माताओं ने संतान की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए रखा व्रत, पूजा-अर्चना के बाद तालाब में किया मोर विसर्जन
मुकेश साहू दीवानगंज रायसेन
सांची विकासखंड के ग्राम दीवानगंज, अंबाडी, सेमरा, नरखेड़ा, जमुनिया, निनोद, बरजोरपुर, बालमपुर, देहरी, छोला, बनखेड़ी सहित आसपास के ग्रामीण अंचलों में गुरुवार को संतान सप्तमी और मोर छठ का पर्व श्रद्धा एवं उत्साह के साथ मनाया गया। सुबह से ही महिलाओं में व्रत को लेकर उत्साह नजर आया। माताओं ने दिनभर उपवास रखकर अपनी संतान की दीर्घायु, सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य, रक्षा और उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
इस बार तिथियों के एक साथ पड़ने से कई महिलाओं में पर्व मनाने को लेकर असमंजस की स्थिति भी बनी रही। इससे पहले तीज व्रत और चौथ एक ही दिन पड़ने के कारण भी महिलाओं में भ्रम की स्थिति बनी थी। इसी प्रकार संतान सप्तमी और मोर छठ के एक साथ आने से पूजा की परंपराओं और विधि को लेकर ग्रामीण महिलाओं में चर्चा रही।

सामूहिक रूप से की पूजा-अर्चना
दोपहर बाद महिलाओं ने सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना की। भगवान शिव और माता पार्वती का पूजन कर मीठी पुड़ी, मालपुआ सहित विभिन्न पकवानों का भोग लगाया गया। वहीं विवाहित महिलाओं ने मोर की पूजा करने के बाद समीपस्थ तालाबों में मोर का विसर्जन किया। गांवों में महिलाओं के समूह पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ धार्मिक अनुष्ठान करते नजर आए।
संतान की खुशहाली के लिए रखा उपवास
भाद्रपद शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को संतान सप्तमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, कुशलता, स्वास्थ्य और सुखद भविष्य के लिए व्रत रखती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में इस व्रत का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है।
पंडित भूपेंद्र शास्त्री ने बताया कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार संतान सप्तमी का व्रत भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना से जुड़ा है। श्रद्धा और विधि-विधान से व्रत करने से संतान सुख, परिवार की सुख-शांति और मंगल की कामना की जाती है। उन्होंने बताया कि यह व्रत केवल महिलाएं ही नहीं, बल्कि पुरुष भी श्रद्धा के साथ कर सकते हैं। संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपती भी धार्मिक आस्था के साथ इस व्रत का पालन करते हैं।
सात पुआ का प्रसाद और दान की परंपरा
संतान सप्तमी के अवसर पर पूजा के बाद सात पुआ का प्रसाद ग्रहण करने की परंपरा है। श्रद्धालु महिलाएं मीठी पुड़ी, मालपुआ और अन्य पकवान बनाकर भगवान को भोग लगाती हैं। इसके बाद सात पुआ दान करने का विधान बताया गया है। ग्रामीण अंचलों में यह पूजा अधिकतर सामूहिक रूप से की जाती है, जिसमें महिलाएं एक-दूसरे के साथ मिलकर धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करती हैं।
दो पर्व एक साथ पड़ने को धार्मिक दृष्टि से विशेष माना
ग्रामीणों के अनुसार संतान सप्तमी और मोर छठ का एक साथ पड़ना धार्मिक दृष्टि से विशेष अवसर माना गया। मोर छठ पर भगवान सूर्य की आराधना कर आरोग्य और सुख-समृद्धि की कामना की गई, जबकि संतान सप्तमी पर माताओं ने शिव-पार्वती का पूजन कर अपनी संतान के मंगलमय जीवन के लिए प्रार्थना की।
भादौ माह के प्रारंभ से ही ग्रामीण क्षेत्रों में व्रत और त्योहारों का सिलसिला शुरू हो जाता है। हरितालिका तीज से लेकर महालक्ष्मी पूजन तक महिलाएं विभिन्न धार्मिक व्रत रखती हैं। इसी क्रम में संतान सप्तमी और मोर छठ का पर्व भी ग्रामीण अंचलों में श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ मनाया गया। पूजा अर्चना का दौर देर रात तक चलता रहा।