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ख्वाहिशें तो हजार हैं देखें सियासत किसका साथ देती हैं

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कांग्रेस ने ‘राष्ट्रीय मुद्दा’ बन चुकी शहर कांग्रेस अध्यक्ष की नियुक्ति का मसला तो सुलझा लिया है लेकिन अब चुनावी मसले पूरी ताकत से सामने आने लगे हैं। शहरी विधानसभा क्षेत्र तो ठीक जिले के ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र में दावेदारों के उग्र शक्ति प्रदर्शन से बड़े नेताओं के हाथ-पैर फूल रहे हैं। अब पिछले दिनों महू के पातालपानी क्षेत्र में कांग्रेस के प्रदर्शन में जिला कांग्रेस अध्यक्ष सदाशिव यादव और कांग्रेस नेता अंतरसिंह दरबार समर्थकों ने पूर्व केबिनेट मंत्री और इंदौर के प्रभारी जयवर्थन सिंह के समक्ष जिस अंदाज में शक्तिप्रदर्शन किया उसने यह संकेत तो दे ही दिया है कि टिकट वितरण इंदौर में आसान नहीं होगा। दोनों ग्रामीण नेताओं के बीच मंच पर जो हुआ उसे संभालने के लिए खुद जयवर्धन को हस्तक्षेप करना पड़ा। कांग्रेस भले ही प्रदेश में माहौल अपने पक्ष में मानकर चल रही है लेकिन अपनी पार्टी के नेताओं को चुनाव के पहले एक मत और एक मंच पर लाना किसी चुनौती से कम नहीं होगा

विधानसभा चुनाव की धमक के बीच इन दिनों पूरे प्रदेश में जो माहौल बन रहा है उसे देखकर लगता है योजनाओं के बखान और घोषणाओं के वादों से इतर किसी दल में कुछ नहीं हो रहा है। वर्तमान भाजपा सरकार जहां लाड़ली बहाना और मुख्यमंत्री सीखो-कमाओ योजना में जीत की राह देख रही है तो विपक्षी दल कांग्रेस के नेता भाजपा की ही योजना को अधिक राशि बढ़ाकर देने में सफलता हाथ लगती नजर आ रही है। कांग्रेस ने भी अपनी सरकार बनने पर युवाओं के लिए स्वरोजगार और कौशल विकास की घोषणा कर डाली। इससे मालवा-निमाड़ क्षेत्र के वे विधायक जो घोषणाओं की नाव में योजनाओं की पतवार लेकर ‘चुनावी वैतरणी‘ पार करने का स्वप्न संजोए बैठे हैं खासे परेशान हैं। क्षेत्र में अपने विरोधियों के तीरों का सामना करते-करते योजनाओं से उम्मीद नजर भर आती है कि विपक्षी नई घोषणा के साथ मैदान संभाल लेते हैं। सियासत की नदी में किस-किस की नैया पार होगी ये तो अब वक्त ही बताएगा।

…भीड़ तंत्र बनाम वोट तंत्र

गृहमंत्री अमित शाह के भोपाल दौरे से भाजापाइयों में कितना जोश भरा और कितनी धरातल नजर आई ये तो वक्त ही बताएगा लेकिन भाजपाईयों में यह चर्चा अवश्य चल पड़ी कि सभाओं, रैलियों में उमड़ रही भीड़ क्या वोट में बदल पाएगी। इस चर्चा की शुरुआत शाह की बैठक के बाद हुई जब वरिष्ठ भाजपा नेताओं ने मालवा-निमाड़ क्षेत्र के दो जिलों खरगोन और धार में भाजपा के आयोजनों में अच्छी भीड़ उमड़ने को अपनी उपलब्धि बताते हुए नंबर बढ़ाने की भूमिका बांधी। इस पर कुछ नेताओं ने पिछले अनुभव सामने रखते हुए भीड़तंत्र के पूरी तरह वोट में बदलने पर भरोसा नहीं करने की सलाह दी। इन नेताओं ने वर्ष 2018 में मालवा-निमाड़ के ही जिलों में हुए आयोजनों के उदाहरण भी सामने रख दिए जहां भीड़ तो अच्छी उमड़ी लेकिन पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। आयोजनों की सफलता से फूले नहीं समा रहे भाजपा नेता इस नए फार्मूले के बाद मायूस हैं। आगे क्या करना है के जवाब में आप ही बता दो जैसे जुमले वरिष्ठ नेताओं की और उछाले जाने लगे हैं।

अब नाराज भाजपा और उम्रदराज भाजपा की पूछपरख

जब से भाजपाइयों को इस सत्य का भान हुआ कि प्रदेश में कार्यकर्ता उपेक्षा से नाराज हैं तब से वरिष्ठ नेताओं ने ट्रैक बदल लिया है। चाहे मालवा-निमाड़ हो या विंध्य-महाकौशल या फिर ग्वालियर -चंबल सभी जगह चुन-चुनकर नाराज नेताओं की पूछपरख होने लगी है। पार्टी की प्रदेश इकाई से स्थानीय विधायक-सांसदों के साथ ही संगठन के पदाधिकारियों को निर्देश मिल चुके हैं कि वरिष्ठ नेताओं को खुद फोन कर आयोजनोंं के लिए न सिर्फ आमंत्रित करें बल्कि उन्हें सम्मान मंच पर बैठाएं। इसके बाद भाजपाई आयोजनों में युवा भाजपा के बजाय अनुभवी भाजपा के चेहरे फिर नजर आने लगे हैं। मालवा-निमाड़ के नाराज नेताओं को मनाने के लिए एक के बाद एक वरिष्ठ नेता पहुंच रहे हैं। बातें टिकट से शुरू होकर निगम-मंडल तक पहुंच रही हैं। देखना यह है कि सहमति किस पर बनती है।

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