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दिव्य चिंतन:: पत्रकारिता पर सवाल !- हरीश मिश्र

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विवाह समारोहों में सालियाँ अक्सर जीजा के जूते चुराकर शगुन के पैसे मांगती हैं। यह प्यारी सी परंपरा हम आपके हैं कौन…! जैसी फिल्मों में भी दिखाई गई है।

कुछ ऐसा ही प्यारा दृश्य भोपाल परिवहन विभाग की एक दाम सूची में देखने को मिला। सूत्रों के अनुसार, कुछ पत्रकारों ने प्रेस की स्वतंत्रता का सुरक्षा कवच बनाकर, जीजा (अधिकारियों) की महत्वपूर्ण फाइलें ‘छुपा’ लीं और फिर सौदेबाजी की पेशकश की – पैसे दे दो, फाइलें ले लो। जीजा ने भी शर्त मान ली और काली-पीली फाइलें वापस पाकर राहत की सांस ली।

लेकिन कहानी में मोड़ तब आया, जब जीजा ने पैसे लेकर फाइलें लौटाने वाले संवाददाता, संपादक, स्तंभकार, उद्घोषक की सूची सार्वजनिक कर दी। जो दूसरों के समाचार चैनलों और अखबारों में सुर्खियां बनाते थे, वे खुद सुर्खियों में आ गए। जैसे ही नाम सुर्खियों में आए, उनका चेहरा लाल-पीला हो गया। उनके माथे पर रोली का टीका नहीं, काली स्याही का टीका लगा। भोपाल ताल का पानी और कलमकारों की कलम की स्याही भी प्रदूषित हो गई। सूची में नाम आने से कुछ पत्रकारों की चमड़ी छिल गई और जलन भी मच रही है।

इस सूची के उजागर होने से कहीं खुशी, कहीं गम का माहौल है। प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकारों के नाम और उनके ‘नजराने’ की राशि ए-4 के पन्नों पर काली स्याही से दर्ज है।

फिल्म थ्री इडियट्स का वह संवाद याद आ गया – “दोस्त अगर फेल हो जाए तो दुख होता है… लेकिन अगर दोस्त फर्स्ट आ जाए तो ज्यादा दुख होता है।” पत्रकार दोस्तों के बीच भी कुछ ऐसा ही हुआ – अगर किसी पत्रकार दोस्त को ‘शगुन’ न मिले तो दुख होता है और अगर एक लाख मिल जाए तो उससे भी ज्यादा दुख होता है।” अपने ही दोस्त को शगुन मिलने पर दोस्तों को सोशल मीडिया पर दुखी होते देखा।

इस सूची में उन कलमकारों के नाम देखे, जो सदैव सत्य और ईमानदारी का जागरण में सबसे आगे और सबसे तेज माइक लेकर चलते हैं। अट्ठारह और चौबीस बरस की बाली उमरिया के माइक में घुंघरू बंधे देखे। उन जोशीले लोगों के नाम भी देखे जो द्वारका की पाठशाला में जोश, जुनून और जज़्बे के साथ सोमवार को नो निगेटिव हो जाते हैं। पत्रकारिता के कठोर साधक राजस्थान के गुलाब के शिष्यों को फूलों का रस पीते देखा। रावतपुरा सरकार की कृपा से पत्रकारिता के क्षेत्र में विस्तार करने वालों को परिवहन कक्ष में स्थापित होते देखा। जो सबकी खबर रखते हैं, उनकी खाल सुकड़ते देखी। हिंदी में मेल करने वाले ‘दादा’ को भी ‘मैला’ होते देखा। शरद पूर्णिमा के चांद पर दाग देखा। बिच्छू का ज़हर उतरते देखा। हेमंत ऋतु में प्रजातंत्र की बिंदी लाल से काली होते देखी। अग्निपथ पर चलने वाले अग्निबाण को ताल में बुझते देखा। सीएम से सवाल करने वालों को पीएम में डूबते देखा। कदम-कदम पर दखल देने वालों को अनुराग पूर्ण वातावरण में फाइल निबटाते देखा। बुंदेली बौछार से परिवहन विभाग को भीगते देखा।

वैभव शाली देवालय में प्रकाश की किरण में प्रभु के पुरोहितों को मंत्रोच्चार से दीप्ति को चौरासी दिन के लिए प्रज्वलित कर अभिषेक करते देखा।

सच यह भी है कि न्यू मार्केट की भीड़ में दो आंखें लड़ जाती हैं, लेकिन सिद्ध करना कठिन होता है। वैसे ही पत्रकार ने पैसे लिए, यह सिद्ध करना कठिन है। इस साक्ष्यविहीन सूची के प्रकाशन से पत्रकारों को सबक लेना चाहिए कि जब वे साक्ष्यविहीन समाचारों का प्रसारण या प्रकाशन करते हैं, तब उनकी वाणी या कलम से घायल पीड़ित पक्षकार को कैसा लगता होगा।

९० के दशक का हवाला कांड सभी को याद होगा। डायरी में कुछ राजनेताओं के नाम अंकित थे, जिससे राजनीति में भूचाल आ गया था। मामला न्यायालय तक गया, और न्यायालय ने कहा कि कानूनन डायरी के पन्ने साक्ष्य नहीं बनते।

किसी ने ठीक ही कहा है – विधि के अनुसार ए-४ पन्नों पर लिखे नाम कानूनी सबूत नहीं माने जाते, यह मात्र एक आरोप है। लेकिन इस आरोप ने भोपाल में पत्रकारिता की छवि पर गहरे दाग जरूर छोड़े हैं। इन दागों को साफ करने के लिए स्वस्थ और स्वतंत्र प्रेस का होना आवश्यक है।

-लेखक स्वतंत्र पत्रकार हे।

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