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घड़ी सरकारी, टाइम अफसरी

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बा-मुलाहिजा– संदीप भम्मरकर

कागजों में सरकारी दफ्तर सुबह 10 से शाम 6 तक चलते हैं, हकीकत इससे कोसों दूर है। सीएस साहब ने साल भर पहले वक्त की पाबंदी का डंडा जरूर उठाया था, लेकिन मंत्रालय में आमद अब भी साढ़े 11 के बाद ही होती है। शाम 4 बजे से कुर्सियां खाली होने लगती हैं और लंच एक घंटे का नाम भर है। लूप लाइन पोस्ट वालों का लंच दो घंटे से कम नहीं। अब सीएम ने सख्त लहजा अपनाया है कि टाइमिंग नहीं सुधरी तो शनिवार-रविवार की छुट्टी यानी फाइव डे वीक का फॉर्मूला बंद कर दिया जाएगा। पर सिस्टम सुधरे, इसकी उम्मीद कम ही है।

रिटायरमेंट के बाद भी रुतबा ऑन ड्यूटी
सीएम सचिवालय की ग्लैमरस और पॉवरफुल पोस्ट का नशा आसानी से उतरता नहीं। यही वजह है कि एक रिटायर्ड आईएएस साहब आज भी सीएम सेक्रेटरेट में बेझिझक आते-जाते नजर आते हैं। रिटायरमेंट के बाद उन्हें विश्वविद्यालयों से जुड़े एक आयोग में मेंबर बनाया गया है, मगर साहब सीएम के काफिले और कोर टीम में अक्सर दिख ही जाते हैं। सियासत में मौजूदगी के मायने गहरे होते हैं।

रसूख भारी पड़ी रसीदें
भोपाल में क्लब चलाने को लेकर चर्चित दो बीजेपी नेताओं की बीते दिनों खूब किरकिरी हुई। उम्मीद थी कि मामला रूटीन में निपट जाएगा, लेकिन जीएसटी ने अचानक धावा बोल दिया। संयोग देखिए, छापेमारी के वक्त एक नेताजी सूबे के मंत्री के साथ भ्रमण पर थे। फोन घनघनाए, नाराजगी दिखाई गई, पर तब तक कागजी कार्रवाई पूरी हो चुकी थी। नतीजा—लाखों की रिकवरी। नेताजी के रसूख भी कम नहीं हैं, एक महाराज के चहीते हैं तो दूसरे पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के खासमखास। रसूख कायम है, पर चर्चा और बढ़ गई।

सफेदा की सफेदी में सियासी दाग
भोपाल में पहले ‘मछली’ ने किरकिरी कराई, अब ‘चमड़ा’ ने सत्ता को आईना दिखा दिया। सफेदा के नाम पर चल रहा गौकशी का बेखौफ खेल सिर्फ तस्करों तक सीमित नहीं था, इसकी जड़ें लोकल नेताओं और सफेदपोश सरपरस्तों तक फैली थीं। नगर निगम की रिपोर्ट ने 26 टन मांस को दबाने की कोशिश की, लेकिन बाहर की लैब ने दो हजार गायों की सच्चाई उघाड़ दी। अब सवाल यही है कि इतने खुलासों के बाद भी जिम्मेदारों की चुप्पी किसे बचा रही है?

राजू बन गया जेंटलमैन!
सीएम हाउस में एक दिन के ओएसडी क्या बने, हेल्थ डिपार्टमेंट के साहब खुद को स्थायी ताकत समझ बैठे। पोस्टिंग ने ऐसा कद बढ़ाया कि अब मुरव्वत इतिहास हो गई है। विभाग में उनका नया कारनामा फिलहाल दबा हुआ है, लेकिन बाहर आने की स्क्रिप्ट लिखी जा चुकी है। ट्रांसफर-पोस्टिंग के सूखे में साहब ने जिलों से डायरेक्ट लाइन बना ली—जो अब सिस्टम बन चुका है। ट्विस्ट यह कि एक फोन रिकॉर्डिंग संघ के सीनियर पदाधिकारी तक पहुंच चुकी है। बस इंतजार है, सही वक्त का।

इंदौर में पटवारी का पावर शो
गंदे पानी से मौत कांड के बाद कांग्रेस ने इंदौर में अचानक दमदार एंट्री मारी है। पीसीसी चीफ का होम टाउन होने के बावजूद अब तक शहर में कांग्रेस की मौजूदगी फीकी थी, प्रदर्शन रुतबे से मेल नहीं खा रहे थे। रविवार का प्रदर्शन इस लिहाज से गेमचेंजर रहा। अंदरखाने की बात यह कि शुरुआत में इसे लोकल रखने की प्लानिंग थी, लेकिन बाद में इसे प्रदेश स्तरीय बना दिया गया। विधायकों को टारगेट सौंपे गए। दो साल बाद जीतू पटवारी ने इंदौर में ताकत दिखाई। हालांकि पार्टी के भीतर एक खेमा इसे अभी ‘बुलबुला’ ही मान रहा है।

लेखक – प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हे।

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