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छह साल से दोनों किडनियां खराब, हर सप्ताह दो बार डायलिसिस के सहारे जिंदगी की जंग लड़ रहा 31 वर्षीय गजेंद्र

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कोरोना काल में बिगड़ी थी तबीयत, अब किडनी ट्रांसप्लांट के लिए 15 से 18 लाख रुपए की जरूरत; मजदूर पिता के पास नहीं हैं इतने पैसे, तीन मासूम बेटियों के भविष्य पर भी मंडरा रहा संकट

माता-पिता किडनी देने को तैयार, लेकिन पिता को शुगर और मां की किडनी मैच नहीं होने से नहीं मिल पाया सहारा; बस से भोपाल जाकर करवाना पड़ता है डायलिसिस

मुकेश साहू दीवानगंज रायसेन

कहते हैं कि परिवार की खुशियां और बच्चों का भविष्य माता-पिता की सबसे बड़ी पूंजी होती है, लेकिन जब परिवार का जवान बेटा गंभीर बीमारी से जूझ रहा हो और उसके इलाज के लिए लाखों रुपए की जरूरत हो, तो गरीब परिवार के सामने जिंदगी बचाने का संघर्ष खड़ा हो जाता है। ऐसा ही दर्दनाक मामला सांची विकासखंड के ग्राम अंबाडी में सामने आया है। यहां रहने वाले 31 वर्षीय गजेंद्र साहू पिछले छह वर्षों से दोनों किडनियां खराब होने के कारण जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं। हर सप्ताह दो बार भोपाल जाकर डायलिसिस करवाना उनकी मजबूरी बन गई है। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर है कि किडनी ट्रांसप्लांट के लिए डॉक्टरों द्वारा बताए गए 15 से 18 लाख रुपए जुटाना उनके लिए असंभव साबित हो रहा है।

हर सप्ताह दो बार भोपाल का सफर, बस से अस्पताल पहुंचने की मजबूरी

पिछले छह वर्षों से गजेंद्र को जीवित रहने के लिए सप्ताह में दो बार डायलिसिस करवाना पड़ रहा है। पहले वे भोपाल मेमोरियल अस्पताल में डायलिसिस करवाते थे, लेकिन वर्तमान में भोपाल के मिसरोद स्थित एक निजी अस्पताल में उनका उपचार चल रहा है। गजेंद्र ने बताया कि उन्हें अंबाडी से भोपाल आने-जाने के लिए बस का सहारा लेना पड़ता है। बीमारी की हालत में बस से लंबा सफर करना काफी मुश्किल और तकलीफदेह होता है, लेकिन जीवन बचाने के लिए यह परेशानी उठाना उनकी मजबूरी है। हर सप्ताह दो बार अस्पताल पहुंचना, डायलिसिस करवाना और फिर वापस गांव लौटना उनकी दिनचर्या बन चुकी है। हाथ में बार-बार मशीन लगाने से हाथ की स्थिति खराब हो चली है

परिवार के अनुसार डॉक्टरों ने किडनी ट्रांसप्लांट के लिए करीब 15 से 18 लाख रुपए का खर्च बताया है। इतनी बड़ी रकम सुनकर परिवार की चिंता और बढ़ गई है। गजेंद्र के पिता हेमराज साहू मेहनत-मजदूरी करके परिवार का भरण-पोषण करते हैं। घर की आर्थिक स्थिति कमजोर है और परिवार कच्चे मकान में रहता है। रोज मजदूरी करके जितनी आमदनी होती है, उसी से घर का खर्च और बेटे के इलाज की जरूरतें पूरी करने का प्रयास किया जाता है। कई बार ऐसा भी होता है कि हेमराज साहू मजदूरी करने जाते हैं और इसी दौरान बेटे की तबीयत बिगड़ने की सूचना मिलती है। ऐसे में उन्हें काम छोड़कर तुरंत बेटे को लेकर भोपाल जाना पड़ता है। एक तरफ बेटे की जिंदगी बचाने की चिंता है तो दूसरी तरफ परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी।

तीन छोटी बेटियों का पिता, बीमारी के कारण परिवार पर दोहरी मार

गजेंद्र साहू की तीन छोटी-छोटी बेटियां हैं। परिवार के लिए सबसे बड़ी चिंता बेटियों के पालन-पोषण और उनके भविष्य की भी है। बीमारी के कारण गजेंद्र पहले की तरह मेहनत-मजदूरी नहीं कर पाते। डॉक्टरों ने उन्हें वजन उठाने और अधिक शारीरिक मेहनत करने से मना किया है। इसके चलते वे परिवार की आर्थिक मदद भी नहीं कर पा रहे हैं। परिवार के भरण-पोषण के लिए वे कभी-कभार सप्ताह में एक या दो बार साप्ताहिक हाट-बाजार तक ही जा पाते हैं। ऐसे में पत्नी, तीन बेटियों और बुजुर्ग माता-पिता की जिम्मेदारी परिवार के सामने बड़ी चुनौती बन गई है।

गजेंद्र अपने माता-पिता, पत्नी और तीन बेटियों के साथ कच्चे मकान में रहते हैं। परिवार के पास न तो इतनी जमा पूंजी है और न ही आय का कोई स्थायी साधन, जिससे इलाज के लिए लाखों रुपए की व्यवस्था की जा सके। छह वर्षों से बीमारी का बोझ उठाते-उठाते परिवार आर्थिक और मानसिक रूप से परेशान हो चुका है। एक तरफ नियमित डायलिसिस का खर्च और अस्पताल आने-जाने की परेशानी है तो दूसरी तरफ तीन बेटियों की परवरिश और भविष्य की चिंता। परिवार को अब किसी ऐसे सहारे की जरूरत है, जिससे गजेंद्र का बेहतर उपचार हो सके।

सरकारी सहायता और समाजसेवियों से मदद की उम्मीद

ग्राम अंबाडी के इस परिवार को अब शासन-प्रशासन, जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संस्थाओं और समाजसेवियों से मदद की उम्मीद है। यदि समय रहते परिवार को आर्थिक सहायता और उचित उपचार की व्यवस्था मिल जाए तो गजेंद्र के किडनी ट्रांसप्लांट की राह आसान हो सकती है। छह वर्षों से बीमारी से जूझ रहे गजेंद्र और उनका परिवार आज भी इस उम्मीद में है कि कोई मददगार आगे आएगा और परिवार की जिंदगी में फिर से खुशियां लौट सकेंगी।

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