आलेख
विवेक त्रिपाठी
रायसेन जिले के पापड़ा गांव में अनुसूचित जाति के नट समुदाय के लोगों द्वारा मुस्लिम धर्म में कन्वर्जन की खबर पिछले कुछ दिनों से सुन और देख रहा हूं। उत्सुकता इस बात से की रायसेन में एक लंबा कार्यकाल मैंने बिताया और यहां चल रही गतिविधियों का मौन दृष्टा रहा हूं। नट एक अर्ध-खानाबदोश समुदाय है। ये लोग अपनी रोज़ी-रोटी के लिए पारंपरिक करतब जैसे पुरुष लोग बाज़ीगरी या कलाबाज़ी और गाने-बजाने का काम करते हैं जबकि महिलाएं नाचने और गाने का काम करती हैं। नट जाति के लोग हिन्दू धर्म को मानते हैं। इनमें ग़रीबी और अशिक्षा है।
रायसेन में हिंदू मुस्लिम सांप्रदायिक संघर्ष का एक लंबा दौर रहा है। 1543 में राजा पूरणमल और शेरशाह की चर्चित लड़ाई रायसेन के किले में हुई थी। राजा पूरणमल ने एक संधि के तहत किले का दरवाजा खोला, किले के आसपास कुछ मुस्लिम प्रचारक बस चुके थे, जिन्होंने शेरशाह से शिकायत किया की राजा उन्हें इस्लाम का प्रचार करने से रोकना हुआ परेशान करता रहा है। शेरशाह के कान भरे गए, जिससे क्रोधित शेरशाह ने संधि की शर्तों को तोड़ते हुए अपनी सेना को कत्लेआम का आदेश दिया और रायसेन का किला रक्त रंजित हो गया। राजपूतों के बाद यहां गोंड राजाओं का शासन रहा। नवाबी दौर में रायसेन भोपाल नवाब की रियासत का हिस्सा बन गया और इस दौरान इस पूरे क्षेत्र में अलग-अलग पॉकेट में मुस्लिम आबादी बढ़ी तथा यहां मुस्लिम प्रभाव स्पष्ट हो गया। आजादी के बाद इस पूरे क्षेत्र में कई सांप्रदायिक दंगे हुए। आज भी बीच-बीच में हिंदू मुस्लिम झड़पों की खबरें सुनने को मिलती हैं।
2019 के पहले जब मैं रायसेन जिले में पदस्थ था तब धर्मांतरण के कुछ घटनाक्रम मुझे स्मरण आते हैं। रायसेन से भोपाल की ओर रतनपुर चौराहे से उल्टे हाथ तरफ बढ़ते हैं तो जंगल के बीच एक गांव आता है बरूखार। यहां एक छोटी फॉरेस्ट चौकी भी है। इस गांव में कुछ परिवार शराब के कारोबार करते रहे हैं, इसलिए मेरा कई बार इस गांव जाना हुआ। छापे के दौरान मुझे इस गांव में दो-चार परिवार ऐसे मिले जिनमें आश्चर्यजनक रूप से आधे सदस्य मुसलमान थे, आधे हिंदू। पूछताछ में पता चला कि कोई एक व्यक्ति इस्लाम में कन्वर्ट हुआ है और फिर उसके परिवार के दूसरे लोग कन्वर्ट हो गए।

रायसेन के कई और गांव के संस्मरण याद आते हैं, जहां अपराध में पकड़ी गई एक आदिवासी महिला के आधार कार्ड में उसका नाम सुशीला बाई है किंतु जब उससे उसका धर्म पूछा जाता था तो वह मुसलमान बताती थी। पूछताछ में मालूम हुआ कि ऐसे कई आदिवासी परिवार हैं, जिनकी महिलाओं का विवाह मुस्लिम पुरुषों में हुआ है। सरकारी कानून के हिसाब से आदिवासी की जमीन को किसी गैर आदिवासी को बेचना प्रतिबंधित है इसके तोड़ में एक बड़ा आसान काम है किसी आदिवासी महिला से संपत्ति के लालच में विवाह करना और फिर कम्युनिटी की जमीन पर पारिवारिक कब्जा जमाना।
एक और घटना याद आती है। एक सूचना पर हमारी तीन-चार गाड़ियों का काफ़िला बरूखार गांव के आगे एक जंगल से गुजर रहा था, तभी बीच जंगल में एक बड़ा पक्का स्ट्रक्चर दिखा तो मैं वहां रुका। गाड़ियों का काफिला और वर्दी देखकर अंदर से 15- 20 बच्चे भी बाहर आए और दो-तीन मौलवी अपनी परंपरागत पोशाक हाफ पजामा और कुर्ते में। बीच सूनसान जंगल इतने बच्चों का रहना, मुझे कुछ अटपटा सा लगा। मैंने उन लोगों से पूछताछ की तो मुझे कुछ बच्चों ने ही बताया कि उनमें से कुछ बच्चे बांग्लादेश के हैं और कुछ इंडोनेशिया के। पजामा खुजाते वहां मौजूद एक मौलाना जो गैर भारतीय थे ने इस बात की पुष्टि की। मेरे पूछने पर एक मौलाना ने बताया कि यह मदरसा भोपाल के किसी पप्पू भाई का है, उन्हीं की जमीन है और यहां के संचालन का एक्सपेंस वही वहन करते हैं।
दो साल पहले भोपाल से सौरभ राजवैद्य नाम का एक जैन लड़का सलीम हो गया और उसकी पत्नी मानसी अग्रवाल रायला बेगम। दोनों हैदराबाद में रहकर इस्लाम का प्रचार करने लगे। सलीम कन्वर्ट होने के बाद भोपाल के अपने दोस्तों को भी कन्वर्ट होने के लिए बोलना और कहता- “वह नहीं चाहता कि उसके दोस्त दोजख की आग में जले। जब अल्लाह ताला हम सबको उठाएंगे तब सब का हिसाब किताब होगा और तब वह नहीं चाहेगा कि उसे अलग लाइन में खड़ा होना पड़े और उसके दोस्तों को दोजख वाली लाइन में लगकर नरक की आग में जलना पड़े”।
संयोग यह कि सौरभ उर्फ सलीम हमारे एक विभागीय साथी जो अभी भी रायसेन में पदस्थ है के बचपन का दोस्त था जिनसे उसके बारे में जानने को बहुत कुछ और बातें मिली। सौरभ उर्फ सलीम तथा उसकी पत्नी प्रतिबंध उग्रवादी इस्लामी संगठन “हिज्ब_ उत्त_तहरीर” से जुड़े हुए थे। उनको भोपाल पुलिस ने अरेस्ट किया, इन्वेस्टिगेशन में पता चला कि इसने अपने कुछ और साथियों के साथ रायसेन के जंगलों में हथियारों की ट्रेनिंग ली थी। मेरी जानकारी में रायसेन के जंगलों में ट्रेनिंग वाली जगह पप्पू खान का मदरसा के आसपास वाली ही कोई जगह थी।
भोपाल से लगे रायसेन में तबलीगी जमात का बड़ा अच्छा खासा प्रभाव है। साल में प्राय: तबलीगी लोगों के जत्थे यहां आते हैं, मस्जिदों में महीनों रुकते हैं और कई ऐसी संदेहास्पद एक्टिविटीज में यह इंवॉल्व होते रहे हैं। पापड़ा गांव जैसी घटनाएं मात्र स्थानीय नहीं है, इनका बाहरी व्यक्तियों और एजेंसियों के साथ संबंध है। स्थानीय नट लोगों में गरीबी और अशिक्षा है, सांस्थानिक प्रयासों द्वारा आर्थिक लालच और मानसिक सम्मोहन से यह लोग आस्था बदलने को तैयार हुए।

भारतीय उपमहाद्वीप में आज के पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश को मिला लें तो यहां की 50% जनसंख्या मुस्लिम है। आखिर इतनी बड़ी आबादी का डेमोग्राफिक बदलाव मात्र कुछ सो सालों के अंतराल में कैसे हो गया? अरब या फ़ारस से तो मुट्ठी भर लोग आए थे, भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकांश लोग स्थानीय हिंदू या बौद्ध आबादी है जो कालांतर में विविध कारणों से इस्लाम में कन्वर्ट हुई।
भारत में इस्लाम का आगमन पैगंबर मोहम्मद की मृत्यु के कुछ सालों बाद ही अब व्यापारियों द्वारा हो चुका था। दक्षिण के राष्ट्रकूट राजाओं ने अपने राज्य में इन्हें विशेष रियायतें दी थी और मस्जिद निर्माण में राजकीय मदद भी। किन्तु 12वीं शताब्दी की शुरुआत में भारत में इस्लामी स्टेट स्थापित होने के बाद इस्लाम का बड़े पैमाने पर प्रचार प्रसार हुआ कुछ ताकत और तलवार के दम पर तो कुछ सूफियां के प्रभाव से तो कुछ सल्तनत में बड़े ओहदों की लालच में।
रायसेन में एक बड़ी सूफी दरगाह संत हज़रत पीर फतेहुल्लाह शाह की है जिनके बारे में मान्यता है कि वे निजामुद्दीन औलिया के परिवार से थे। दरगाह में आने वालों में मुसलमान से ज्यादा हिंदू होते हैं वैसे भारतीय उपमहाद्वीप में सूफ़ी दरगाहे सदियों से इस्लामी कन्वर्जन की साइलेंट सेंटर्स रही हैं। भारत की आम जनता के बीच सूफियों के प्रभाव और इस्लामाइजेशन पर रिचर्ड एम. ईटन ने अच्छा खासा शोध किया है।
रिचर्ड मैक्सवेल ईटन (जन्म 1940) एक अमेरिकी इतिहासकार हैं , जो वर्तमान में एरिज़ोना विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर हैं। उन्हें इस्लामी राज्य के दौरान और कालांतर में हुए इस्लामी कन्वर्जन में सूफियों की भूमिका और भारत के इंडो- इस्लामिक सांस्कृतिक इतिहास पर सबसे बेहतर काम का श्रेय दिया जाता है। उनका शोध दक्कन , बंगाल सीमांत और भारत में इस्लाम पर केंद्रित है। ईटन ने भारत और भारत से संबंधित कई सामाजिक धार्मिक और सांस्कृतिक विषयों पर कई शोधपरक पुस्तकें लिखी हैं। ऐसी ही एक पुस्तक है- “दि राइज ऑफ इस्लाम एंड बंगाल फ्रंटियर”, 1204-1760, Oxford University Press -1993
इस शोध में ईटन ने बताया है कि कैसे बंगाल में 13वीं 14वीं शताब्दी के दौरान साइलेंट हिंदू धर्मांतरण का खेल हुआ। ईटन ने बंगाल में हिंदुओं के मुस्लिम कन्वर्जन के चार फेस बताएं हैं- Inclusion( आम हिंदू जनता के बीच इस्लामिक मूल्य का समावेश), Identification( इस फेज में इस्लामी धार्मिक मूल्यों को हिंदू मान्यताओं के साथ संयोजित किए जाने की कोशिश हुई, जैसे मध्यकाल में लिखी कई बंगाली कविताओं में अल्लाह को ईश्वर के साथ यानी अरबी शब्द अल्लाह को संस्कृत के निरंजन के साथ एक दूसरे के स्थान पर इस्तेमाल किया गया। ), Displacement( इंडो-इस्लामी मिक्स मान्यताओं में से स्थानीय हिंदू मान्यताओं को निकाल कर विशुद्ध इस्लामी समाज की निर्मिति) और आख़िर में stage of monotheistic idealism यानी एकेश्वरवादी इस्लाम के रूप में विशुद्ध कन्वर्जन।
Inclusion या समावेशन से अभिप्राय उस प्रक्रिया से है जिसके द्वारा सूफियों के प्रभाव से हिंदुओं के बीच इस्लाम का प्रचार हुआ। सूफियों ने सामान्य गरीब हिंदू परिवारों के बीच घुसपैठ की और उनके बीच हिंदू सांस्कृतिक मूल्यों के साथ इस्लामी मूल्यों को फैलाया। सूफी स्वयं ऐसी जीवनचार्य जीते थे जो एक सामान्य हिंदू संत की होती थी। इससे बड़ी संख्या में हिंदुओं ने अपना धर्म मानते हुए भी सूफियां की संगति को स्वीकार किया। सूफियों की जीवन पद्धति किसी साधु संत से मिलती-जुलती थी जैसे सूफियों का झोपड़ीनुमा खानकाह में रहना, योग करना, माला फेरना इत्यादि। स्थानीय हिंदू इन्हें और किसी सामान्य हिन्दू संत को एक मानने लगे। वह खानकाह में जाकर सूफियों से दीक्षा लेने लगे, उनकी तकरीरों का हिस्सा बनने लगे। जाने अनजाने एक हिंदू द्वारा हिंदू और इस्लामी दोनों पद्धतियों की प्रैक्टिस को अपनाया जा चुका था। बंगाल में मुसलमानों के शासन का यह काल शांतिपूर्ण सह अस्तित्व का था।
Displacement या विस्थापन से अभिप्राय उस प्रक्रिया से है जिसके द्वारा आईडेंटिफिकेशन वाले दौर में हिंदू और मुस्लिम दोनों मान्यताओं को स्वीकार चुके हिंदुओं के बीच में से हिंदू मान्यताओं अथवा देवी देवताओं को निकाल बाहर किया गया और विशुद्ध इस्लामी मूल्यों को स्थापित किए जाने की कोशिश हुई। ऐसा उन्नीसवीं और बीसवीं सदी की शुरुआत में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जब “फ़ारिज़ी” और “तारीका-ए-मुहम्मदिया” जैसे इस्लामी सुधार आंदोलनों की लहरें बंगाली ग्रामीण इलाकों में छा गईं। इन आंदोलनों का उद्देश्य बंगाली इस्लाम से उन सभी स्वदेशी हिंदू मान्यताओं और प्रथाओं को हटाना था और लोगों में केवल अल्लाह और पैगंबर मुहम्मद के प्रति प्रतिबद्धता पैदा करना था। आज के दौर में यही काम तबलीगी जमात के लोग कर रहे हैं। याद करिए राजस्थान हरियाणा के मेवात क्षेत्र में मेवाती मुसलमान जो एक समय हिंदू राजपूत हुआ करते थे। ये आजादी के वक्त तक शादी विवाह में हिंदू धार्मिक परंपराओं का निर्वहन करते थे, उनके नाम हिंदू थे जैसे “इंद्र खान मेवाती” । किंतु दयानंद के शुद्धि आंदोलन के जवाब में खड़ा हुए तबलीगी आंदोलन ने मेवाती मुसलमान को विशुद्ध इस्लामी तौर तरीकों को अपनाने हेतु विवश किया।
रिचर्ड ईटन की पुस्तक की लिंक कमेंट बॉक्स में है जिसके बिंदु क्रमांक 10, The Rooting of Islam in Bengal के बाद के पन्नों में इस्लामिक कन्वर्जन को तथ्यात्मक और साइंटिफिक तरीके से समझाया गया है।
लोग कहते हैं कि भारत में इस्लाम का प्रसार तलवार की धार पर हुआ, वैसे बंगाल मैं यह बड़े शांतिपूर्ण तरीके से हुआ। आखिर यहां इस्लामी और हिंदू मूल्यों का असिमिलेशन हुआ कैसे?
एक दृष्टि में जितनी हिंदू मुस्लिम सहिष्णुता और सामंजस्य आप बंगाल में देखेंगे उतनी और कहीं नहीं और यह भी कि जितना कट्टरपंथ आज आप यहां देखेंगे उतना आप कहीं नहीं। बांग्लादेशी क्रिकेटर तौहीद हृदय और शांतो; शेख हसीना की साड़ी का स्टाइल देखिए; भाषा को ही ले लीजिए- आज की हिंदी तो देवनागरी में लिखी गई उर्दू है, किन्तु बंगाली आज विद्यमान वह भाषा है जो संस्कृत के सबसे ज्यादा नजदीक है। एक बांग्लादेशी मुसलमान भी संस्कृत के शब्दों को अवचेतन मन से ही सही बोलता है, उतना बोलता है जितना हम और आप नहीं बोलते हैं। हिंदू मुस्लिम कल्चरल असिमिलेशन के पीछे एक लंबी इतिहास परंपरा रही है।
तेरहवीं शताब्दी की शुरुआत में बख्तियार खिलजी ने बंगाल पर आक्रमण किया।बंगाल में राजा लक्ष्मण सेन की हार हुई, सेन राजवंश का पतन हुआ और बंगाल दिल्ली के तुर्की सल्तनत का हिस्सा बना। कालांतर में बंगाल दिल्ली सल्तनत से स्वतंत्र हो गया जिसमें कुछ स्थानीय हिंदू तो कुछ मुस्लिम सुल्तान राज करते रहे। इलियास शाही राजवंश (1342 से1415), गणेश राजवंश (1415 से 1435) हुसैन शाही वंश (1494 से 1538), तदनंतर में बंगाल मुगल बादशाहत और फिर अंग्रेजों के नियंत्रण में रहा।
पूरे मध्यकाल में एक बड़ा बदलाव एक बंगाली ब्राह्मण राजा गणेश (महाराज गणेशनारायण राय भादुड़ी) के समय हुआ। राजा गणेश इलियासी सुल्तान के अधीन एक जमींदार था जिसने तत्कालीन इलियासी सुल्तान की हत्या की और खुद राजा बन गया। 1415 में जौनपुर के शर्की शासक इब्राहिम शाह ने राजा गणेश को पराजित किया। राजा गणेश का बेटा यदुजीतमल ने इस्लाम धर्म अपना लिया और वह इब्राहिम शाह शर्की से मिल गया और सुल्तान “जलाल-उद-दीन मुहम्मद शाह” (1415-1432) के रूप में बंगाल पर राज किया। जलाल-उद-दीन एक कट्टर मुसलमान था, उसने अबू हनीफा के संप्रदाय को स्वीकार किया, मक्का में कई घर और मदरसे बनवाए, और मिस्र के खलीफा और अल-अशरफ बार्सबे के साथ उसके राजनयिक संबंध थे। उसके सिक्कों पर कलमा लिखा हुआ है, और उसने अपने शासनकाल के अंत में खलीफात अल्लाह की उपाधि धारण की। वह अपने भोजों में गोमांस तो उपलब्ध कराता था। उसने कई हिंदुओं को जबरन इस्लाम में परिवर्तित किया, जिसके परिणामस्वरूप कई हिंदू कामरूप में भाग गए। बंगाली भद्रजन का भयानक उत्पीड़न शुरू किया और कट्टरपंथी हिंदू ब्राह्मणों का कत्लेआम हुआ। बंगाल में सर्वाधिक धर्मांतरण जलाल-उद-दीन के इस्लाम स्वीकारने के बाद हुए।
सुल्तान नुसरत शाह (1519 से 1532) एक सहिष्णु शासक था जिसे महाभारत और रामायण का बंगाली में अनुवाद करने का श्रेय दिया जाता है। बांग्ला महाभारत का आरंभ बंगाल के शांतिपूर्ण और मंगलमयी हुसैन शाही शासन की लंबी प्रशस्ति से होता है। सुल्तान को ना सिर्फ ‘एक बहादुर योद्धा’ और ‘एक प्रसिद्ध शासक’ बल्कि गौड़ का ईश्वर तक कहा गया है और उसकी तुलना कृष्ण से की गई है।
मुगल कालीन बंगाल में औरंगजेब के समय और बाद में मुर्शिद कुली खान एक ताकतवर मुस्लिम शासक था जो 1660 में एक हिंदू ब्राह्णण परिवार में पैदा हुआ। पैदाइशी नाम सूर्य नारायण मिश्रा था। हिंदुओं को उसने अपने शासन में अहम पदों पर बिठाया यद्यपि कि उसका ये भी नियम था कि जो भी किसान अथवा ज़मींदार लगान न दे, उसको परिवार सहित मुस्लिम होना पड़ता था।
वैसे एक बात ध्यान देने वाली है वह यह कि बंगाल में इस्लामी और हिंदू मूल्यों का असिमिलेशन हुआ ही था डिस्प्लेसमेंट के लिए। किसी समाज के ऊपर अपने मूल्यों को आप तभी थोप सकते हैं या उनको अपने विचारों के प्रति उनके मन में सद्भाव तभी डाल सकते हैं जब उनको आप यह महसूस करा सकें कि वह और हम एक हैं। पहले एक होना और ऐसिमिलेशन के कुछ वक्त बाद क्षेत्रीय या सांस्कृतिक मूल्यों को बाहर कर देना और अपने विशुद्ध मूल्यों के साथ आगे बढ़ना। भारत में विशेषता सुदूर बंगाल में इस्लाम का विस्तार कुछ इसी तरह हुआ।
एक बात और सुल्तानो और बादशाहों के दरबार में ऊंचे पदों के लालच में जिस तरह उत्तर भारत में राजपूतों ने बड़े पैमाने पर धर्मांतरण किया( बाजवा, मुशर्रफ, मिन्हास, “राजा” सरनेम वाले पाकिस्तान के तमाम राजनीतिक और सैन्य अधिकारी) इसी तरह बंगाल में ब्राह्मणों (राजा गणेश, मुर्शीद कुली खान) ने।
भारत में माइनॉरिटी समुदाय के उपासना स्थलों या मदरसों में धर्म की बेसिक जानकारी देने की परंपरा रही है। समर्थ परिवारों में एक मौलाना घर जाकर उर्दू फारसी और अरबी का ज्ञान बच्चों को देता है। किंतु हिंदू इकोसिस्टम कुछ ऐसा है कि यहां धर्म, संस्कृति और संस्कृत भाषा के ज्ञान हेतु कोई संस्थात्मक व्यवस्था (टोल या पाठशाला) अब नहीं बची है। एक औसत हिंदू परिवार में बच्चा अपनी संस्कृति या धर्म के बारे में परिवारजनों से किस्से कहानियों के माध्यम से अथवा बहुत हुआ तो टीवी सीरियल्स के माध्यम से जितना जानता है, उतना ही वह धर्म को जानता है। बच्चा जब पैदा होता है तो क्रमशः उसे कुछ बातें सीखने को मिलती है- सब के प्रति सद्भाव, अहिंसा, वसुधैव कुटुंबकम् इत्यादि इत्यादि। इसलिए आक्रामकता एक औसत हिंदू के अंत मन में प्रायः नहीं होती। पिछले दिनों बांग्लादेश में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा हुई और अल्पसंख्यक हिंदू बौद्ध उपासना स्थलों, घरों को जलाया गया तथा माइनॉरिटी लोगों की लिंचिंग की गई। भारत के भी कई लोग उद्वेलित हुए, कुछ महीने तक जोश रहा। अब साफ सब शांत है और वह बंगाली साधु जिसे बांग्लादेशी पुलिस ने अरेस्ट किया था वह आज भी बिना सुनवाई जेल में सड़ रहा है।
अब फिर लौटते हैं रायसेन वाले टॉपिक पर। आज भारत में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था है। सेकुलर स्टेट एक न्यूट्रल स्टेट होता है जिसे अपना कोई धर्म नहीं होता वह सभी धर्म के लिए समान रूप से फैसिलिटेट करता है। यह एक अच्छी बात है, किंतु हर सिस्टम में कुछ लूप होल्स हैं जिसका फायदा धूर्त लोग उठाते हैं। रायसेन जैसे तमाम जगहों पर गरीब और अशिक्षित परिवारों को धर्मांतरित करने की जो प्रयास हो रहे हैं, वह यही धूर्तता है। जो काम कट्टर इस्लामी रूल में नहीं हुआ वह एक सेकुलर स्टेट में होता आ रहा है।
किसी व्यक्ति को अपनी आस्था चुनने का अधिकार होना चाहिए, किंतु हम इतने सक्षम हो कि हम जिस कम्युनिटी अथवा परंपरा में जा रहे हैं उसके बारे में और अपने वर्तमान धर्म के बारे में जानकारी रखते हों। किसी के प्रभाव में अथवा लालच में आकर किया गया धर्मांतरण अमानवीय है, क्योंकि धर्मांतरण के बाद आप स्वयं को अपने धर्म, अपने समुदाय अपनी सांस्कृतिक जड़ों और पूर्वजों के इतिहास से स्वयं को काट लेते हैं। इसके सामाजिक सांस्कृतिक प्रभाव को पाटने में पीढ़ियां लग जाती हैं। एक सामान्य आर्थिक हैसियत के बिना अशिक्षित और निरक्षर लोगों का धर्मांतरण नहीं होना चाहिए।
एक बात यह भी की जो संगठन कन्वर्जन के बाद इसके विरोध में एक्टिव होते हैं वह प्राय: शोर ज्यादा मचाते हैं जबकि कन्वर्जन रैकेट हमेशा साइलेंटली काम करता है।
मध्य प्रदेश में कठोर एंटी कन्वर्जन लॉ है, कार्यवाही करिए ना पर कुछ नहीं होना। हमारे यहां राजनीति और प्रशासन एक सामान्य ढर्रे पर काम करते हैं। प्रशासन सांप्रदायिक तनाव नहीं चाहता, होना भी नहीं चाहिए। जिले के कलेक्टर अथवा अन्य प्रशासनिक अधिकारियों को निर्विवाद अपनी नौकरी बचा के चलना है। दिल्ली चुनाव में रोहिंग्या बहुत बड़ा मुद्दा बना था, अब सारे रोहिंग्या भारत से चले गए क्या? 10- 12 साल पहले संसद में स्वीकार किया गया कि भारत में दो करोड़ बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं आज वह संख्या और भी ज्यादा बढ़ गई होगी। ट्रंप के आने के बाद अमेरिका की तरह हमने इन्हें बाहर निकालने की अभी तक इच्छा शक्ति दिखाई क्या? हम हैं ही ऐसे – पूर्वाग्रही, अंतर्विरोधों से ग्रस्त, राजनीतिक इच्छाशक्ति विहीन सटीक फैसले लेने से घबराने वाले सेकुलर सोशलिस्ट रिपब्लिक।
-लेखक मप्र आबकारी विभाग में इंस्पेक्टर हे।