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पानी के लिए तरस रहे ग्रामीण और किसान: बारिश में हुआ था मिट्टी का कटाव,डैम की गुणवत्ता पर उठ रहे सवाल

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सूख गई नदी,गर्मियों में हो सकता है पानी के लिए हाहाकार

आश्वासन के बदले डैम के लिए निजी जमीनों का किया था कंपनी ने इस्तेमाल :पांच साल दिया काम, पिछले तीन महीने से नगर परिषद ने नहीं दिया मानदेय

रिपोर्ट धीरज जॉनसन दमोह

दमोह:गर्मियों का मौसम आते ही जिले की वर्षा जनित मौसमी नदिया, जिनका सतत प्रवाह नही है अब उनमें पानी की कमी परिलक्षित होने लगी है जिसका प्रभाव कृषकों, ग्रामीणों सहित घरेलू स्तर पर भी
झलकने लगा है।


पथरिया तहसील के ग्राम बड़े बांसा के निकट सतौआ के पास सुनार नदी पर बने डैम के टूट जाने और मिट्टी के कटाव से कृषि भूमि का नुकसान हुआ और पथरिया नगर को पहुंचने वाले जल आपूर्ति में भी बाधा उत्पन्न हो गई है, जहां अब वैकल्पिक व्यवस्था के द्वारा पानी पहुंचाया जा रहा है।

आश्चर्य यह भी है कि करोड़ों रुपए की लागत से बने डैम को, बनाने से पहले पानी के दबाव का अंदाजा नहीं लगाया गया और पानी ने, डैम के किनारे को तोड़ते हुए कृषि भूमि को भी नुकसान पहुंचाया जिसकी भरपाई में समय लगेगा और अब यहां करीब दो एकड़ भूमि इस कटाव से प्रभावित दिखाई देती है।

 

स्थानीय निवासी धर्मेंद्र,अभिषेक,राहुल, अजमेर ने बताया कि पिछली बरसात में नदी के पानी से धीरे- धीरे कटाव हुआ जिसके कारण खेती की जमीन खराब हुई,मिट्टी सहित एक घर और उसमें रखे करीब 60 – 70 पाइप,पांच हॉर्स पावर की करीब पांच मोटर भी बह गई,अगर इस डैम को जल्द ही ठीक नहीं किया गया तो पथरिया के लिए भी पानी की समस्या बढ़ जाएगी।

जितेंद्र,अरविंद का कहना था कि डैम बनते समय कंपनी ने उनकी एवं अन्य लोगों की जमीनों का उपयोग किया, मकान गिराया, पेड़ काटे,पाइप बिछाए,पावर प्वाइंट हाउस बनाया,पांच साल तक तो काम दिया अब पिछले तीन महीने से मानदेय देना बंद कर दिया है।नगर परिषद के पूर्व अध्यक्ष लक्ष्मण सिंह ने आश्वासन दिया था कि नगर परिषद में रखेंगे,पर अब तक काम नहीं दिया, हमारी निजी जमीन पर पाइप लाइन, पोल लगवा दिए,जगह कब्जे में ले ली और अब नौकरी भी नहीं दी।इस संबध में नगर परिषद के पूर्व अध्यक्ष लक्ष्मण सिंह बताते है कि पानी की समस्या को देखते हुए 21 करोड़ 95 लाख की परियोजना लाई गई,जिसे बांसा के पास सुनार नदी पर स्वीकृत किया गया।मिट्टी का कटाव हुआ,किसानों ने मुआवजे की मांग की, जो मिलना भी चाहिए। अब टेंडर हो चुका है। पांच वर्ष तक संचालन,संधारण की जिम्मेदारी कंपनी की थी अब नगर परिषद को हेंडोवर हो चुकी है जो लोग वहां काम कर रहे थे,उसकी चर्चा परिषद में करेंगे।

 

 

टूटने के पहले कुछ ऐसा दिखाई देता था डैम का नजारा

करोड़ों रुपए की लागत और हजारों लोगों को जलापूर्ति करने के उद्देश्य से बनाए गए डैम की गुणवत्ता पर भी सवाल उठने लगे है कि संरक्षण की चर्चा होती है और लापरवाही दिखाई देती है डैम बनने के पूर्व में क्षेत्र का सही आंकलन नही किया गया होगा इसलिए मिट्टी का कटाव हो गया,पानी बह गया और जल संकट की स्थिति निर्मित हो गई है।

 

हालांकि डैम के बन जाने के बाद ग्रामीणों को काफी सहूलियत हो गई थी,इसे देखकर तो लगता था कि इसे सोच विचार कर मजबूती से बनाया गया होगा जो कई वर्षो तक सुरक्षित रहेगा पर कुछ ही साल में
इसके किनारे ढह गए और नुकसान भी हुआ,जिसे पुनः ठीक तो किया जाएगा,राशि भी खर्च होगी,परंतु तब तक लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ेगा

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