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विश्व पुस्तक मेले में-सदी का संपादक : राजेंद्र माथुर- राजेश बादल

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आलेख

राजेश बादल

नेशनल बुक ट्रस्ट की ओर से प्रकाशित मेरी यह किताब राजेंद्र माथुर पर केंद्रित है। पत्रकारिता पर लिखे गए उनके आलेख एकबारगी झनझना देते हैं। हॉल नंबर -पाँच में आप ख़ास छूट के साथ इस पुस्तक को प्राप्त कर सकते हैं। इस पुस्तक का एक अंश यहाँ प्रस्तुत है। इससे पता चलता है कि अपने सरोकारों को लेकर वे कितने संवेदनशील थे। पढ़िए यह अंश :-
एक संपादक के रूप में राजेंद्र माथुर का योगदान बेजोड़ है।अपनी पारी की शुरुआत से ही उन्होंने पाठकों के लिए जटिल विषयों पर सरल भाषा में विश्लेषण प्रस्तुत किए।उनका लेख पढ़ने के बाद जानकारी के किसी अन्य स्रोत की आवश्यकता नहीं रह जाती थी।मिसाल के तौर पर आज़ादी के आंदोलन, अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रम और समकालीन भारत के सरोकारों पर उनका लेखन आज भी बुनियादी समझ विकसित करने के लिए मार्गदर्शन करता है।उन्नीस सौ पैंसठ में उन्होंने कश्मीर समस्या पर एक ऐसा शोध परक आलेख लिखा ,जो आज भी एक मानक आलेख माना जा सकता है। यह आलेख अपने आप में एक किताब के आकार में है।इस आलेख की कुछ पंक्तियाँ यहाँ प्रस्तुत करना चाहूंगा। उन्होंने 1965 में लिखा,
“पाकिस्तान के नेताओं को 18 वर्षों तक यह भ्रम रहा है कि युद्ध के ज़रिए ,घुसपैठ के ज़रिए अथवा अंतर्राष्ट्रीय दबाव से वे कश्मीर छीन सकते हैं।आज़ादी के समय उन्होंने समझा कि पश्चिम एशिया के इस्लामी देश या राष्ट्रमंडल के गोरे मुल्क़ उन्हें कश्मीर दिला देंगे। फिर 1954 के बाद आठ साल तक उन्होंने अमेरिका पर भरोसा किया।चीन और इंडोनेशिया से उन्होंने 1963 में हाथ मिलाए और अब वे रूस को लालच दे रहे हैं कि अगर उन्हें कश्मीर मिल जाए तो वे चीन का गुट छोड़कर रूस के ख़ेमें में शामिल हो जाएँगे। याने ऐसा कोई गठबंधन नहीं बचा है ,जिसका साथ पाकिस्तान ने लेने की कोशिश न की हो। लेकिन कश्मीर अब भी दूर है। तो अब पाकिस्तान के नेता उस देश से दोस्ती क्यों नहीं करते ,जिसकी दुश्मनी के कारण उन्हें दर दर भटकना पड़ रहा है। क्या अपने हर प्रयत्न की नाक़ामी उन्हें ताशकंद में सबक़ सिखाएगी ? शायद अभी नहीं “।


पाकिस्तान के बारे में उनकी एक टिप्पणी इस बात का प्रमाण है कि वे किस हद तक भारत को प्यार करते थे। इस टिप्पणी में उन्होंने लिखा था ,
” भारत नहीं चाहता कि नफ़रत पाकिस्तान की प्राणवायु हो। हम चाहते हैं कि पाकिस्तान अपनी जड़ें अपनी ज़मीन में खोजें। इस खोज के बाद वह अखंड रहे तो अच्छा है। लेकिन यदि वह न भी रह पाए तो उसका बिखरना भी बुरा नहीं है। दूसरे देशों की अखंडता हमें प्रिय है लेकिन उससे पहले हमें अपनी अखंडता प्यारी है और ऐसे देश को हम कैसे सहन कर सकते हैं ,जो क़ायम ही सिर्फ इसलिए है कि वह हमें खंडित कर सके। पाकिस्तान सिर्फ़ भारत की ख़ातिर क़ायम है। ऐसे देश का निश्चित ही हम विनाश चाहेंगे ताकि अपनी ख़ातिर क़ायम रहने वाला पाकिस्तान अस्तित्व में आ सके “।
इसके बाद उनके सरोकारों पर लिखने के लिए और क्या रह जाता है ?
आपातकाल समाप्त होने के बाद आम चुनाव से पहले उन्होंने नई दुनिया के पन्नों में सात दिन तक एक धारावाहिक श्रृंखला लिखी।इस श्रृंखला में वर्णित मुद्दों ने आम नागरिकों को झिंझोड़ दिया।हिंदी पत्रकारिता के नज़रिए से यह श्रृंखला एक दस्तावेज़ से कम नहीं है।राजेंद्र माथुर संपादकीय की गुणवत्ता और पाठकों के पत्रों से मिलने वाले फीडबैक के बारे में भी बेहद संवेदनशील थे। आज तो संपादक के नाम पत्र स्तंभ एक तरह से ग़ायब ही हो गया। लेकिन राजेंद्र माथुर उस फीड बैक के आधार पर अख़बार में विषयों को भी उठाते थे।यही कारण था कि आज से पचास साल पहले समाचारपत्र की प्रसार संख्या एक लाख के पार जा पहुँची थी। वे समाचार पत्र की आधुनिक मुद्रण तकनीक के बारे में भी सजग थे।उनकी पहल के कारण ही लगातार अनेक साल तक उनके समाचारपत्र को श्रेष्ठ छपाई का पुरस्कार मिलता रहा।
भारतीय हिंदी पत्रकारिता में उनका एक योगदान अदभुत है। जब वे नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक थे ,तो अख़बार के लखनऊ ,पटना और जयपुर से प्रादेशिक संस्करण निकले। इन संस्करणों ने स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता से उठाया और निर्भीक पत्रकारिता के कीर्तिमान स्थापित किए। उनकी पत्रकारिता राष्ट्रप्रेम ,भारत की अखंडता, एकता और सामाजिक सरोकारों पर केंद्रित थी।उन्होंने अपने मूल्यों से कभी समझौता नहीं किया।वे कभी दबाव में नहीं आए।आज की पत्रकारिता से सरोकार ग़ायब हैं और बाज़ार के दबाव में वह समर्पण कर चुकी है।आज लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में पत्रकारों का बड़ा वर्ग काम नहीं करता।वे विश्वविद्यालयों के नीरस, ग़ैर पेशेवर और अप्रासंगिक पाठ्यक्रमों से तथाकथित पत्रकारों के उत्पाद तैयार कर रहे हैं।यह पीढ़ी सिर्फ़ नौकरी चाहती है।अपवाद छोड़ दें तो उसे हिन्दुस्तान के सरोकारों और सामाजिक हितों से ज़्यादा मतलब नहीं रहा है।जैसे जैसे पत्रकारिता के मंच पर नए नए माध्यमों के अवतार प्रकट हो रहे हैं ,पत्रकारिता की गाड़ी पटरी से उतरती जा रही है।इस पर चिंता की जानी चाहिए।राजेंद्र माथुर की पत्रकारिता इस मायने में अँधेरे बंद कमरे में एक रौशनदान की तरह है।हालाँकि आज के समय में वैसे संपादक भी नहीं रहे ,जो आने वाली पीढ़ियों को प्रशिक्षित कर सकें।राजेंद्र माथुर अपने सहयोगियों के बौद्धिक विकास की हरदम चिंता करते रहे।वे शुद्ध हिंदी लिखें ,इसकी कोशिश माथुरजी हमेशा करते रहे।जब मैं उनके साथ काम करता था तो मुझे याद है कि वे अख़बार की अपनी एक नीति पुस्तक तैयार करना चाहते थे। कोई शब्द कैसे लिखा जाएगा और कौन सा शब्द क्यों नहीं लिखा जाएगा – इस पर वे एकरूपता चाहते थे ।उन्होंने हिंदी के शुद्ध प्रयोग के लिए समाचार पत्र में कक्षाएं शुरू करा दी ।उनमें वे ख़ुद, प्रबंध संपादक और सभी संपादकों के साथ प्रूफ रीडिंग डेस्क के सहयोगी शामिल होते थे ।ये कक्षाएं करीब डेढ़ महीने चली थीं।अख़बार की भाषा पर इसका बड़ा असर पड़ा ।हिंदी के विद्वान जानकार इन कक्षाओं में आकर हमें हिंदी पढ़ाते थे।

लेखक देश के ख्यात वरिष्ठ पत्रकार हें।

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