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ग्राम पड़ाझिर में चल रही श्रीमद् भागवत महापुराण कथा के प्रथम दिवस कलश यात्रा धूमधाम से निकाली गई

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बेगमगंज रायसेन । ग्राम पड़ाझिर में चल रही श्रीमद् भागवत महापुराण कथा के प्रथम दिवस में कलश यात्रा बड़ी धूमधाम से निकाली गई  कथा व्यास पं. कमलेश कृष्ण शास्त्री जी महाराज की तिन्सुआ वाले बेगमगंज ने प्रथम दिवस में कहा इस बाह्य जगत् में कुछ भी स्थायी नहीं; परिवर्तन ही प्रकृति का शाश्वत नियम है। अतः जीवन की प्रतिकूलताओं से विचलित न हों। धैर्य, साहस और विश्वास के साथ परिस्थितियों का सामना करें, क्योंकि प्रत्येक अंधकार के पीछे एक नवीन प्रभात प्रतीक्षारत रहता है।

परिवर्तन प्रकृति का सनातन, अटल और अपरिवर्तनीय विधान है, जिसे समझ लेना ही वास्तविक ज्ञान का आरम्भ है। यथार्थ में यह समस्त सृष्टि नाम-रूपात्मक आवरणों का विस्तार मात्र है, जिसके भीतर नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त ब्रह्म का अखण्ड प्रकाश विद्यमान है। जो साधक इस परिवर्तनशील जगत के मिथ्यात्व को समझकर उस शाश्वत तत्त्व का साक्षात्कार कर लेता है, वही तत्त्वदर्शी, ज्ञानी और मुक्त पुरुष कहलाने का अधिकारी होता है।

मनुष्य को प्राप्त यह दुर्लभ मानव-देह केवल विषय-भोग और क्षणिक सुखों की प्राप्ति के लिए नहीं, अपितु आत्मबोध, ईश्वर-प्राप्ति और परम सत्य के साक्षात्कार हेतु है। यदि वह विषय-वासनाओं के दलदल में फँसकर अपने जीवन को व्यर्थ करता है, तो वह अपने परम उद्देश्य से विमुख होकर अज्ञान के अंधकार में ही विचरता रहता है।

ज्ञानी पुरुष वही है, जो परिवर्तनशीलता के इस गूढ़ रहस्य को समझकर समत्वभाव में स्थित रहता है। वह सुख-दुःख, लाभ-हानि, यश-अपयश जैसे समस्त द्वन्द्वों से परे होकर अपने कर्तव्य-पथ पर अडिग रहता है। बाधाएँ और व्यवधान उसके लिए अवरोध नहीं, अपितु साधना के सोपान बन जाते हैं। वह परिस्थितियों का दास न होकर उनका साक्षी बन जाता है।

जब साधक के अन्तःकरण में ज्ञान का उदय होता है, तब उसके जीवन में षट्सम्पत्तियाँ स्वतः प्रकट हो जाती हैं शम, दम, तितिक्षा, उपरति, श्रद्धा और समाधान। शम से चित्त में शान्ति का उदय होता है, दम से इन्द्रियों का संयम स्थापित होता है, तितिक्षा से द्वन्द्वों को सहन करने की क्षमता उत्पन्न होती है, उपरति से विषयों के प्रति आसक्ति क्षीण हो जाती है, श्रद्धा से सत्य के प्रति अटूट निष्ठा जागृत होती है, और समाधान से साधक परम सत्य में स्थित होकर समस्त शंकाओं का अंत कर देता है।

प्रकृति का यह अनवरत चक्र निरंतर यही उद्घोष करता है कि जो उदित हुआ है, उसका अस्त होना निश्चित है। प्रातःकाल का उदित होता सूर्य जहाँ जीवन के स्पन्दन को जागृत करता है, वहीं सायंकाल का अस्ताचल यह सन्देश देता है कि प्रत्येक आरम्भ का एक अन्त भी सुनिश्चित है। नूतनता कालान्तर में पुरातनता में परिवर्तित हो जाती है, वर्तमान क्षण भूतकाल में विलीन हो जाता है, और भूतकाल के गर्भ से भविष्य की उत्पत्ति होती रहती है।

इस संसार में जन्म और मृत्यु का यह अखण्ड क्रम केवल परिवर्तन के सत्य को प्रतिपादित करता है। यहाँ तक कि दिव्य अवतार भी इस नियम से अतीत नहीं हैं; उन्होंने भी अवतार लेकर अपने कर्तव्य का निर्वहन किया और पुनः लीन हो गये। अतः साधारण मनुष्य को इस सत्य को समझकर अहंकार का परित्याग करना चाहिए और अपने जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास करना चाहिए।

मनुष्य के दुःख का मूल कारण परमात्मा से उसकी दूरी है, और उसके आनन्द का आधार परमात्मा की निकटता है। जब वह अपने भीतर स्थित उस परम सत्ता को अनुभव करता है, तब उसके जीवन में एक अद्वितीय शान्ति और आनन्द का संचार होता है। संसार के आकर्षणों के पीछे दौड़ने की अपेक्षा यदि वह उस परम कारण, उस परम तत्त्व की शरण ग्रहण करे, तो उसका जीवन कृतार्थ हो जाता है।

समर्पण ही साधना का सार है। जब मनुष्य यह भाव धारण कर लेता है कि उसे जो कुछ भी प्राप्त हुआ है, वह ईश्वर की कृपा का प्रसाद है, तब उसके भीतर विनम्रता, कृतज्ञता और भक्ति का उदय होता है। उसे चाहिए कि वह प्रभु से भौतिक वस्तुओं की याचना न कर, अपितु निर्मल बुद्धि, पवित्र हृदय और अचल भक्ति की कामना करे।

धर्म के अनुकूल अर्जित अर्थ और संयमित काम ही अन्ततः मोक्ष के पथ को प्रशस्त करते हैं। सत्य का ग्रहण और असत्य का परित्याग ही जीवन की वास्तविक साधना है। यह सूक्ष्म भेद केवल वही ज्ञानी समझ सकता है, जिसने अपने अन्तःकरण को शुद्ध और जागृत किया है।

यह समस्त जगत परमात्मा की लीला है—एक ऐसा चिरनूतन प्रवाह, जिसमें परिवर्तन के माध्यम से सृजन का चक्र निरंतर चलता रहता है। जैसे वृक्ष में नयी कोपलें फूटती रहती हैं, वैसे ही इस सृष्टि में भी नित्य नवीनता का संचार होता रहता है।

आवश्यक है कि मनुष्य अपने हृदय-गृह को इस प्रकार पवित्र, निर्मल और सज्जित करे कि उसमें परमात्मा का सहज निवास हो सके। जब हृदय में श्रद्धा, प्रेम, शान्ति और समर्पण का दीप प्रज्वलित होता है, तब जीवन का वास्तविक सौन्दर्य प्रकट होता है और साधक परम सत्य के साक्षात्कार की ओर अग्रसर होता है। यही जीवन का परम पुरुषार्थ है, यही आत्म-सिद्धि का परम पथ है।

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