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हाई कोर्ट ने नर्सिंग कालेजों के संचालन को लेकर जताई नाराजगी की ऐसी टिप्पणी

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ग्वालियर। हाई कोर्ट की युगलपीठ ने बुधवार को पोस्ट बेसिक बीएससी नर्सिंग प्रथम वर्ष व बीएससी नर्सिंग प्रथम वर्ष के विद्यार्थियों के प्रवेश व उनकी परीक्षा को लेकर नाराजगी जताई। कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि हमें आश्चर्य है कि ऐसे लोग सरकार में बैठे हैं, जिन्हें प्रदेश के लोगों के स्वास्थ्य की चिंता तक नहीं है।

कोर्ट ने महाधिवक्ता से कहा कि ऐसे विद्यार्थियों को नर्सिंग का सर्टिफिकेट दे रहे हैं, जिन्होंने न पढ़ाई की है न कक्षा में उपस्थित हुए हैं। प्रैक्टिकल भी नहीं किए हैं। इस तरह के 20 हजार मेल व फीमेल नर्सिंग स्टाफ प्रदेश के अलग-अलग अस्पतालों में पहुंच जाएंगे। जिन्हें ब्लड प्रेशर नापना भी नहीं आता है। मरीज को कब और कौन सी दवा देनी है, यह भी समझ नहीं होती है। मरीज का 85 प्रतिशत समय नर्स की निगरानी में बीतता है। ऐसा नर्सिंग स्टाफ अस्पतालों में मरीजों की क्या हालत करेगा।

महाधिवक्ता प्रशांत सिंह कोर्ट के सवालों का जवाब नहीं दे सके। कोर्ट ने याचिका की तारीख बढ़ाते हुए 25 अप्रैल सुनवाई के लिए निर्धारित की है। आदेश दिया है कि उनके सवालों के जवाब के साथ फिर से उपस्थित रहें। याचिका की सुनवाई न्यायमूर्ति रोहित आर्या व न्यायमूर्ति सत्येंद्र कुमार सिंह ने की।

कोर्ट ने महाधिवक्ता से इस तरह के सवाल किए

– कोर्ट ने पूछा कि क्या भूतलक्षी प्रभाव में कालेजों को संबद्धता व मान्यता देना उचित है। महाधिवक्ता भी इस तरह की संबद्धता से सहमत नहीं दिखे।

– महाधिवक्ता ने कहा कि हमने हलफनामा पेश कर दिया है। जिसमें पूरी बातें लिखी हैं। कोर्ट ने कहा कि हमने हलफनामे काफी देख लिए हैं। हम आपकी कार्रवाई को देखना चाहते हैं।

– कोर्ट ने कहा कि महाधिवक्ता प्रदेश का जिम्मेदार व्यक्ति है। यह पूरी सरकार का प्रतिनिधित्व करता है, लेकिन उन्होंने कह दिया कि 20 हजार विद्यार्थियों का रिकार्ड उनके पास नहीं है। आपकी सरकार ने सोच लिया कि हमने जो आदेश दिया है, वह सब ठीक है। परीक्षा पर स्टे कर दिया है, सरकार उसे खत्म कराने के लिए बड़ी जल्दबाजी में दिख रही है।

– कोर्ट ने कहा कि मध्य प्रदेश नर्सिंग काउंसिल का रिकार्ड हम यहां बुलाकर अपनी आंखों से देख चुके हैं। दो-दो कागजों पर मान्यता व संबद्धता दी गई है। नर्सिंग कालेजों की तीसरी बार इस तरह की स्थिति देख रहे हैं। ऐसे कालेजों पर आप कार्रवाई करना नहीं चाहते हैं। सीबीआइ जांच में शामिल नहीं होना चाहती है।

– महाधिवक्ता ने सीबीआइ जांच का विरोध किया। कोर्ट ने कहा कि हम एक-एक कालेज के संबंध में जानकारी पूछेंगे। आप जो जानकारी देंगे, उसकी वास्तविकता की भी जांच कराएंगे।

– कोर्ट ने बहस के दौरान अपनी मंशा स्पष्ट करते हुए कहा कि प्रदेश में वास्तविक कालेज संचालित होने चाहिए। इसमें प्रवेश भी वास्तविक विद्यार्थियों के होने चाहिए।

– कोर्ट ने महाधिवक्ता से कहा कि जो संबद्धता व मान्यता की प्रक्रिया बता रहे हैं, वह कागजों में लिखी हुई है, लेकिन उसका पालन नहीं हो रहा है।

क्या है मामला

दरअसल दिलीप कुमार शर्मा ने पोस्ट बेसिक बीएससी नर्सिंग प्रथम वर्ष व बीएससी नर्सिंग प्रथम वर्ष की परीक्षा को लेकर जनहित याचिका दायर की है। याचिकाकर्ता ने कोर्ट के संज्ञान में लाया कि मध्य प्रदेश मेडिकल साइंस यूनिवर्सिटी जबलपुर ने जुलाई 2022 से जनवरी 2023 के बीच कालेजों को संबद्धता दी। संबद्धता के बाद 11 से 18 फरवरी 2023 के बीच विद्यार्थियों का नामांकन किया गया। 28 फरवरी 2023 से परीक्षाओं की तारीख घोषित कर दी। संबद्धता देने से पहले विश्वविद्यालय ने विद्यार्थियों का सत्यापन नहीं किया। विद्यार्थी ने कब प्रवेश लिया, यह भी नहीं देखा। जुलाई 2022 से जनवरी 2023 के बीच संबद्धता दी जा रही है और परीक्षाएं सत्र 2019-20 व 2020-21 की कराई जा रही हैं। जिनकी परीक्षा कराई जा रही हैं, उन्होंने चार साल पहले प्रवेश लिया था। बैक डेट में संबद्धता दी गई है। कोर्ट ने 28 फरवरी 2023 को होने वाली परीक्षा पर रोक लगा दी थी। इस रोक को हटाने के लिए मेडिकल यूनिवर्सिटी व मध्य प्रदेश नर्सिंग काउंसिल ने आवेदन पेश किया है। महाधिवक्ता पैरवी के लिए कोर्ट में उपस्थित हो रहे हैं।

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