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“नश्वर देह” की अपेक्षा “अविनश्वरआत्मा” से जुड़ना ही सच्चा पुरुषार्थ है- मुनि श्री प्रमाणसागर

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अविनाश जैन विदिशा

“शरीर” की नश्वरता को आज तक न तो कोई सम्हाल पाया है,और न सम्हाल पाऐगा,फिर इस शरीर से इतना मोह क्यों? उससे नाता तोड़ो!प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया आगामी 4 अक्टूबर से 12 अक्टूबर तक मुनिसंघ के सानिध्य में संस्कृत भाषा में 1008 श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान का आयोजन अवधपुरी के विशाल पांडाल में संपन्न होंने जा रहा है जिसके सभी मंडल पुण्यार्जकों की पात्र शुद्धी एवं विधान संकल्प दृग बंधन विधानाचार्य अभय भैया के द्वारा रविवार को प्रातः7 बजे से जिनालय परिसर में किया जाऐगा तत्पश्चात मुनि श्री के मुखारविंद से शांतिधारा संपन्न होगी। मुनि श्री ने कहा कि जो आत्मा अजर अमर अविनाशी तथा शास्वत है,उसकी शक्ति पहचानो,तथा
उसे उदघाटित करो और उससे अपना नाता जोड़ो!उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने अवधपुरी में व्यक्त किये।मुनि ने जीवन को शरीर और सांसों का गठवंधन बताते हुये कहा कि बिचार कीजिये कि यह क्यों मिला? किसलिये मिला? उत्तर देते हुये कहा कि मनुष्य भव ही ऐसा भव है जिसमें जीव त्याग तप और संयम की आराधना करके अपने जीवन का अपनी आत्मा का उद्धार कर सकता है,अन्यत्र किसी भी पर्याय में यह सुविधा नहीं है जिससे आत्मोद्धार का मार्ग प्रशस्त हो! मुनि श्री ने कहा कि बिचार करो कि जीवन का बहुमूल्य समय बीत गया मैने क्या किया? शरीर का पोषण,सम्पत्ति का संग्रह, सम्वंधों के विस्तार जैसे गोरखधंधा में ही तो उलझकर रह गये,अपनी उसआत्मा के लिये क्या किया जो सदैव आपके साथ रहने वाली है? थोड़ी देर के लिये कांपी पेन उठाइये और अपने ही प्रश्न का उत्तर लिखिये -मेंने शास्वत आत्मा के लिये क्या किया? और क्या करना चाहिये था? जब अपने हाथ सेअपना अंतर विश्लेषण कर उत्तर लिखेंगे तो आपको अहसास होगा कि बास्तव में मेरी कंही चूक हुई है,यह मेरा बहूत बड़ा नुकसान है,लेकिन अब मुझे बदलना है जब तक अपनी भूल का अपनी कमी का अहसास नहीं करोगे तब तक अपने भीतर बदलाव कर पाना असंभव है, जैसे व्यापार में बेलेंससीट को देखकर अपने व्यापार की कमजोरी को दूर करने का पुरुषार्थ करते हो,ठीक बैसे ही अपने अंदर की कमियों को खुद ढ़ूढो़ और उसे ठीक करो मुनि श्री ने कहा कि 25 वर्ष पहले जब में आया था तब के भोपाल में और अब के भोपाल में बहूत अंतर है पहले की अपेक्षा आज सभी लोग धन संपन्न नजर आ रहे है मुनि श्री ने कहा कि धनसंपदा खूब इकट्ठा कर लिया लेकिन धर्म जंहा के तंहा है,उसमें कोई बड़ोत्तरी नजर नहीं आ रही जो आपकी असली संपत्ति है, मुनि श्री ने कहा कि यह सच है कि जीवन में धन बहूत जरूरी है लेकिन ध्यान रखना जीवन में धर्म उससे ज्यादा बहूत जरूरी है,यह बात अगरआपके अंतरंग में बैठी होती तो आज जीवन की दिशा और दशा दौनों बदल गयी होती मुनि श्री ने कहा कि एक बार एक बुजुर्ग व्यक्ति से पूंछा कि पूरा जीवन निकल गया आखिर जीवन की दिशा कब बदलोगे? तो उसने बहूत ही गम्भीरतापूर्वक कहा कि यह जीवन तो निकल ही गया अब तो अगले जन्म में बदलाव घटित हो पाऐगा’ तो मुनि श्री ने कहा कि यह जरूरी नहीं कि अगला भव तुम्हें मनुष्य रूप ही मिले! कीड़े मकोड़े, पशुपक्षी,अथवा जानवर बनकर तुम अपना उद्धार नहीं कर सकते यंहा तक कि देव भी अपनी उसी पर्याय में अपने आत्मतत्व को पाने में असफल रहते है।

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