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ग्रेट वॉल ऑफ रायसेन पर पहुंचा सांची विश्वविद्यालय

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-कुलपति के नेतृत्व में 100 छात्रों, शिक्षकों, कर्मचारियों का शैक्षणिक भ्रमण

-80 किलोमीटर लंबी है ग्रेट वॉल ऑफ रायसेन

– दीवार के संरक्षण की मांग छात्र दलों ने की

-परमार कालीन बताई जाती है दीवार

कल्चुरी कालीन हमलावरों से सुरक्षा रखती थी दीवार

रायसेन।  सांची बौद्ध भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय के छात्रों, शिक्षकों और अधिकारियों कर्मचारियों का दल ग्रेट वॉल ऑफ रायसेन देखने पहुंचा। कुलपति प्रो डॉ वैद्यनाथ लाभ के नेतृत्व में शिक्षण भ्रमण के उद्देश से इस दल के साथ पुरातत्व विभाग के पूर्व पधाधिकारी भी थे। रायसेन जिले में बरेली के गोरखपुर क्षेत्र से 3 किलोमीटर अंदर तक जाकर इस दल ने दीवार को देखा। पुरातत्व विभाग के पूर्व पदाधिकारियों और इतिहासकारों के अनुसार यह दीवार अब जीर्ण शीर्ण अवस्था में है और दीवार के मौजूदा खंडहर लगभग 80 किलोमीटर तक मिल रहे हैं।

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बैद्यनाथ लाभ ने इस भ्रमण दल को कहा की हर एक विद्यार्थी को देश के इतिहास का अध्ययन करना चाहिए। उन्होंने कहा की सांची विश्वविद्यालय भी इस दीवार के संरक्षण के लिए प्रयास करेगा और अपने शोधार्थी छात्रों को इसका गहन अध्ययन के कार्य में लगाएगा। उन्होंने देवरी गोरखपुर के गांव के लोगों को इस शिक्षण दल का सहयोग करने के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया।

किसी किसी स्थान पर इस दीवार की ऊंचाई 15 फीट और ऊपरी चौड़ाई 12 से 15 फीट तक मिल रही है। खास बात यह है की यह दीवार पूरी पत्थरों से बनी है। 1977 में यह दीवार जंगलों के अंदर सबसे पहले पुरातत्व विभाग के अधिकारी श्री नारायण व्यास ने आकर देखी थी। बाद में 2014 में इतिहास संकलन समिति के माध्यम से इसके संरक्षण के पुनः प्रयास किए गए।

अवशेषों के अध्ययन के बाद इतिहासकार कहते हैं की यह दीवार परमार कालीन है और यह कल्चुरी साम्राज्य को अलग करती है जिसका साम्राज्य जबलपुर और नरसिंहपुर में था जिसकी राजधानी तेवर, जबलपुर में मानी जाती है। सांची विश्वविद्यालय के इस दल ने दीवार से लगे हुए मंदिर और परमार कालीन रॉयल कोर्ट, शिव मंदिर, भैरव मंदिर इत्यादि के अवशेष भी देखे।

ये ग्रेट वॉल ऑफ रायसेन भारत की सबसे बड़ी दीवार मानी जा सकती है क्योंकि अब तक पूर्ण अवस्था में मिली कुंभलगढ़ की दीवार लगभग 40 किलोमीटर लंबी है। जबकि यह ग्रेट वॉल ऑफ रायसेन बाड़ी मोंगा डैम से शुरू होकर कई किलोमीटर तक जाती है। इतिहास संकलन समिति के श्री सत्य नारायण शर्मा और श्री राजीव चौबे का कहना है की अगर मध्य प्रदेश या भारत सरकार इसके संरक्षण के लिए सहयोग करे तो इतिहास के गर्भ में दफन कुछ और नए रोचक तथ्य सामने आ सकेंगे।

सांची विश्वविद्यालय का यह शिक्षण भ्रमण दल पास में ही बम्होरी पर नर्मदा नदी के तट पर भी पहुंचा। विश्व विद्यालय से तकरीबन 100 लोगों का दल इस शिक्षण भ्रमण कार्यक्रम में सम्मिलित था।

 

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