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गरमागरम समोसे का स्वाद बढ़ाती चटपटी तरी और सेंव

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इंदौर। यदि आप उज्जैन जा रहे हैं, तो सांवेर होकर ही गुजरेंगे। ऐसे में सांवेर के लिए थोड़ा अतिरिक्त समय लेकर निकलें और वहां के खानपान का आनंद लेकर लौटें। माना कि इंदौर की तरह तो सांवेर के पास व्यंजनों की लंबी सूची तो नहीं है, मगर जिन कुछ चीजों का जो जायका यहां है, वह लाजवाब है। अब बात समोसे की कर लें। इंदौर में समोसे पर धनिये की हरी चटनी या इमली की लाल चटनी ही डालकर परोसा जाता है, मगर सांवेर तो इस मामले में एक कदम आगे निकला।

यहां तो तरी वाले समोसे खाए और खिलाए जाते हैं। जिस तरह अपने इंदौर में पोहे पर उसल की तरी डालकर खाने का प्रचलन है, उसी तरह सांवेर में समोसे पर तरी, प्याज, सेंव और जीरावन डालकर खाया जाता है। यह तरी दिखती बेशक उसल की तरह है, लेकिन इसका स्वाद भी अलग होता है और बनाने की विधि भी। इसमें मूंग या मोठ का उपयोग नहीं होता।

सांवेर में तरी वाले समोसे बाजार चौक स्थित नाना भाई की दुकान पर मिलते हैं। करीब 40 वर्ष पुरानी इस दुकान पर सुबह से ही स्वाद के शौकीनों की भीड़ लग जाती है। भीड़ लगे भी क्यों नहीं, आखिर स्वाद में इस बात का ध्यान रखा जाता है कि जो कम तीखा खाता हो, उसे भी मनमाफिक स्वाद मिले और जिसे मिर्च भाती हो, वह भी निराश न हो। यूं तो यह दुकान मनोहरलाल जैतवाल ने शुरू की थी, लेकिन फिलहाल उनके बेटे नितिन इसे संभाल रहे हैं।

यहां समोसे तो सामान्य पद्धति से ही बनाए जाते हैं, लेकिन उसकी तरी बहुत खास होती है। बेसन, आमचूर और पानी से बनने वाली इसकी तरी को जब बघारा जाता है, तो उसमें खड़े गरम मसालों का उपयोग किया जाता है। लाल मिर्च की अपेक्षा खड़े गरम मसालों को इसलिए ज्यादा महत्व दिया जाता है, ताकि स्वाद में तीखापन तो हो ही, मगर मिर्च से होने वाले नुकसान न हों।
लाल मिर्च इसकी रंगत बढ़ाने का काम करती है। गरमागरम समोसे को परोसते वक्त उसे चूर दिया जाता है। इस पर पहले थोड़ी-सी सेंव डाली जाती है, फिर तरी डाली जाती है। तरी डालने के बाद दोबारा सेंव, प्याज और जीरावन डाला जाता है। यदि कोई और अधिक झन्नाट यानी तीखे की मांग करता है, तो तरी के साथ जीरावन की मात्रा बढ़ा दी जाती है।
इसे खाने का मजा भी गरम-गरम में ही है क्योंकि ज्यादा ठंडा होने के इंतजार में समोसे की परत नरम पड़ जाती है और मजा किरकिरा हो जाता है। यदि समोसा तीखा लगे तो यहां पतली और कुरमुरी जलेबी भी तैयार रहती है।
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