आलेख
अजय बोकिल
देश की राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर पर पहले सीजेपी और एक दिन के अंतराल से कांग्रेस के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन के प्रदर्शन, हंगामे और इसके जरिए मोदी सरकार पर बनाए जा रहे दबाव के नरेटिव से सवाल उठ रहा है कि इसका राजनीतिक उद्देश्य क्या है? लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और इस आंदोलन के नेता राहुल गांधी ने इसे आंदोलन को ‘शिव का तांडव’ कहा है। यानी यह प्रत्यक्ष रूप से विपक्ष और परोक्ष रूप से जनता का राजनीतिक तांडव है, जिसकी अंतिम परिणति क्या होगी, अभी कहना मुश्किल है। क्योंकि शिव का तांडव तो असाधारण क्रोध से उपजता है और इसकी परिणति नए सृजन के रूप में होती है। क्या भारतीय राजनीति में भी वैसा ही कुछ होने जा रहा है? या फिर कुछ दिनो बाद वैसी ही गाजर की सियासी पुंगी बजने लगेगी?
बहरहाल मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) विपक्ष ज्ञानेश कुमार से इस्तीफा लेने पर अड़ा हुआ है, जबकि भाजपा उनका लगातार बचाव करने में लगी है। विपक्ष सड़कों पर यह कहकर हमलावर है कि भाजपा संविधान को खत्म कर रही है तो भाजपा पत्रकारवार्ताएं करके जवाब दे रही है कि विपक्ष संवैधानिक संस्थाअों पर हमले कर रहा है। हालांकि यह सभी को पता है कि ज्ञानेश जिस संवैधानिक पद पर जमे हैं, उस पर से उन्हें कोई नहीं हटा सकता। सरकार भी नहीं। ज्ञानेश को केवल संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाकर पद से हटाया जा सकता है। लेकिन इस प्रस्ताव को पारित कराने के लिए जरूरी बहुमत न तो सत्तारूढ़ एनडीए के पास है और न ही विपक्ष के पास। अलबत्ता ज्ञानेश कुमार खुद विपक्ष की घेराबंदी से तंग आकर, आत्मग्लानि में अथवा अंतरात्मा की आवाज पर इस्तीफा दे दें तो बात अलग है। लेकिन ऐसे लोग अलग मिट्टी के बने होते हैं। सुप्रीम कोर्ट भी केवल ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली और मंशा को लेकर कोई तल्ख टिप्पणी कर सकता है, लेकिन पद से नहीं हटा सकता। और यह टिप्पणी तभी संभव है, जब विपक्ष कोर्ट में यह ठोस सबूत दे कि राज्यों में एसआईआर के चलते भारी धांधली हुई है, बड़े पैमाने पर मतदाताअों के नाम काटे गए हैं, जिससे उसे राजनीतिक नुकसान पहुंचा। लेकिन इसके लिए विपक्ष को कोर्ट में ठोस आंकड़े पेश करने होंगे। वरना सियासी आरोपों के आधार पर किसी से इस्तीफा मांगा तो जा सकता है, िलया अथवा िदलवाया नहीं जा सकता।
वैसे भी मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया बहुत जटिल और लंबी है। संविधान ने उन्हें सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की तरह ही सुरक्षा दी हुई है। संविधान के अनुच्छेद 124(4) के तहत संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से पारित प्रस्ताव के बाद ही राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जा सकता है। इसके भी केवल दो आधार हैं। पहला मुख्य निर्वाचन आयुक्त द्वारा कोई दुर्व्यवहार साबित हुआ हो या फिर वो अपने कर्तव्य निर्वहन में अक्षम सिद्ध हुए हों। महाभियोग की प्रक्रिया काफी लंबी है। मसलन सबसे पहले महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए लोकसभा के 100 सदस्य या राज्यसभा के 50 सांसदों का समर्थन होना चाहिए। लाए गए महाभियोग प्रस्ताव पर स्वीकृति देने, न देने का अधिकार लोकसभा और राज्यसभा के अध्यक्षों के पास होता है। स्वीकृति भी प्रस्ताव की जांच की बाद दी जा सकती है। अध्यक्ष पहले जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित करते हैं। इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के एक जस्टिस, किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित न्यायविद होता है। समिति सम्बन्धित व्यक्ति पर लगाए आरोपों की जांच कर तय करती है कि आरोपी द्वारा दुर्व्यवहार या अक्षमता साबित हुई है या नहीं। प्रस्ताव स्वीकृत होने पर दोनो सदनों में महाभियोग प्रस्ताव मतदान द्वारा विशेष बहुमत से पारित करना होता है। विशेष बहुमत बोले तो सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत या मतदान के िदन सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में से दो तिहाई । संसद की मंजूरी के बाद राष्ट्रपति मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने का आदेश जारी करते हैं। सदन की वर्तमान संरचना में महाभियोग प्रस्ताव पारित कराना टेढ़ीखीर है। और फिर मोदी सरकार ऐसा क्यों होने देगी, खासकर तब कि जब विपक्ष दूसरे तमाम मुददों को हाशिए पर डालकर ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे पर ही पिल पड़ा हो।
लिहाजा पूरे मामले का अहम पक्ष है इसका राजनीतिक राजनीतिक उद्देश्य। यह जानते हुए भी कि ज्ञानेश कुमार पद से इतनी आसानी से नहीं हटाए जा सकेंगे, विपक्ष का मकसद यह नरेटिव सेट करना है कि मोदी सरकार अब आरोपों में बहुत गहरे तक घिर गई है। वह धांधली कराकर चुनाव जीतती जा रही है। उसे जनता की आवाज की कोई चिंता नहीं है। इस सरकार को अब जाना चाहिए। हालांकि वो हटी तो कौन आ सकता है, यह भी स्पष्ट नहीं है। क्योंकि राहुल गांधी इसका विकल्प नहीं बताते। उनका मानना शायद यह है कि हालात इतने खराब हैं कि जनता बिना यह सोचे कि मोदी की जगह किसको जिताएं, यह सोचकर वोट देगी कि पहले इसे हटाएं बाकी बाद में देखेंगे। या यूं कहें कि अब जनता ही सत्ता परिवर्तन का तांडव करेगी तो नई राजनीतिक कोंपले खुद ब खुद फूटने लगेंगी।
असमाप्त लगने वाला यह आंदोलन एक नरेटिव सेट करने में तो कुछ हद तक सफल होता दिख रहा है, वो ये कि देश में सब ठीक नहीं है। युवाअों का बेखौफ सड़कों पर उतरना, दिल्ली में बार-बार हो रहे धरना-प्रदर्शन इसी व्यापक असंतोष का नतीजा हैं, जो कभी पेपर लीक, कभी नौकरी की प्रवेश परीक्षाअों में गड़बड़ी तो कभी वोट चोरी के रूप में प्रकट होता है। दिल्ली के प्रदर्शनों के रील पूरी दुनिया में वायरल हुए। इनमें भी दोतरफा एजेंडा सेट करने की कोशिशें दिखीं। पहला तो यह कि भारत में मोदी-शाह के तानाशाही रवैये के चलते हालात बहुत खराब हो चुके हैं और जनता बगावत पर उतर आई है। महिलाअों, पत्रकारों को भी पीटा जा रहा है। सरकार दमन का सहारा ले रही है। राष्ट्रवादियों ने देश को बर्बाद कर दिया है। ऐसे में विपक्ष और काॅकरोच किसी कीमत पर नहीं झुकेंगे। दूसरा एजेंडा यह था कि दिल्ली की सड़कों पर जो रहा है, वह मोदी विरोधी टूलकिट का ही एक और प्रयोग है, जिसका पहला और अंतिम उददेश्य केवल देश में अस्थिरता पैदा करना है। वैसे इस पूरे इस आंदोलन का पब्लिक कनेक्ट कितना है, यह तो किसी बड़े चुनाव में ही पता चलेगा। इसी संदर्भ में एक अमेरिकी पत्रकार असरा नोमानी की यह चेतावनी अहम है कि भारत में इस्लामी और वामपंथी ताकतें वैसे ही हालात पैदा करना चाहती हैं, जैसी कि उसने नेपाल और बांगलादेश और अब यूरोप में कर रही हैं। हालांकि इस आंदोलन की एक दिलचस्प बात यह भी है कि एक ही मांग को लेकर दो अलग अलग आंदोलन हो रहे हैं। विपक्षी इंडिया गठबंधन और सीजेपी के पांव अलग-अलग चल रहे हैं। जबकि शिव के तांडव में कोई शेयरिंग नहीं होती। भगवान शिव स्वयं ही काफी हैं।
फिर वही सवाल कि इस तांडव का उद्देश्य क्या है? राहुल गांधी का कहा है कि हमारा अंतिम लक्ष्य ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा लेना भर नहीं है बल्कि उन्हें बचाने वालों को सत्ता से बेदखल करना है। यानी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सत्ता से हटाना है। लेकिन वो इसका रोड मैप साफ नहीं करते। दिल्ली में जारी आंदोलन से यही लगता है िक विपक्ष ऐसे मुद्दों लगातार उठाकर ऐसा माहौल बनाना चाहता है, जो आगामी लोकसभा चुनाव में इसका तगड़ा राजनीतिक लाभांश दे। जबकि भाजपा की कोशिश यही है कि दूसरे मुद्दों की जगह ज्ञानेश के इस्तीफे का मुद्दे ही अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव तक खींचा जाए और पार्टी वहां विपक्ष को तगड़ी मात देने में सफल रहे तो ज्ञानेश के इस्तीफे और वोट चोरी की लोरी अपने आप खामोश हो जाएगी। वैसे इस बवाल के बीच खुद ज्ञानेश कुमार क्या सोचते हैं, किसी को नहीं पता। हो सकता है कि वो भी टीएन शेषन की तरह कोई ‘अलग तरह’ का रिकाॅर्ड बनाने की ठाने हुए हों, क्योंकि नहीं हटे तो उन्हें अगले सवा दो साल तक पद पर बने रहना है। यानी विपक्ष को भी नए मुद्दे ढूंढने की मशक्कत नहीं करनी होगी। लेकिन देश यूं ही कांपता रहेगा।
-लेखक सुबह सवेरे के कार्यकारी प्रधान संपादक हैं।
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