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साईंखेड़ा में विराट 11 कुंडीय यज्ञ और रामकथा में गूंजा राम–भरत प्रेम का संदेश

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जगतगुरु राम दिनेशाचार्य महाराज ने कहा—भक्ति का रस मिल जाए तो संसार का रस फीका पड़ जाता है

सिलवानी रायसेन। सिलवानी अंचल के ग्राम साईंखेड़ा में आयोजित विराट 11 कुंडीय यज्ञ और रात्रिकालीन रामकथा में श्रद्धा, भक्ति और संवाद का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है। यज्ञ परिसर भक्तों की आस्था से सराबोर है, वहीं रामकथा में जगतगुरु राम दिनेशाचार्य महाराज के प्रवचनों ने श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया। कटनी की रामलीला के साथ चल रही इस कथा में भगवान राम और भरत के पावन प्रेम, भक्ति-रस और सामाजिक समरसता का संदेश प्रमुख रूप से उभरकर सामने आया।

जगतगुरु राम दिनेशाचार्य महाराज ने कहा कि भगवान राम कभी भरत की बात नहीं काटते, क्योंकि राम का भरत से अथाह प्रेम है। यह प्रेम पवित्र है, त्याग से भरा है और आज के समाज के लिए आदर्श है। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्यवश आज वासना को भी प्रेम का नाम दे दिया गया है, जबकि सच्चा प्रेम त्याग, मर्यादा और समर्पण से पहचाना जाता है। गोपियों का प्रेम और उससे भी बढ़कर राम–भरत का प्रेम शुद्ध, निष्काम और आदर्श है। भरत द्वारा राम से यह कहना कि “हम आपके सेवक हैं”—यह संवाद ही भक्ति का चरम है।
महाराज ने शास्त्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि भक्ति को ‘रस’ कहा गया है। संसार की प्रत्येक वस्तु में विधान है और हर विधान में कोई न कोई रस है, लेकिन जिस जीव को भक्ति का रस मिल जाता है, उसे संसार का रस फीका लगने लगता है। भगवान के नाम में रस है—यह स्वयं भगवान शिव का वचन है। जब भागवत रस की अनुभूति हो जाती है, तब जीवन का कल्याण सुनिश्चित हो जाता है। राम-रस में डूब जाना ही जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि है।
रामकथा के दौरान सामाजिक विषयों पर भी सार्थक संवाद हुआ। महाराज ने कहा कि संसार के बंधनों में जीव मोह-माया में फंसा रहता है, पर राम-रस में डूबकर वह इन बंधनों से मुक्त हो सकता है। उन्होंने शिक्षा के अधिकार पर बोलते हुए कहा कि बेटियों को शिक्षा का अधिकार मिलना चाहिए, यह अनिवार्य है, लेकिन साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि बेटी का जन्म बड़े सौभाग्य से होता है। माता-पिता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने का किसी को अधिकार नहीं है। समाज में मर्यादा और संवेदना दोनों का संतुलन आवश्यक है।
यज्ञ के आचार्य वेदाचार्य महाराज वैदिक मंत्रोच्चार के साथ यज्ञ का संचालन कर रहे हैं। वैदिक विधि-विधान से हो रहे इस यज्ञ में समृद्धि, संस्कार और सनातन मार्ग का संदेश दिया जा रहा है। महाराज ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि संस्कार मार्ग सनातन में होते हुए भी आज सनातन धर्म भटका हुआ प्रतीत होता है, इसलिए श्रीरामचरितमानस का अध्ययन और पालन आवश्यक है। मानस में भाई-भाई के प्रेम का जो आदर्श प्रस्तुत किया गया है, वही समाज और राष्ट्र को जोड़ने की शक्ति देता है।
जगतगुरु ने यूजीसी एक्ट के संदर्भ में भी दो टूक बात रखी। उन्होंने कहा कि उन्हें चिट्ठी दी गई कि यूजीसी पर दो शब्द बोले जाएं। इस पर उन्होंने स्पष्ट कहा कि सरकार को यूजीसी एक्ट पर पुनः विचार करना चाहिए। जाति-पाति में बांटने से समाज को क्या मिलेगा? इससे सवर्णों के साथ अन्याय की आशंका है। फिलहाल हाईकोर्ट द्वारा स्टे दिया जाना इस बात का संकेत है कि संवाद और विचार आवश्यक हैं। रामकथा का मूल संदेश भी यही है कि गांव, समाज और राष्ट्र संवाद से ही आगे बढ़ते हैं।

महाराज ने प्रयाग की महत्ता बताते हुए कहा कि पूरे विश्व में सनातन परंपरा की आधारशिला प्रयाग है, जहां गंगा-यमुना-सरस्वती की त्रिवेणी और रामकथा की अविरल धारा बहती है। वहीं से यह सांस्कृतिक धारा पूरे देश में प्रवाहित हुई। भरत में भक्ति है, रस है और त्याग है। जो व्यक्ति ऊंट की तरह अकड़कर चलता है, जिसमें नर्मता और दीनता नहीं है, वह सच्चा भक्त नहीं बन सकता।
रामकथा के भावपूर्ण प्रसंगों पर श्रद्धालु संवाद स्थल पर भावुक हो उठे। कथा ने यह संदेश दिया कि आज जब स्वार्थ में भाई-भाई एक-दूसरे का गला काटने को तैयार हैं, तब श्रीरामचरितमानस हमें भाईचारे, प्रेम और त्याग का पाठ पढ़ाती है। समाज को जोड़ने की जिम्मेदारी हर सनातनी का कर्तव्य है यही इस विराट आयोजन का सार है। भरत मां गंगा के सामने होकर भरत भिक्षा मांग रहे हैं। कभी कुछ मांगना हो तो भगवान को मांगना भरत सात प्रकार के है भरत तो समुद्र है सागर है जितने लोग इसमें गये से सब डूब गये ये बात हे

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