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दो दिवसीय रंगभूमि नाट्य महोत्सव का समापन

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वीरांगना झलकारी बाई’ के शौर्य ने जीता दर्शकों का दिल

भोपाल। राजधानी के कला प्रेमियों के लिए आयोजित दो दिवसीय ‘रंगभूमि नाट्य महोत्सव’ का समापन बेहद गरिमामयी और जोशपूर्ण रहा। महोत्सव के दूसरे और अंतिम दिन गुंजन थिएटर द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में पीपल्स थिएटर ग्रुप की प्रस्तुति ने दर्शकों को 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की याद दिला दी।

मंच पर निर्देशक सिंधु धोलपुरे के कुशल निर्देशन में नाटक ‘वीरांगना झलकारी बाई’ का सफल मंचन किया गया। ईलाशंकर गुहा द्वारा लिखित इस नाटक ने इतिहास के उन पन्नों को जीवंत कर दिया, जो अक्सर मुख्यधारा की चर्चाओं में पीछे छूट जाते हैं। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में रंगकर्मी अभिनेता-निर्देशक सुनील सोन्हिया, इवेंट ऑर्गनाइजर अभिषेक पाराशर, सीएम राइज स्कूल की शिक्षिका रागिनी मेम एवं कविता तिवारी उपस्थित थी

परछाईं बनकर दी शहादत
नाटक की कहानी झलकारी बाई के जन्म से लेकर उनके बलिदान तक के सफर को दर्शाती है। झांसी के पास भोजला गांव में जन्मी झलकारी का पालन-पोषण उनके पिता सदोवर सिंह ने एक योद्धा की तरह किया था। रानी लक्ष्मीबाई की हमशक्ल होने और उनके अदम्य साहस के कारण वे रानी की ‘दुर्गा महिला सेना’ का हिस्सा बनीं।

नाटक के सबसे भावुक और प्रभावी दृश्य में दिखाया गया कि कैसे 1858 के युद्ध के दौरान, रानी लक्ष्मीबाई को सुरक्षित निकालने के लिए झलकारी बाई ने खुद रानी का वेश धारण किया और अंग्रेजों को भ्रमित रखा। अपनी स्वामी भक्ति और देशप्रेम के लिए उन्होंने हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहुति दे दी।

मंच सज्जा और अभिनय का संगम
नाटक की सफलता में 1857 के दौर की सटीक वेशभूषा और कर्णप्रिय संगीत का विशेष योगदान रहा, जिसने दृश्यों के प्रभाव को दोगुना कर दिया। कलाकारों के अभिनय ने दर्शकों को अंत तक बांधे रखा:

मुख्य भूमिकाएं: झलकारी बाई के रूप में निहारिका केवट और रानी लक्ष्मीबाई के रूप में भूमिका बरछे ने सशक्त अभिनय किया।

अन्य कलाकार: श्रेयांश गुप्ता (पूरन कोरी), हर्ष केवट (डेविड), अश्विनी बरछे (नटी/छोटी झलकारी), और मोहित कुमार सोनी (सदोवर सिंह) सहित पूरी टीम ने प्रभावशाली प्रदर्शन किया।
महोत्सव के समापन पर दर्शकों ने खड़े होकर कलाकारों का अभिवादन किया। ‘वीरांगना झलकारी बाई’ की यह प्रस्तुति न केवल एक नाटक थी, बल्कि उन गुमनाम नायकों को एक सच्ची श्रद्धांजलि भी थी जिन्होंने देश की आजादी के लिए सर्वस्व न्योछावर कर दिया।

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