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बा-मुलाहिजा::खजाने की चाबी या जेब की तलाशी?  – संदीप भम्मरकर

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आलेख

संदीप भम्मरकर

निर्मला सीतारमन के बजट का पिटारा खुला तो उम्मीद थी कि विकास की रोशनी और सिंहस्थ की तैयारियों पर खजाना झरेगा। लेकिन हिसाब की रेखाएं कुछ और कहानी कह गईं। केंद्र के बजट के बाद मध्य प्रदेश का वित्त महकमा जोड़-घटाव में उलझा है। भरपाई के लिए नजर आबकारी और लग्जरी लाइफस्टाइल पर टिक गई है। सवाल है, विकास की गाड़ी चलाने के लिए पेट्रोल किसकी जेब से लाया जाए? अब निगाहें हैं जगदीश देवड़ा के भाषण पर। वैसे, बजट कभी खाली नहीं आता, वह किसी न किसी जेब की आह साथ लाता है।

संभागों पर छड़ी का फॉर्मूला
बीजेपी के संगठन मंत्री हितानंद शर्मा की नई जिम्मेदारी के बाद संगठन की घड़ी रीसेट मोड में है। मकसद साफ है, मामला तूल पकड़े उससे पहले ठंडा कर दो। पिछले दिनों किरकिरी वाली घटनाओं से रणनीतिकारों को चौकन्ना रहने पर मजबूर कर दिया है। नई व्यवस्था में संभागीय मुख्यालय पर संभागीय संगठन मंत्री को तैनात करने पर विचार चल रहा है। इस फॉर्मूले के तहत जिलों के बिगड़ैल कार्यकर्ताओं-नेताओं की लगाम कसी जाएगी। दरअसल, जिलों में नेता सीधे सरकार की किरकिरी करा रहे हैं, संगठन स्तर पर कोशिशों के बावजूद मामले खत्म होने का नाम नहीं ले रहे हैं।

स्वामी की घटना से खिंचा सनाका
धार्मिक शख्सियत पर एक आरोप ने सियासी जमीन को भी हिला कर रख दिया है। उत्तम स्वामी पर महिला के आरोपों ने सिर्फ धार्मिक हलकों में ही नहीं, राजनीतिक गलियारों में भी सनाका खींच दिया है। स्वामी के रसूखदार नेताओं से गहरे रिश्ते रहे हैं, दरबार में कई बड़े चेहरों की आमदरफ्त जगजाहिर है। अब महिला सबूत होने का दावा कर रही है तो चर्चा है कि लपटें कहीं सत्ता की चौखट तक न पहुँच जाएं। वैसे, मामले की और भी परतें खुलना अभी शेष है। इसी आशंका के चलते फिलहाल रसूखदारों ने मामले पर चुप्पी साध रखी है।

कुर्सी की सख्ती और दिल मुलायम!
कुर्सी कितना भी सख्त बना दे, कहीं न कहीं दिल मुलायम हो ही जाता है। एमपी के अफसरों के बीच ये चर्चा इन दिनों सरगर्म है। दरअसल, एक आईएएस अफसर की तीन शादियों की कहानी अभी सुर्खियों में ही थी कि दूसरे मामले में एक महिला अफसर पर डेढ़ करोड़ में प्रेमी “खरीदने” के आरोप ने कान खड़े कर दिए। मामला सामने आते ही गलियारों में फुसफुसाहट तेज हो गई। वैसे, इन किस्सों की परतें अभी खुलनी बाकी हैं, पर सवाल हवा में तैर रहा है, क्या मध्य प्रदेश की फिज़ा में कोई खास रूमानियत घुल गई है या माजरा कुछ और है?

शहनाई बजी, सायरन नहीं!
जब सूबे के डीजीपी के घर शादी हो और ट्रैफिक डायवर्जन न लगे, तो हैरानी तो बनती है। मध्य प्रदेश के डीजीपी की बिटिया का विवाह हुआ। वैवाहिक आयोजन भी ऑफिसर्स मेस में रखा गया। लेकिन पूरा आयोजन बेहद सादगी के साथ रचा गया। शहनाई जरूर गूंजी, पर तामझाम की चमक गायब रही। कार्यक्रम में हर खास शरीक हुआ। कुछ तो उज्जैन से भी आए। बुलावा केवल करीबियों को ही था। वैसे तो आजकल शादियां वीवीआईपी मूवमेंट का मिनी कुंभ बन जाती हैं, लेकिन आला अफसर के घर का वैवाहिक आयोजन ‘तामझाम रहित’ होने की वजह से चर्चाओं में है।


-लेखक मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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