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ये कैसा समानता का अधिकार :: जनप्रतिनिधियों, टेक्स फ्री आम आदमी और शासकीय कर्मियों के लिए अलग-अलग नियम-हरीश मिश्र

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हमारे संविधान का मूलभूत सिद्धांत है समानता। लेकिन जब हम शासकीय कर्मचारी, जनप्रतिनिधियों और टेक्स फ्री आम आदमी के लिए बनाए गए नियमों की तुलना करते हैं, तो एक बड़ी विडंबना सामने आती है और वो है असमानता पूर्ण नियम।

लोक शिक्षण संचालनालय ने एक शिक्षक की दो से अधिक संतान होने के कारण नियुक्ति निरस्त कर दी। नियमानुसार, 2001 के बाद दो से अधिक संतान वाले शासकीय कर्मचारी सेवा या पद पर नियुक्ति के लिए पात्र नहीं होते।

शासकीय कर्मचारी अपनी व्यथा कैसे और किससे कहें? उन्हें कर्मचारी आचरण नियमावली के बंधन में बांध दिया गया है। यह भी कोई बंधन है, जिसमें सांस भी नियमावली के आधार पर लेने को बाध्य किया जाता है?

शासकीय कर्मचारियों के कितने बच्चे हों, इसके निर्णय का अधिकार दो से अधिक संतान वाले माननीय सांसदों और विधायकों के पास संवैधानिक रूप से सुरक्षित है।

दो से अधिक संतान वाले माननीय सांसद, विधायक सेवा या पद पर नियुक्ति के लिए पात्र होते हैं, लेकिन शासकीय कर्मचारी नहीं! यह संविधान से प्राप्त समानता का कैसा अधिकार है?

17वीं लोकसभा में 149 सांसद ऐसे हैं, जिनकी तीन या तीन से ज्यादा संतान हैं। भाजपा के 96 सांसद ऐसे हैं जिनके दो से ज्यादा संतान हैं। अन्य दलों के 33 ऐसे सांसद हैं, जिनके चार या चार से ज्यादा संतान हैं। दो सांसद ऐसे हैं, जिनके सात-सात बच्चे हैं और सदन में जनसंख्या नियंत्रण कानून पर सबसे ज्यादा मुखर भी यही सांसद रहे हैं।

माननीयों को संविधान संशोधन, नीति बनाने का अधिकार है, लेकिन ऐसा कोई संविधान संशोधन या नीति नहीं बनाते, जिससे उनके उन्मुक्त जीवन, अधिक संतान सुख को प्रतिबंधित किया जाए। वे जानते हैं, संविधान संशोधन या नीति बनी तो उनकी सेवा या पद से नियुक्ति निरस्त हो जाएगी।

जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951, चुनाव लड़ने के लिए अयोग्यता को सूचीबद्ध करता है, जिसमें आपराधिक दोषसिद्धि और भ्रष्ट आचरण शामिल हैं, लेकिन अधिक संतान वाले को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित नहीं करता।

इसी प्रकार, दो या दो से अधिक संतान वाले टेक्स फ्री आम आदमी शासकीय योजनाओं जैसे प्रधानमंत्री आवास, संबल योजना, आयुष्मान भारत योजना, अटल पेंशन योजना, किसान क्रेडिट कार्ड, किसान सम्मान निधि योजना, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, सार्वजनिक वितरण प्रणाली योजना, मुख्यमंत्री ग्रामीण पथ विक्रेता ऋण योजना, मुख्यमंत्री लाड़ली लक्ष्मी योजना, पीएम मुद्रा योजना और आरक्षण का लाभ ले रहे हैं। जन प्रतिनिधियों, टैक्स फ्री आम आदमी पर यह कानून लागू क्यों नहीं?

जो भी अधिक संतान का उत्पादन करें, उनको शासकीय योजनाओं और नीतियों के लाभ से वंचित किया जाना चाहिए। जब संविधान से समानता का अधिकार प्राप्त है, फिर सरकार का दोगला रवैया क्यों? संविधान की यही विडंबना है जनप्रतिनिधियों, टेक्स फ्री आम आदमी और शासकीय कर्मियों के लिए अलग-अलग नियम।

लेखक रायसेन के ख्यात पत्रकार हे।

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