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आदिवासियों को रिझाने में कितनी कामयाब होगी भाजपा-अरुण पटेल

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आलेख
अरुण पटेल

गुजरात में जहां एक ओर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चमत्कारिक नेतृत्व के भरोसे जीत का नया कीर्तिमान भाजपा ने बनाया है और सबको साधने के साथ ही जिस प्रकार से उन्होंने कांग्रेस के आदिवासी वोट बैंक में सेंध लगाई है ।उसी तर्ज पर क्या प्रधानमंत्री मोदी 2023 के अन्त में होने वाले मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनावों में भी भाजपा की जीत का राजपथ तैयार करने की रणनीति बनाएंगे। हिमाचल में कांग्रेस ने भाजपा के रिवाज बदलने के नारे को असरहीन करते हुए छत्तीसगढ़ के भूपेश बघेल मॉडल पर जीत दर्ज कराई है उसके बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या छत्तीसगढ़ के फार्मूले और राजस्थान की कुछ अन्य योजनाओं को आगे कर कांग्रेस अपने दो राज्यों पर कब्जा बरकरार रखते हुए मध्यप्रदेश में भी जीत का रोड मैप बनाने की राह पर आगे बढ़ेगी। भाजपा का प्रयास तो क्षेत्रीय दलों के साथ ही कांग्रेस को भी अब हाशिए पर डालने का है। इन चुनावों के साथ हुए उपचुनावों ने विपक्ष की झोली में भी कुछ न कुछ दे दिया है। 2024 की तैयारियों में भाजपा अभी से भिड़ गई है और उसका फार्मूला साफ-साफ नजर आने लगा है तो क्या ऐसे में इन चुनाव नतीजों से विपक्ष को भी एकजुट होने की प्रेरणा मिलेगी। विपक्ष की एकजुटता में पश्चिमी बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल तथा बसपा सुप्रीमो मायावती स्पीड ब्रेकर बनेगे या इस राह को आसान करने में मददगार होंगे। यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि मतदाताओं ने सभी दलों को कहीं कम तो कहीं ज्यादा बूस्टर डोज दे दिया है। इसका असर 2023 में होने वाले राज्य विधानसभाओं और 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों पर क्या पड़ता है यही देखने वाली बात होगी।
वैसे तो हर राज्य और राष्ट्रीय चुनाव में मतदान करते समय मतदाताओं का मानस अलग-अलग होता है लेकिन उस पर थोड़ा बहुत असर विभिन्न राज्यों में ताकतवर माने जाने वाले दलों के अपने पुरुषार्थ का भी रहता है। जहां तक भाजपा का सवाल है उसे मध्यप्रदेश में दलबदल के द्वारा पुनः सत्ता में वापसी का औचित्य भाजपा की शानदार जीत का मार्ग प्रशस्त कर साबित करना है तो वहीं दूसरी ओर राजस्थान और छत्तीसगढ़ की सत्ता से भी कांग्रेस को बेदखल करना शामिल है। भाजपा से अधिक बड़ी चुनौती कांग्रेस के सामने है क्योंकि उसे 2023 के चुनावों में छत्तीसगढ़ एवं राजस्थान में अपनी सत्ता कायम रखना है तो मध्यप्रदेश में भी फिर से सत्ता में वापस आना है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनावों में 2018 के विधानसभा चुनाव में आदिवासियों और दलितों का झुकाव कांग्रेस की ओर पूर्व की अपेक्षा अधिक नजर आया था इसलिए भाजपा अब इन्हीं वर्गों को साधने की कोशिश कर रही है इसलिए यह सवाल उठना लाजमी है कि आदिवासियों को साधने या रिझाने में कितनी कामयाब होगी भाजपा। राजस्थान में कांग्रेस के आशियाने को घर के ही चिराग से आग लगने का जहां खतरा है तो वहीं छत्तीसगढ़ में फिलहाल वह काफी मजबूत नजर आ रही है, मध्यप्रदेश में भी वह मजबूत स्थिति में है। लेकिन मतदाताओं के बीच सामाजिक सरोकारों के चलते सीधे रिश्ते बनाने वाले शिवराज सिंह चौहान का अपना चमकीला आभामंडल है और इसके साथ ही अब उन्हें कांग्रेस के उभरते सितारे रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया का भी साथ मिल गया इसलिए कांग्रेस को मध्यप्रदेश में अधिक प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा। छत्तीसगढ़ एवं राजस्थान में हुए उपचुनावों में कांग्रेस ने अपनी सीटें बरकरार रखी हैं। लेकिन राष्ट्रीय दल का दर्जा मिलने के बाद अब आम आदमी पार्टी के अरविन्द केजरीवाल भी आने वाले चुनावों में कांग्रेस एवं भाजपा दोनों के लिए चुनौती बनकर डटे रहेंगे, ऐसी संभावना को नकारा नहीं जा सकता। उनकी उपस्थिति भाजपा को न्यूनतम लेकिन कांग्रेस को भारी क्षति पहुंचा सकती है।
गुजरात में लगातार भाजपा सातवीं बार जीती है और उसके वोट प्रतिशत में भी 2.05 प्रतिशत की वृद्धि हुई है जो 50 प्रतिशत से अधिक है। कांग्रेस ने 17 सीटें जीती हैं और 2017 के विधानसभा चुनाव से उसे 14.9 प्रतिशत कम मत प्राप्त हुए तथा उस चुनाव में जीती हुई 77 सीटों में से 60 पर असफल रही। आम आदमी पार्टी ने पहली बार पूरे दमखम से चुनाव लड़ा और उसने 12.9 प्रतिशत मत प्राप्त कर कांग्रेस को विपक्ष के नेता का पद मिलना भी दूभर कर दिया। आप ने जितनी सेंध लगाई वह अधिकतर कांग्रेस के वोटों में ही लगाई। हिमाचल प्रदेश में भाजपा से 0.9 प्रतिशत अधिक मत लेकर कांग्रेस ने भाजपा से एक राज्य छीन लिया और पिछले चुनाव की तुलना में उसने 19 अधिक स्थानों पर सफलता हासिल कर 40 क्षेत्रों में जीत का परचम लहराते हुए अपनी सरकार बनाने का रास्ता साफ कर लिया। भाजपा को 43 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए लेकिन उसे मात्र 25 सीटों पर ही
सफलता मिल पाई। उन्नीस विधानसभा क्षेत्रों में जो पिछले चुनाव में भजपा ने जीते थे उनसे हाथ धोना पड़ा। आम आदमी पार्टी ने पहले दमखम से चुनाव लड़ने की बात कही थी लेकिन बाद में वह यहां के प्रति अनमनी हो गयी और समूची ताकत गुजरात में लगा दी। सभी 68 सीटों पर उसके उम्मीदवार चुनाव हार गये, मत प्रतिशत भी उसे 1.1 ही मिल सका। गुजरात में पहली बार कांग्रेस को आदिवासी सीटों पर जोर का झटका लगा जहां उसे पहले अच्छी सफलता मिलती रही थी। आम आदमी पार्टी ने यहां कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाई, हालांकि वह मात्र एक सीट ही जीत पाई लेकिन कांग्रेस को भी केवल तीन सीटें ही जीतने दीं और बाकी पर पूरा-पूरा फायदा भाजपा को मिला। भाजपा ने 23 सीटें जीतीं जबकि 2017 के चुनाव में कांग्रेस ने 15 और भाजपा ने 9 सीटें जीती थीं। सौराष्ट्र में भाजपा ने अब तक की सबसे बड़ी जीत दर्ज कराते हुए कांग्रेस को चौंका दिया। पिछले चुनाव में भाजपा ने सौराष्ट्र एवं कच्छ रीजन में 23 सीटें और कांग्रेस ने 30 सीटें जीती थीं। इस बार भाजपा ने रिकार्ड 46 सीटें जीती जबकि कांग्रेस अपने गढ़ उत्तर गुजरात में भी हार गई। उसे 9 सीटों का नुकसान हुआ। इस प्रकार कांग्रेस ने इस चुनाव में अपने गढ़ ढहा लिए तो भाजपा ने नये गढ़ बना लिए हैं। इस बार 33 में से 22 जिले ऐसे रहे जिनमें कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला। पाटीदार बहुल इलाकों में भी एक बड़ा बदलाव नजर आया और भाजपा ने पाटीदार समुदाय के दबदबे वाली 61 में से 55 सीटें जीत लीं।
और यह भी
अन्य राज्यों में हुए उपचुनावों में मैनपुरी लोकसभा सीट मुलायम सिंह की बहू और अखिलेश की धर्मपत्नी डिंपल यादव ने रिकार्ड मतों से जीत ली तो वहीं आजम खां का गढ़ रामपुर ढह गया और वहां भाजपा ने जीत दर्ज कर ली। मुजफ्फरनगर की खतौली सीट भाजपा ने रालोद के हाथों गंवा दी। बिहार में कुढ़नी सीट भाजपा ने जीती तो उड़ीसा की पदमपुर सीट बीजू जनता दल को मिली। छत्तीसगढ़ की भानुप्रतापपुर और राजस्थान की सरदार शहर सीटों पर कांग्रेस ने अपना कब्जा बरकरार रखा।

लेखक सुबह सवेरे के प्रबंध संपादक हैं
-सम्पर्क: 9425010804, 7999673990

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