भिलाई। वो राम भक्ति का चरम था। उत्साह की पराकाष्ठा थी। कार सेवकों ने साढ़े सात घंटे में पांच सौ वर्षों के कलंक को ढहा दिया। रात भर मलबा हटाया, उसी रात मंदिर का निर्माण भी शुरू हो गया। दूसरे दिन पांच फीट की चार दीवारी के भीतर रामलला का प्राण प्रतिष्ठा भी किया गया। मलबा खुदाई के दौरान रामलला के जन्मस्थली से जो प्रमाण निकले, उसने पूरे कार सेवकों को भाव विभोर और धन्य कर दिया।
संघ से जुड़े भिलाई के भाजपा नेता बुद्धन सिंह ठाकुर उन भाग्यशाली लोगों में से हैं, जिन्होंने छह से सात दिसंबर 1992 तक का पूरा घटनाक्रम देखा, उसे जिया। वे बताते हैं कि वह तब विहिप के जिला मंत्री थे। कार सेवा का निर्णय हुआ। भिलाई से 101 कारसेवक तीन दिसंबर को सारनाथ एक्सप्रेस में बैठकर अयोध्या के लिए रवाना हुए। चार दिसंबर को इलाहाबाद पहुंचे। वहां से दूसरी ट्रेन पकड़कर पांच दिसंबर को फैजाबाद स्टेशन पहुंचे।
अयोध्या में संघ व भाजपा द्वारा कारसेवकों के रुकने-खाने की पूरी व्यवस्था की गई थी। उस रात भिलाई के कार सेवक रामलला के दर्शन व बाबरी ढांचे को देखने निकले। चारों तरफ सेना लगी हुई थी। बाबरी ढांचे के आसपास बैरिकेडिंग की जा रही थी। छह लाख कार सेवक अयोध्या पहुंचे चुके थे। रात डेढ़ बजे आग तापते कुछ पुलिस वाले मिले। उन्होंने कारसेवकों से कहा कि इस बार आए हो, तो बिना ढांचे गिराए वापस मत जाना, अभी नहीं तोड़ पाए तो फिर कभी नहीं तोड़ पाओगे।
बुद्धान सिंह ठाकुर बताते हैं कि उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने सेना को यह कहते हुए वापस जाने के लिए कह दिया कि उत्तर प्रदेश पुलिस काफी है, संभाल लेगी। उत्तर प्रदेश पुलिस को भी उन्होंने निर्देशित कर दिया कि किसी भी कारसेवक पर अश्रु गैस ना छोड़े जाए, न ही बेंत प्रहार हो। सुबह सारे कारसेवक सरयू नदी में स्नान कर श्रीराम का जयघोष करते हुए बाबरी ढांचे की तरफ रवाना होने लगे। वहां नीम का एक पेड़ था, जिस पर चढ़कर कारसेवक मस्जिद के गुंबद पर चढ़ने लगे।
रामलला की जन्मस्थली पर दीवार खड़ी की जाती रही। जब देहरी की खुदाई हुई तो उसमें गोस्वामी तुलसीदासजी की चार फीट की अलौकिक प्रतिमा निकली। साथ में 78 किलो का घंटा व रामलला का पालना निकला। सुबह-सुबह प्राण प्रतिष्ठा कर दी गई। सात दिसंबर को कल्याण सिंह ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उसके साथ ही पूरी अयोध्या में सेना के हेलीकाप्टर मंडराने लगा।