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“झील,जंगल और जीवन का संगम: वन विहार राष्ट्रीय उद्यान”

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विशेष लेख
सय्यद असीम अली

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल न केवल अपनी झीलों के लिए जानी जाती है, बल्कि अपने हरियाली भरे प्राकृतिक परिवेश और संतुलित शहरी योजना के लिए भी प्रसिद्ध है। इसी हरियाली की गोद में बसा वन विहार राष्ट्रीय उद्यान ऐसा प्राकृतिक स्थल है, जो पारंपरिक चिड़ियाघरों की अवधारणा से बिलकुल अलग सोच रखता है। यहाँ का सिद्धांत है — “प्रकृति का संरक्षण, प्रदर्शन नहीं।”

यह पार्क भोपाल की ऊपरी झील के दक्षिणी तट पर लगभग 445 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है। इसकी स्थापना वर्ष 1983 में की गई थी, लेकिन इसे राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा वर्ष 1996 में मिला। इसके बाद से वन विहार ने धीरे-धीरे खुद को एक आदर्श इको-संवेदनशील क्षेत्र के रूप में विकसित किया है, जहाँ वन्यजीवों को उनकी प्राकृतिक परिस्थितियों में संरक्षित किया जाता है।

जल, हरियाली और जीवन का मधुर मेल

भोपाल का वन विहार राष्ट्रीय उद्यान अपनी अनूठी भौगोलिक स्थिति के कारण विशेष पहचान रखता है। यह उद्यान शहर की जीवनशैली और प्राकृतिक सौंदर्य के बीच एक सेतु का कार्य करता है। ऊपरी झील के किनारे फैला यह क्षेत्र भोपाल को सचमुच “सिटी ऑफ़ लेक्स एंड ग्रीन्स” बनाता है।

भोपाल का वन विहार राष्ट्रीय उद्यान केवल एक वन्यजीव क्षेत्र नहीं, बल्कि प्रकृति और शहर के बीच जीवंत संवाद का माध्यम है। इसकी सबसे अनोखी पहचान है — झील और जंगल का अद्भुत संगम।
झील की नीली लहरें और घना हरा जंगल, दोनों मिलकर ऐसा नज़ारा पेश करते हैं जो न केवल मन मोह लेता है बल्कि आत्मा को भी शांति प्रदान करता है।सुबह का समय यहाँ सबसे मनमोहक होता है। झील की सतह पर हल्की धुंध तैरती है, दूर कहीं से जलपक्षियों की आवाज़ें सुनाई देती हैं, और सूरज की सुनहरी किरणें पेड़ों की शाखाओं के बीच से झाँकती हैं — यह दृश्य किसी चित्रकला जैसा प्रतीत होता है।
यहाँ का वातावरण इतना शांत और पवित्र है कि हर आगंतुक कुछ क्षणों के लिए शहर की भागदौड़ और तनाव से मुक्त होकर स्वयं से जुड़ जाता है।

वन विहार में सैर करना या झील के किनारे बैठना केवल एक मनोरंजन नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुभव है। यहाँ प्रकृति के हर तत्व — हवा, जल, वृक्ष और वन्यजीव — के साथ एक सहज संबंध महसूस होता है। यह संबंध किसी प्रदर्शन या आकर्षण से नहीं, बल्कि अंतरमन की शांति और जुड़ाव से उपजता है।

झील का पानी वन विहार की पारिस्थितिकी को संतुलित रखता है। यह जलस्रोत न केवल पक्षियों और जानवरों के लिए जीवनरेखा है, बल्कि आसपास की वनस्पतियों को भी हरा-भरा बनाए रखता है। सर्दियों में यहाँ साइबेरियन और अन्य प्रवासी पक्षियों का आगमन इस संगम को और भी जीवंत बना देता है।

यहाँ बैठकर जब पर्यटक झील की ठंडी हवा का स्पर्श महसूस करते हैं और हिरणों को खुले मैदानों में दौड़ते देखते हैं, तो ऐसा लगता है मानो समय थम गया हो।
वन विहार का यह झील-जंगल संयोजन भोपाल की पहचान बन चुका है — एक ऐसा स्थल जहाँ शहर का शोर थमता है और प्रकृति की आवाज़ गूँजती है।

यह संगम हमें यह सिखाता है कि आधुनिक जीवन की आपाधापी में भी यदि हम प्रकृति से जुड़ाव बनाए रखें, तो मन की थकान मिट जाती है। वन विहार वास्तव में वह स्थान है जहाँ झील की शीतलता और जंगल की हरियाली मिलकर जीवन की लय को पुनर्जीवित करती हैं।

जैव विविधता की संपदा

वन विहार में लगभग 60 से अधिक स्तनधारी प्रजातियाँ, 300 से अधिक पक्षी प्रजातियाँ, और 40 से अधिक सरीसृप प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
यहाँ सर्दियों के मौसम में प्रवासी पक्षियों का आगमन इसे और भी जीवंत बना देता है। साइबेरियन, गीज़, कॉर्मोरेंट, पेंटेड स्टॉर्क, एग्रेट, किंगफिशर जैसे पक्षी यहाँ के जलाशयों और दलदली क्षेत्रों में देखे जा सकते हैं।

यह क्षेत्र नर्मदा और बेतवा बेसिन की पारिस्थितिकी का भी हिस्सा है, जिससे यहाँ की वनस्पतियों में बड़ी विविधता मिलती है। साल, सागौन, खैर, नीम, आंवला, और करंज के पेड़ों से ढका यह इलाका प्राकृतिक रूप से ठंडा और हराभरा बना रहता है।

अनोखी अवधारणा: ‘चिड़ियाघर नहीं, प्राकृतिक संरक्षण क्षेत्र’

भोपाल का वन विहार राष्ट्रीय उद्यान देश के उन विरले स्थलों में से एक है, जहाँ वन्यजीव संरक्षण की सोच को पारंपरिक चिड़ियाघर की सीमाओं से आगे बढ़ाया गया है।
यहाँ का मूल सिद्धांत है — “प्रदर्शन नहीं, संरक्षण।”

भारत के अधिकांश चिड़ियाघरों में जानवरों को लोहे के पिंजरों में बंद कर दिया जाता है, जहाँ वे अपनी स्वाभाविक आदतों से दूर, कृत्रिम माहौल में जीवन बिताते हैं। पर्यटक वहाँ जानवरों को देखते तो हैं, पर उनके असली स्वभाव, व्यवहार और प्राकृतिक जीवन का अनुभव नहीं कर पाते।
वन विहार इस सोच को पूरी तरह बदल देता है।

यहाँ किसी जानवर को पकड़कर नहीं लाया जाता। बल्कि यहाँ केवल घायल, बूढ़े, अनाथ या सर्कस, अवैध व्यापार और निजी पालतू संग्रहों से मुक्त कराए गए जानवरों को आश्रय दिया जाता है। इन जानवरों का उपचार किया जाता है, और उन्हें एक ऐसा सुरक्षित वातावरण प्रदान किया जाता है जहाँ वे अपने स्वाभाविक ढंग से जीवन जी सकें। इसी वजह से वन विहार को एक “रैस्क्यू एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर” (Rescue and Rehabilitation Centre) के रूप में भी जाना जाता है।

यहाँ के खुले एनक्लोज़र इस पार्क की सबसे बड़ी विशेषता हैं। यहाँ शेर, बाघ और तेंदुए पिंजरों में नहीं, बल्कि ऊँची और मजबूत बाड़ों से घिरे विशाल जंगल जैसे क्षेत्रों में स्वतंत्र रूप से घूमते हैं। इसी प्रकार भालू, हिरण, नीलगाय, मगरमच्छ, सर्प और अनेक पक्षी प्रजातियाँ भी अपने प्राकृतिक परिवेश में सुरक्षित रूप से रहती हैं।

इस तरह वन विहार ने यह सिद्ध कर दिखाया है कि वन्यजीव संरक्षण केवल प्रदर्शनी नहीं, बल्कि संवेदना और जिम्मेदारी का विषय है।
यह पार्क दर्शाता है कि जब मनुष्य प्रकृति को समझने की नीयत से आगे बढ़ता है, तो वह उसे संरक्षित करने का सबसे सशक्त माध्यम बन सकता है।

नो व्हीकल ज़ोन’: पर्यावरण संरक्षण की नई पहल

भोपाल के वन विहार राष्ट्रीय उद्यान ने हाल ही में एक सराहनीय कदम उठाया है — इसे ‘नो व्हीकल ज़ोन’ घोषित करने की प्रक्रिया शुरू की गई है। इस निर्णय का मुख्य उद्देश्य है, पार्क के भीतर प्रदूषण मुक्त और शांत वातावरण बनाए रखना, ताकि जानवरों को वाहनों के शोर, धुएँ और कार्बन उत्सर्जन से कोई नुकसान न हो।

अब यहाँ डीज़ल या पेट्रोल वाहनों के प्रवेश पर रोक लगाई जा रही है। इसके स्थान पर इलेक्ट्रिक वाहन, साइकिल और पैदल भ्रमण को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे न केवल पर्यावरण को लाभ होगा बल्कि आगंतुकों को भी प्रकृति के और करीब से अनुभव करने का अवसर मिलेगा।

यह पहल वन विहार को पारंपरिक चिड़ियाघरों से अलग बनाती है, जहाँ संरक्षण और संवेदनशीलता को प्राथमिकता दी गई है। पार्क प्रशासन का मानना है कि कम शोर और स्वच्छ हवा में जानवर अधिक सहज रहते हैं, जिससे उनके व्यवहार और स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

‘नो व्हीकल ज़ोन’ की यह पहल केवल एक पर्यावरणीय निर्णय नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए स्वच्छ और सुरक्षित प्रकृति छोड़ने की दिशा में उठाया गया कदम है — एक ऐसी सोच, जो भोपाल को “हरियाली और संतुलन का शहर” बनाती है।

संरक्षण और पुनर्वास की कहानियाँ

वन विहार राष्ट्रीय उद्यान केवल एक दर्शनीय स्थल नहीं, बल्कि एक जीवनदाता और संरक्षण केंद्र भी है। यहाँ हर कोने में मानव संवेदना और जीव-जंतुओं के प्रति जिम्मेदारी की झलक देखने को मिलती है।

यहाँ कई जानवर ऐसे हैं जिन्हें अवैध शिकारियों, झूले-खेलों या सर्कस से बचाया गया। कुछ साल पहले, दो शेर और एक भालू इसी तरह के संकट से निकाले गए थे। उन्हें सर्कस में कैद रखा गया था, जहाँ उनकी प्राकृतिक प्रवृत्ति दब चुकी थी। वन विहार में उन्हें सुरक्षित स्थान पर लाया गया, और पशु चिकित्सकों और रेंजरों की देखभाल में धीरे-धीरे उनका पुनर्वास शुरू हुआ।

इन जानवरों का पुनर्वास केवल शारीरिक उपचार तक सीमित नहीं है। उनके मनोविज्ञान और प्राकृतिक व्यवहार को समझते हुए उन्हें पर्याप्त स्थान, उपयुक्त आहार और मानसिक प्रोत्साहन दिया जाता है। रेंजर और पशु चिकित्सक दिन-रात उनकी सेहत, खान-पान और गतिविधियों पर निगरानी रखते हैं। धीरे-धीरे ये जानवर फिर से प्राकृतिक जीवन शैली अपनाने लगे और अब वे वन विहार में स्वतंत्र और सुरक्षित जीवन बिता रहे हैं।

वन विहार की ये कहानियाँ न केवल संरक्षण का प्रतीक हैं, बल्कि यह मानवता, संवेदनशीलता और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी की मिसाल भी पेश करती हैं। हर जानवर की सुरक्षा, देखभाल और पुनर्वास यहाँ की प्राथमिकता है, और यही इसे विशेष बनाता है।

पर्यावरण शिक्षा और जागरूकता केंद्र

वन विहार केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि एक शिक्षा केंद्र भी है।
यहाँ बच्चों और युवाओं के लिए विशेष ‘नेचर एजुकेशन प्रोग्राम’ आयोजित किए जाते हैं। इनमें जैव विविधता, जल संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण और वन्यजीव संरक्षण के विषयों पर जानकारी दी जाती है।

भोपाल के स्कूल और कॉलेज अपने विद्यार्थियों को यहाँ लेकर आते हैं ताकि वे किताबों में पढ़े गए “पर्यावरण संरक्षण” को जीवंत रूप में देख और समझ सकें।

इको-टूरिज्म का मॉडल

वन विहार को भारत में इको-टूरिज्म का एक उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। यहाँ विकास और संरक्षण का संतुलन बखूबी साधा गया है।
पार्क प्रशासन यह सुनिश्चित करता है कि पर्यटन से पर्यावरण को कोई हानि न पहुँचे। प्लास्टिक पर प्रतिबंध, साइलेंट जोन, सीमित वाहनों की अनुमति, और नियमित सफाई अभियान इस दिशा में बड़े कदम हैं।

इसके अलावा यहाँ बनाए गए वॉकिंग ट्रेल्स, व्यू पॉइंट्स, और बर्ड-वॉचिंग डेक्स पर्यटकों को प्रकृति का अनुभव बिना किसी बाधा के प्रदान करते हैं।

सह-अस्तित्व का सजीव उदाहरण

भोपाल का वन विहार राष्ट्रीय उद्यान आज एक ऐसी जगह है, जहाँ मनुष्य और प्रकृति साथ-साथ साँस लेते हैं।
यहाँ कोई पिंजरा नहीं, केवल सुरक्षा है। कोई बंधन नहीं, केवल सह-अस्तित्व है।
यह पार्क हमें यह सिखाता है कि विकास का अर्थ प्रकृति को पीछे छोड़ना नहीं, बल्कि उसके साथ चलना है।

वन विहार सिर्फ भोपाल की शान नहीं, बल्कि भारत के पर्यावरण प्रेम और संवेदनशीलता का प्रतीक है।यह वह स्थान है जहाँ शहर की भागदौड़ से निकलकर इंसान फिर से प्रकृति की गोद में लौट आता है,जहाँ हर पत्ता, हर पक्षी और हर हवा का झोंका यही कहता है –
“प्रकृति को देखने नहीं, महसूस करने की जगह है — वन विहार।”

लेखक पत्रकार सय्यद असीम अली

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