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पितृ सत्ता का ध्वस्तीकरण नही लिंग निरपेक्ष सक्षमता की आवश्यकता: रक्षा चौबे

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चाइल्ड कंजर्वेशन फाउंडेशन की 99 वी ई संगोष्ठी संपन्न

शिवपुरी से रंजीत गुप्ता

जड़ विहीन हो जाना पेड़ के लिए हितकर नही है ठीक वैसे ही पितृसत्ता को ध्वस्त करने की चमकीली अवधारणा पर समाज को अबलंबित करने की चाह उचित नही है।स्त्री का मुक्त होना अपेक्षित नही है बल्कि समाज में लिंग निरपेक्ष सक्षमता को सुस्थापित किया जाना आवश्यक है।यह बात सहायक जीएसटी आयुक्त श्रीमती रक्षा चौबे ने आज चाइल्ड कंजर्वेशन फाउंडेशन एवं सेवा भारती की 99 वी ई संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कही।कामकाजी महिलाओं की कार्य स्थल पर चुनौती,पेशे में संतुलन औऱ बाल विकास विषय पर केंद्रित इस संगोष्ठी को इंदौर से प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता श्रीमती माला सिंह ठाकुर ने भी संबोधित किया।संगोष्ठी में 16 राज्यों के सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं फाउंडेशन के सदस्यों ने भाग लिया।
कवि और संवेदनशील लेखक श्रीमती रक्षा चौबे ने साफ़गोई से कहा कि समाज में नारी मुक्ति की मौजूदा अवधारणा उचित नही है और भारतीय लोकजीवन सदैव से परम्परागत समन्वय का हामी रहा है।पितृ सत्ता के नाम पर पुरुषों को ध्वस्त करने की कतिपय मांग को नारी मुक्ति के साथ जोड़ा जाना किसी भी नजरिये से उचित नही है क्योंकि सत्ता या प्राधिकार से संयुक्त अहंकार,उत्पीड़न या शोषण जेंडरपरक नही है बल्कि यह एक मनोविज्ञान है जो महिलाओं में भी संभव है।उन्होंने कहा कि बेहतर यही है कि महिलाएँ सशक्तिकरण के नाम पर चमकीले नारों में ऊर्जा का अपव्यय करने के स्थान पर आत्मानुशासन औऱ आत्मविश्वास के भाव को मजबूती से धारण करें।
उन्होंने अपने उदबोधन में कार्यस्थल पर महिलाओं की व्यवहारिक परेशानियों औऱ समाजगत बुराइयों को बहुत ही प्रामाणिकता के साथ अधोरेखित किया।
ख्यात सामाजिक कार्यकर्ता श्रीमती माला सिंह ठाकुर ने अपने उदबोधन में बताया कि एक वैशविक सर्वे में यह सामने आया है कि भारतीय महिलाएं पुरुषों की तुलना में सात घण्टे अधिक कार्य करती हैं।उन्होंने कहा कि महिलाओं को अपने मन मस्तिष्क से तुलनात्मक दृष्टिभाव को तिरोहित करने की आवश्यकता है,क्योंकि एक दूसरे से तुलना का यह भाव आत्म उन्नति के राह में बाधक है।उन्होंने कहा कि सुपर वूमेन जैसा कोई कंस्प्ट नही होता है और हमें अपने कौशल और समर्पण से अपने कार्य मे सौ फीसदी प्रतिबद्धता से कार्य का प्रयास करना चाहिये।श्रीमती ठाकुर ने कहा कि सिंगिल फैमिली की अवधारणा भी दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि मातृत्व ही नारी की असल शक्ति को समुन्नत करता है।उन्होंने बताया कि एक बच्चा जब परिवार में अपने परिजनों के साथ परवरिश हासिल करता है तो उसे सीखने के लिए बाहर नही जाना पड़ता है।
फाउंडेशन के सचिव डॉ कृपाशंकर चौबे ने अतिथि वक्ताओं एवं प्रतिभागियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि देश का समुन्नत बचपन तभी संभव है जब महिलाओं के लिए हर स्तर पर सुगम्य औऱ सुरक्षित वातावरण उपलब्ध हो सके।संगोष्ठी का संचालन डॉ अजय खेमरिया ने किया।

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