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अनुशासित जीवन जीने की प्रेरणा देने का महापर्व है दशलक्षण पर्व

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अंतिम दिन समाज ने की उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की आराधना

सुरेंद्र जैन धरसीवां

दिगंबर जैन समाज के दशलक्षण महापर्व का अंतिम दिन रहा ओर समाज के लोगों ने उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की आराधना की उत्तम क्षमा से लेकर उत्तम ब्रह्मचर्य तक दश धर्मों पर आधारित दशलक्षण महा पर्व संसार में अनुशासित जीवन जीते हुए मोक्ष मार्ग की प्रेरणा देता है।
28 अगस्त से शुरू हुए दशलक्षण पर्व के प्रथम दिन उत्तम क्षमा धर्म की आराधना करते हुए समाज के बच्चे बूढ़े जवान महिलाओं बच्चियों सभी ने मंदिर जी में विशेष पूजन विधान अभिषेक किया ओर व्रत उपवास किए ओर जीवन में प्राणिमात्र के प्रति उत्तम क्षमा का भाव रखने की प्रेरणा इस धर्म से ली इसी तरह उत्तम मार्दव उत्तम आर्जव उत्तम सत्य, उत्तम शौच, उत्तम संयम, उत्तम तप,उत्तम त्याग, उत्तम अकिंचन और अंतिम दिन उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म का पालन करते हुए समाज के लोगों ने मंदिर जी में विशेष पूजन विधान श्रीजी का अभिषेक किया ओर व्रत उपवास किए।

अनुशासित जीवन जीने की प्रेरणा
भले ही जैन धर्म का दशलक्षण पर्व साल में दस दिन के लिए आता है लेकिन यह महापर्व समाज के बच्चे बूढ़े जवान एवं महिलाओं बच्चियों सभी को संसार में अनुशासित जीवन जीते हुए प्राणिमात्र यानी हर प्राणी फिर चाहे वह चींटी ही क्यों न हो या न दिखने वाले सूक्ष्म जीव ही क्यों न हों उन सभी जीवों के प्रति दया करुणा का भाव रखने की प्रेरणा देता है और संसार से पार लगाने जन्म मरण के बंधन से मुक्ति दिलाने आत्म तत्व को मोक्ष की ओर ले जाने की प्रेरणा देता है हिंसा झूठ चोरी कुशल परिग्रह आदि पांच पाप से भी मनुष्य को दूर रहने की प्रेरणा दशलक्षण महापर्व से मिलती है इन दश धर्मों को संसार में रहकर जो अपनाते हैं उनका जीवन सदा सुख शांति से गुजरता है और वह आत्म कल्याण के पथ पर आगे बढ़ते हैं

हरि सब्जियों का त्याग व्रत उपवास
दस दिनों तक दशलक्षण पर्व में समाज के लोगों ने एकाशन व्रत ओर निर्जला उपवास किए साथ ही समाज के लोगों ने हरि सब्जियों का त्याग किया प्रतिवर्ष दशलक्षण पर्व में समाज के लोग न तो हरि सब्जियों खाते न जमीकंद खाते एकशन व्रत में चौबीस घंटे में मंदिर जी से पूजन के बाद घर आकर एक ही आसन में बैठकर शुद्ध भोजन करते हैं उसके बाद चौबीस घंटे पानी तक नहीं पीते साथ ही उपवास में चौबीस घंटे पानी तक नहीं पीते सिर्फ भगवान की भक्ति करते हैं समाज के कई लोगों ने दस दिन तक निर्जला उपवास भी किए तो कई ने एकशन व्रत कर दशलक्षण महापर्व को भक्ति भाव से मनाया
*धनवान हो या गरीब सब समान*
जैन धर्म में समाज में सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां कोई धनवान या गरीब नहीं बल्कि सभी समान रहते हैं मंदिर जी में चाहे कोई करोड़ पति अरब पति हो या फिर गरीब सभी को समान रूप से शुद्ध वस्त्रों धोती दुपट्टा पहनने के बाद शुद्धि का ध्यान रखते हुए भगवान की जिन प्रतिमा का अभिषेक करने का शौभाग्य मिलता है और सभी एक साथ भक्ति भाव से पूजन करते हैं भगवान के दरबार में सभी समान रहते हैं हालांकि संसारी जीवन में समाज के धनवान लोग शिक्षा से लेकर व्यवसाय आदि में समाज के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की समय समय पर हर संभव मदद करते हैं

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