– मुड़ियाखेड़ा बीट में हुई बड़ी वारदात, वन विभाग की निगरानी पर उठे सवाल
सैयद मसूद अली पटेल गैरतगंज रायसेन
जिले की गढ़ी वन परिक्षेत्र अंतर्गत मुड़ियाखेड़ा बीट क्रमांक-30 में एक बार फिर सागौन तस्करों ने वन विभाग को खुली चुनौती देते हुए बड़े पैमाने पर अवैध कटाई की वारदात को अंजाम दिया है। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार सोमवार और मंगलवार की दरमियानी रात तस्करों ने करीब 30 सागौन के पेड़ों की कटाई कर दी। इन बहुमूल्य पेड़ों की कीमत लाखों रुपये आंकी जा रही है। घटना सामने आने के बाद वन विभाग में हड़कंप मच गया है। जानकारी के मुताबिक यह पहली बार नहीं है जब इसी बीट को तस्करों ने निशाना बनाया हो। इससे पूर्व भी इसी क्षेत्र से करीब 24 सागौन के पेड़ों की अवैध कटाई का मामला सामने आ चुका है। लगातार दूसरी बड़ी वारदात ने वन विभाग की गश्त, निगरानी व्यवस्था और सुरक्षा तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय सूत्रों का दावा है कि क्षेत्र में सक्रिय लकड़ी तस्करों का एक संगठित गिरोह लंबे समय से सागौन की अवैध कटाई में संलिप्त है।

चर्चा यह भी है कि इस नेटवर्क के तार मध्यप्रदेश के बाहर, विशेष रूप से राजस्थान तक जुड़े हो सकते हैं। हालांकि इस संबंध में वन विभाग की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। मामले की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इतनी बड़ी वन संपदा की चोरी के बावजूद विभाग की ओर से स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा रही है। गढ़ी वन परिक्षेत्र के रेंजर धीरेंद्र पांडे से घटना और कार्रवाई के संबंध में जानकारी लेने का प्रयास किया गया, लेकिन उनकी ओर से कहा गया कि अभी विवेचना जारी है, हम हर पहलू पर जांच कर रहे हैं। इस मामले में कौन शामिल है इसकी भी जांच की जा रही है कल तक स्पष्ट जानकारी दे देंगे। जानकारी स्पष्ट न मिलने से पूरे मामले को लेकर रहस्य और गहरा गया है तथा विभागीय पारदर्शिता पर भी सवाल उठ रहे हैं। क्षेत्रीय नागरिकों का कहना है कि जब एक ही बीट में बार-बार सागौन के पेड़ों की अवैध कटाई हो रही है, तो यह केवल तस्करों की सक्रियता ही नहीं बल्कि निगरानी व्यवस्था की कमजोरियों को भी उजागर करता है। लोगों ने मामले की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच कर दोषियों के साथ-साथ लापरवाही बरतने वाले जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई की मांग की है। अब क्षेत्रवासियों की निगाहें वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों पर टिकी हैं कि वे इस बहुचर्चित वन अपराध का खुलासा कब तक करते हैं, तस्करी में शामिल गिरोह तक कब पहुंचते हैं और भविष्य में बहुमूल्य वन संपदा की सुरक्षा के लिए कौन से प्रभावी कदम उठाए जाते हैं।