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सहकारी संस्थाओं के कर्मचारी अधिकारो से वंचित

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सी के पारे रायसेन 

सहकारी संस्थाओं के कर्मचारी दिन-रात मेहनत कर केंद्र शासन और राज्य शासन की योजनाओं को जमीन पर उतारने का कार्य करते हैं। गेहूं खरीदी, समर्थन मूल्य पर अनाज क्रय, खाद-बीज वितरण, किसानों को आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराना तथा शासन की अनेक महत्वपूर्ण योजनाओं को सफल बनाने में इन कर्मचारियों की अहम भूमिका रहती है। किसान और शासन के बीच की सबसे मजबूत कड़ी यही कर्मचारी हैं।
इसके बावजूद कर्मचारियों को उनके अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है। शासन के नियम अनुसार कर्मचारियों को 62 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त तो कर दिया जाता है, लेकिन पेंशन, भविष्य निधि या अन्य सुरक्षा संबंधी सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई जातीं। यह कर्मचारियों के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार है।
इतना ही नहीं, यदि कोई कर्मचारी सेवा के दौरान या संस्था के आवास में रहते हुए मृत्यु को प्राप्त हो जाता है, तो उसके परिवार को संस्था की ओर से न तो किसी प्रकार की आर्थिक सहायता दी जाती है, न बीमा का लाभ और न ही अंतिम संस्कार के लिए कोई सहयोग। वर्षों तक सेवा देने वाले कर्मचारियों के साथ ऐसा व्यवहार बेहद दुखद और अमानवीय है।
इसलिए मांग की जाती है कि सहकारी संस्थाओं के कर्मचारियों को भी सम्मानजनक जीवन के लिए कम से कम ₹10,000 प्रतिमाह पेंशन अथवा सहायता राशि प्रदान की जाए तथा सेवा के दौरान मृत्यु होने पर परिवार को उचित आर्थिक सहायता और बीमा लाभ दिया जाए। शासन को इस गंभीर विषय पर तत्काल ध्यान देकर कर्मचारियों को न्याय दिलाना चाहिए, क्योंकि इन्हीं कर्मचारियों की मेहनत से सरकारी योजनाएं सफल होती हैं।

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