आलेख
संदीप भम्मरकर
बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने सियासत में नई लकीर खींच दी है। पार्टी की गाड़ी लेने से इनकार करने के बाद सरकारी बंगले से भी परहेज किया। शुरुआत में इसे निजी पसंद कहा गया, लेकिन अब यही पार्टी की नयी रवायत और मिसाल बन रही है। सरकारी बंगला खाली कराने का नोटिस मिलने पर नेता गुहार लेकर पहुंचे तो खंडेलवाल का जवाब साफ था—जिसके पास सामर्थ्य है, उसे सरकारी सुविधा नहीं चाहिए। सरकारी बंगला-गाड़ी पर आम कार्यकर्ताओं का हक बताया गया। नतीजा यह कि अब मांग करने वाले नेता खुद ही चुप हैं। लालबत्ती प्रेमियों की चमक फीकी पड़ गई है।

कनेक्शन बनेगा तो किसका कटेगा?
पीसीसी दफ्तर में शुरू हुई कनेक्शन डेस्क ने कांग्रेस के भीतर हलचल बढ़ा दी है। बूथ और गांव के कार्यकर्ताओं को सीधे पीसीसी से जोड़ने का दावा है, ताकि गुटबाजी की दीवार ढहाई जा सके। दरअसल, पार्टी के ही कई दिग्गज काम करने वाले छोटे नेताओं का कनेक्शन पीसीसी से काट देते हैं। लिहाजा मकसद नेक नजर आता है—जो जमीन पर काम करता है, वही लाइन में आए। लेकिन पार्टी के दिग्गज पहले ही कह चुके हैं कि गांवों में कार्यकर्ता मिलते ही नहीं। ऐसे में सवाल यह नहीं कि कनेक्शन बनेगा या नहीं, असली सवाल है कि पीसीसी में बनाए गए इस कमांड और कनेक्शन सेंटर के सीधे संपर्क में आने से किन-किन दिग्गजों का सियासी जमीनी नेटवर्क कट जाएगा?
कुर्सी से पहले सेटिंग
निगम-मंडल की सूची तैयार है, लेकिन बीजेपी को पता है—एक अनार, सौ बीमार। इसलिए नाम जारी होने से पहले ही डेमेज कंट्रोल मोड ऑन कर दिया गया है। दावेदारों का ही नहीं, सिफारिश करने वाले नेताओं का भी एडजस्टमेंट चल रहा है। हाल में आई जिला प्रभारियों की सूची इसी ‘एडजस्टमेंट ड्राइव’ कसरत का नमूना है। जल्द कुछ और संगठनात्मक नियुक्तियां होंगी, ताकि नाराज़गी पहले ही ठंडी कर दी जाए। उसके बाद निगम-मंडल आएंगे। हालांकि, बवाल पूरी तरह टल जाएगा—इसकी गारंटी देना मुश्किल है।

विजय शाह का ‘आधा पर्दा’
कैबिनेट मंत्री विजय शाह के मामले में एक मशहूर शेर की केवल दूसरी पंक्ति ही काफी है… पंक्तियां हैं- साफ छिपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं। एक बयान को लेकर निगेटिव सुर्खियां बटोर रहे विजय शाह के साथ ऐसा ही कुछ हो रहा है। मीडिया के सामने आते हैं, लेकिन बचकर भागने का दृश्य खबर बन जाता है। दूसरी तरफ खुद ही वीडियो जारी करके अपनी बात कहने लग जाते हैं। अब तक चार बार माफीनामे का वीडियो जारी कर चुके विजय शाह मीडिया के सामने न केवल चुप्प हैं, बल्कि टीवी चैनलों से भाग रहे हैं। वे केवल कैमरे पर नजर आते हैं, टीवी चैनल के माइक पर कुछ भी बोलने से कतरा जाते हैं। हालांकि सियासी गलियारे में इस बात की चर्चा है कि विजय शाह के छिपना भी नहीं और सामने आना भी नहीं वाला रवैया किस सलाहकार की तरकीब है? वैसे, दाग देहलवी का ये पूरा शेर भी गौर फरमा लीजिए… “ख़ूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं, साफ़ छुपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं।”
हटाए गए, पर ऊंचाई मिल गई!
हरदा बवाल के बाद साहब को हटाया गया, वो भी ढोल-नगाड़ों के साथ। संदेश दिया गया था कि सरकार की लाठी चल चुकी है। वैसे यह एक समुदाय को संतुष्ट करने का इंतज़ाम था। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। हटाए गए साहब की अगली पोस्टिंग सजा नहीं, इनाम बन गई। भोपाल में पोस्टिंग मिलने के बाद अब वे केंद्र के इंटेलिजेंस ब्यूरो की खास कुर्सी पर जा बैठे हैं। पीएचक्यू में कानाफूसी है कि आखिर ऐसा कौन सा हाथ है, जो गिरते वक्त भी साहब को ऊपर पहुंचा रहा है?
कलेक्टर गए, कैश कनेक्शन रह गया
गाजे-बाजे के साथ विदा किए गए कलेक्टर को भोपाल में बढ़िया कुर्सी मिल गई और जिला भी अचानक शांत हो गया। साहब संतुष्ट हैं, सिस्टम भी राहत में है। लेकिन प्रशासनिक गलियारों में एक नाम बार-बार उछल रहा है—भदौरिया। वही, जो जिले के फाइनेंशियल मैटर संभालता था और अब अचानक गायब है। न दिख रहा है, न सुनाई दे रहा है। वैसे जिले से विदाई के दौरान एक लेनदेन की खूब चर्चा थी, और कुछ तो ये भी कहते हैं कि वो बढचढ़ कर जिले के मामलों का ठेका ले रहा था। बहरहाल, तलाश अभी जारी है।

– लेखक मप्र के वरिष्ठ पत्रकार हैं।