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क्या आर्थिक संरक्षण पर महिलाओं को सियासी आरक्षण ज्यादा भारी पड़ता?- अजय बोकिल

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 आलेख

अजय बोकिल 

देश की आधी आबादी यानी महिलाअों को 33 फीसदी राजनीतिक आरक्षण देने वाला ऐतिहासिक बिल लोकसभा में जिस तरह गिर गया, उससे कई सवाल उठ रहे हैं। पहला तो यह कि संसद में जरूरी संख्या के आधार पर यह बिल जब पास ही नहीं होना था तो सरकार ने इतनी कवायद क्या सोच कर की? ऐसी कौन-सी इमर्जेंसी थी कि इस ‍िबल को पांच राज्यों में चलती चुनाव प्रक्रिया के दौरान ही लोकसभा में पेश करना पड़ा? इस बिल को परिसीमन के साथ जोड़ने के पीछे मोदी सरकार की असली नीयत क्या थी? विपक्ष इस महत्वाकांक्षी बिल का विरोध करके भी खुद को ज्यादा आश्वस्त क्यों महसूस कर रहा है? बड़ा सवाल तो यह है कि इस उठापटक का असल राजनीतिक लाभ किसे और कितना होगा? और इस सियासी लाभ का व्यावहारिक औचित्य कितना है? क्या वर्तमान में 12 राज्यों की 13 करोड़ से ज्यादा महिला मतदाताअों को मिल रहे आर्थिक संरक्षण ( नकद रेवड़ी योजनाअों) के मुकाबले उन्हें राजनीतिक आरक्षण देने का ज्यादा फायदा सियासी दलों को होने वाला था या फिर यह सिर्फ एक नैतिक दावा और राजनीतिक खाम खयाली है? 

ताबड़तोड़ अंदाज में बुलाए लोकसभा के विशेष सत्र और विपक्ष के साथ ट्यूनिंग के अभाव के बावजूद मोदी सरकार यह बिल लाई तो उसके पीछे यह गलतफहमी थी कि महिला मतदाताअों के व्यापक हितों के मद्देनजर विपक्ष इसका विरोध नहीं करेगा, क्योंकि देश में कुल मतदाताअों का आधा महिलाएं हैं और इसके विरोध का अर्थ महिला वोटरों को नाराज कर सत्ता की चाबी गंवाना है। यही कारण था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद में अपनी गुहार में यहां तक कह दिया ‍िक भले ही विपक्ष इसे पास कराने की क्रेडिट ले ले, लेकिन हमारी नैया पार करा दे। लेकिन विपक्ष ने पूरे मामले को दूसरा टर्न देते हुए इस‍ बिल को लाने के पीछे की सरकार की नीयत पर ही सवाल खड़े कर दिए। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा कि इस ‍िबल को परिसीमन से जोड़ने का असली उद्देश्य देश का चुनावी नक्शा बदलना है न कि महिलाअों को आरक्षण देना। उनका आरोप इस आशंका पर आधारित है कि केन्द्र सरकार ने हाल में असम और जम्मू कश्मीर में जिस तरह से विधानसभा सीटों का परिसीमन कराया, उसका ज्यादा लाभ भाजपा को हुआ अथवा हो सकता है। दूसरा मुद्दा देश का लोस सीटों के आधार पर उत्तर और दक्षिण के विभाजन का था। आरोप है कि परिसीमन के बाद दक्षिण भारत के पांच राज्यों की तुलना में उत्तर भारत के ( खासकर उत्तर- पश्चिमी राज्य) की सीटें बहुत ज्यादा बढ़ जाएंगी, क्योंकि उनकी आबादी तेजी से बढ़ी है। इससे संसद में जनप्रतिनिधित्व का क्षेत्रीय संतुलन बिगड़ेगा। हालांकि केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने तमाम तकनीकी दिक्कतों और सरकार की साफ मंशा का हवाला देते हुए इन आरोपों का खंडन किया, लेकिन उनकी बातें विपक्षी एकता की दीवार को रत्तीभर भी नहीं भेद सकीं। परिणास्वरूप जिसे आजाद भारत के इतिहास में ऐतिहासिक संशोधन‍ बिल कहा जा रहा था, वह दो तिहाई बहुमत के अभाव में 54 मतों से ऐतिहासिक रूप से ‍िगर गया। यहां तक कि लोकसभा की कुल 74 महिला सांसदों में से भी विपक्षी 38 महिला सांसदों ने बिल के विरोध में वोट दिया। बिल गिरने से महिलाअों को 33 फीसदी राजनीतिक आरक्षण का लाभ 2029 में तो नहीं ही मिल पाएगा। मोदी सरकार के 12 साल के कार्यकाल में यह पहला मौका था, जब सरकार की संसद में विधायी पराजय हुई। संसदीय इतिहास में 1990 में पंचायत सशक्तिकरण संशोधन बिल के ‍राज्यसभा में गिरने के बाद यह पहला बिल है, जो लोकसभा में ही गिर गया। वैसे मोदी सरकार चाहती तो यह अत्यंत महत्वपूर्ण बिल अपने दूसरे कार्यकाल में ला सकती थी, जब एनडीए के अपने 353 सांसद थे और कोई भी संशाधन बिल आसानी से पारित हो सकता था। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।

हैरानी की बात यह है कि इस बिल के ‍िगरने के बाद मोदी सरकार और सत्तारूढ़ एनडीए इसमें अपनी नैतिक जीत देख रहे हैं, जबकि विपक्ष को लगता है कि इस बिल को गिरा कर उसने भारत को बचा लिया है। संसद में इस बिल पर 21 घंटे चली बहस के दौरान सबसे ज्यादा आरोप यही लगे कि इसके समर्थन और विरोध दोनो के मूल में राजनीतिक लाभ की आकांक्षा है, फिर वो चाहे आगामी लोकसभा चुनाव में हो या विधानसभा चुनावों में। भाजपानीत एनडीए ने तो ऐलान कर दिया है कि वो इस मुद्दे को सड़कों तक ले जाएगी और बताएगी कि विपक्ष की महिला सशक्तिकरण को लेकर सोच क्या है। जब‍कि ‍िवपक्ष यह सोचकर बेफिकर है कि उसने महिला आरक्षण की आड़ में देश के चुनावी मा‍नचित्र में बदलाव की चाल को विफल कर ‍िदया है।

असली सवाल यह है कि देश की सर्वोच्च नीति निर्माता संस्था में महिलाअों को राजनीतिक आरक्षण की यह पहल अगर सफल हो भी जाती तो क्या इससे देश की करीब 70 करोड़ महिला आबादी को सचमुच आंदोलित कर पाती? इस आधी जनसंख्या की जमीनी आकांक्षाएं क्या केवल सत्ता में हिस्सेदारी है अथवा उनके लिए आर्थिक और सामाजिक संरक्षण इस आरक्षण की तुलना में बहुत ज्यादा और व्यावहारिक मायने रखता है? वजह साफ है। मोदी सरकार ने लोकसभा और विधानसभाअों में वर्तमान सीटों की संख्या एकमुश्त बढ़ाकर डेढ़ गुना करने का जो प्रस्ताव इस बिल में ‍िकया था, उसका लाभ कुलमिलाकर 2250 सीटों का होता। यानी लोकसभा में वर्तमान 545 सीटों के हिसाब से की महिलाअोंकी (33% आरक्षण के हिसाब से) 205 सीटें बढ़तीं, जबकि सभी 28 राज्यों और दो केन्द्रशासित प्रदेशों की विधानसभाअों में 2045 सीटों का इजाफा होता। यानी 70 करोड़ महिलाअों में से मात्र 2250 महिलाएं चुनकर विधानमंडलों में पहुंचतीं। इसमें राज्यसभा और विधानपरिषदों की सीटें शामिल नहीं हैं, क्योंकि उनकी संख्या बाद में तय होगी। तर्क दिया जा सकता है कि इस आरक्षण को महिलाअों की संख्या की बजाए उनके राजनीतिक-सामा‍‍जिक सशक्तिकरण, लैंगिक समानता और राजनीतिक नैतिकता की पवित्र मंशा के आईने में देखा जाना चाहिए। सही है। लेकिन अगर बिल पास होकर यह आरक्षण हो भी जाता तो असल फायदा कितनी महिलाअों को होता? कितनी महिलाएं ऐसी हैं, ‍‍जिनके लिए राजनीतिक आकांक्षाएं सर्वोपरि हैं, परिवार और आर्थिक स्वावलंबन बाद में हैं। विडंबना ये है कि अभी‍ ‍िजन नगरीय निकायों और पंचायतों में महिला प्रतिनिधियों के लिए पचास फीसदी आरक्षण लागू है, वहां भी कई जगह महापौर पति, पार्षद पति, पंच-सरपंच पति जैसी संविधानेतर संस्थाएं वजूद में आ गई हैं और बेखौफ दुकान चला रही हैं। इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि महिलाअों को राजनीतिक आरक्षण न दिया जाए या उन्हें उनके वा‍‍जिब अधिकारों से वंचित रखा जाए। लेकिन सिर्फ राजनीतिक लाभ की ही बात की जाए तो उनके लिए नकद रेवड़ी के रूप में दी जाने वाली छोटी-सी राशि भी किसी उस निर्वाचित पद की तुलना में ज्यादा मायने रखती है, ‍िजसके लिए यह सब राजनीतिक घमासान चल रहा है। सत्ता के खेल में इन लाभार्थी महिलाअोंकी भूमिका कहीं ज्यादा अहम, ठोस और निर्णायक है, यह बीते दो साल में हुए विधानसभा चुनावों ने साबित कर दिया है। भले ही यह नैतिक रूप से गलत हो, लेकिन इसकी व्यावहारिक उपयोगिता और वोट की ताकत चुनाव शास्त्र की किताबों में दर्ज हो चुकी है। ऐसे में चाहे महिलाअोंको राजनीतिक आरक्षण से होने वाले लाभ के दावे हों अथवा इसकी आड़ में सत्ता के चक्रव्यूह को भेदने के दावे हों, हकीकत में किसी को भी सियासी फायदा ज्यादा मिलेगा या घटेगा, इसकी संभावना बहुत कम है। अलबत्ता उन लोगों के राजनीतिक अरमानो को जरूर धक्का लग सकता है, जो महिला आरक्षण के बहाने परिवारवाद के विस्तार का एक और कोण तलाश रहे थे या फिर वो महिलाएं जिनके लिए राजनीति एक कॅरियर है, इनके अलावा राजनीतिक आरक्षण का यह मुद्दा नारी शक्ति को बहुत ज्यादा आंदोलित कर पाएगा, इसकी संभावना बहुत कम है।

– लेखक सुबह सवेरे के कार्यकारी प्रधान संपादक हैं

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