सी के पारे रायसेन
भारत में लगातार बढ़ती डीजल-पेट्रोल की खपत और महंगे आयातित तेल के बीच अब एक बार फिर पारंपरिक “भट्ट” मॉडल चर्चा में है। जानकारों का मानना है कि यदि इस तकनीक को आधुनिक रूप देकर दोबारा बड़े स्तर पर उतारा जाए, तो देश करोड़ों लीटर ईंधन बचा सकता है।
बताया जा रहा है कि भट्ट प्रणाली सामान्य बसों की तुलना में आधे से भी कम डीजल-पेट्रोल की खपत करती है, जबकि यात्रियों को ले जाने की क्षमता लगभग दोगुनी तक मानी जाती है। यही कारण है कि इसे “भारत का पारंपरिक ब्रह्मास्त्र” कहा जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, आज जब देश इलेक्ट्रिक और वैकल्पिक परिवहन की ओर बढ़ रहा है, तब कम ईंधन में अधिक यात्रियों को ढोने वाले ऐसे मॉडल भारत के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकते हैं। इससे न केवल तेल आयात पर खर्च घटेगा, बल्कि प्रदूषण और ट्रैफिक का दबाव भी कम हो सकता है।
क्यों खास माना जाता है यह मॉडल?
कम डीजल-पेट्रोल खपत
अधिक यात्री क्षमता
कम परिचालन खर्च
ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में उपयोगी
पर्यावरण के लिए अपेक्षाकृत बेहतर
परिवहन विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकार और ऑटोमोबाइल कंपनियां मिलकर इस दिशा में रिसर्च करें, तो भारत दुनिया को एक नया किफायती परिवहन मॉडल दे सकता है।अब सवाल यह है कि क्या देश तेल बचाने के इस “देसी ब्रह्मास्त्र” को फिर से अपनाएगा, या बढ़ती ईंधन खपत के बीच विदेशी मॉडलों पर ही निर्भर रहेगा।