता से फसल अवशेषों को भूमि में मिलाने से आने वाली फसलों में जीवांश के रूप में बचत की जा सकती है।

पिछले कुछ सालों में दीवानगंज क्षेत्र में गेहूं की फसल को पकने के बाद हाथों से न काटकर मशीन के जरिए काटा जा रहा है। यह मशीन गेहूं की फसल को एक से डेढ़ फिट ऊपर से काटती है। इससे खेत में काफी मात्रा में ठूंठ बच जाता है। जबकि जो किसान हाथ से फसल की कटाई करते हैं उनके खेतों में यह समस्या नहीं आती है। मशीन से कटाई करने वाले खेत से ठूंट को हटाने के लिए पहले उसके ऊपर पराली को डालते हैं और फिर आग लगा देते हैं। इससे खेत की उर्वरा शक्ति छीड़ होने के साथ ही पर्यावरण को भारी नुकसान होता है। पराली के सही निस्तारण के लिए कृषि विभाग ने नए-नए प्रयोग किए हैं, लेकिन जागरूकता न होने के चलते वह आज भी खेतों में आग लगाना अधिक आसान समझते है।

पराली को जलाने के बजाय अगर ट्राइकोडर्मा बैक्टीरिया वाले कैप्सूल का उपयोग करके काफी कम समय में खाद तैयार कर सकता है। इतना ही नहीं इस कैप्सूल की लागत बहुत कम है। इसके बाद भी किसान चाहें तो पराली को गोठानों में दान कर सकते हैं। यहां पराली की मदद से कप प्लेट, चटाई जैसी कई चीजें बनाई जा रही है। यहां एक बेलर मशीन भी है। यह मशीन पराली को इकट्ठा करके उसे बड़े गोले में बदल देती है। इसका उपयोग आवश्यकता पडऩे सूखा चारा या अन्य चीजों में किया जा सकता है। बॉल बनने से पराली को आसानी कम जगह में रखा जा सकता है।

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