दिल का सूना साज तराना ढूंढेगा, मुझको मेरे बाद जमाना ढूंढेगा’ गीत से दी महान गायक मोहम्मद रफी को भावभीनी श्रद्धांजलि
विदिशा। महान पार्श्वगायक मोहम्मद रफी की 46वीं पुण्यतिथि पर लीजेंड संगीत ग्रुप, विदिशा द्वारा एक भावपूर्ण संगीत संध्या का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का संयोजन प्रदीप जैन ‘पारस’ ने किया। कार्यक्रम का शुभारंभ रफी साहब के चित्र पर माल्यार्पण एवं “दिल का सूना साज तराना ढूंढेगा, मुझको मेरे बाद जमाना ढूंढेगा” गीत के साथ उन्हें सामूहिक श्रद्धांजलि अर्पित कर किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ इतिहासकार गोविंद देवलिया रहे, जबकि अध्यक्षता डॉ. विनोद भट्ट ने की। आचार्य शिवकुमार तिवारी* विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।
संगीत संध्या में रफी साहब के सदाबहार गीतों की शानदार प्रस्तुतियों ने श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया। डॉ. विनोद भट्ट ने “आए थे बहार बन के”, डॉ. राकेश श्रीवास्तव ने “मन तड़पत हरि दर्शन को आज” एवं “दिल का भँवर करे पुकार”, प्रदीप जैन ‘पारस’ ने “यहाँ मैं अजनबी हूँ”, जगदीश गेहलोत ने “रिमझिम के गीत सावन गाए”, आशुतोष ने “मैंने पूछा चाँद से”, प्रशांत रघुवंशी ने “तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं”, हरिनारायण ने “चौदहवीं का चाँद हो”, प्रखर श्रीवास्तव ने “आपके हसीन रुख पे”, ब्रज श्रीवास्तव ने “बार-बार देखो”, तथा सौरभ पंथी ने “क्या हुआ तेरा वादा” प्रस्तुत कर श्रोताओं की भरपूर तालियाँ बटोरीं। प्रत्येक प्रस्तुति पर उपस्थित संगीत प्रेमियों ने कलाकारों का उत्साहवर्धन किया।

मुख्य अतिथि गोविंद देवलिया ने अपने उद्बोधन में कहा कि मोहम्मद रफी केवल एक महान गायक नहीं, बल्कि भारतीय संगीत जगत की अमर धरोहर हैं। उनकी आवाज़ में भक्ति, प्रेम, करुणा, श्रृंगार और देशभक्ति जैसे सभी भावों की अद्भुत अभिव्यक्ति मिलती है। उन्होंने कहा कि रफी साहब का सादगीपूर्ण व्यक्तित्व, विनम्र स्वभाव और संगीत के प्रति समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत रहेगा।
अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. विनोद भट्ट ने कहा कि रफी साहब के गीत समय की सीमाओं से परे हैं। उनकी मधुर आवाज़ आज भी हर आयु वर्ग के संगीत प्रेमियों के दिलों में जीवंत है और आने वाले वर्षों तक अमर रहेगी।
कार्यक्रम के अंत में सभी कलाकारों का सम्मान किया गया। पूरी संध्या रफी साहब के कालजयी गीतों से सराबोर रही और उपस्थित श्रोताओं ने देर तक तालियों की गड़गड़ाहट से कलाकारों का उत्साहवर्धन किया। संगीत प्रेमियों ने इसे रफी साहब की स्मृतियों को समर्पित एक अविस्मरणीय संगीतमय श्रद्धांजलि बताया।