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मध्य प्रदेश के वन अधिकारियों को सता रही चीतों की चिंता यह है कारण

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 भोपाल। केंद्र और राज्य के जिम्मेदार वन अधिकारियों में समन्वय का अभाव चीता परियोजना के लिए घातक साबित हो सकती है। परियोजना राष्ट्रीय है, इसलिए वन मंत्रालय और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) की सहमति के बगैर कुछ नहीं किया जा सकता है और राज्य के अधिकारियों की चिंता है कि केंद्र के अधिकारी उनके निर्णयों को तबज्जो नहीं दे रहे हैं। विशेषज्ञ भी कह रहे हैं कि चीतों को लेकर राज्य के वन अधिकारियों से तालमेल कर केंद्र के अधिकारियों को जल्द निर्णय लेना चाहिए

मप्र के मुख्य वन्यप्राणी अभिरक्षक जेएस चौहान एनटीसीए के सदस्य सचिव डा़ एसपी यादव को पत्र लिखकर और वन विभाग के अपर मुख्य सचिव जेएन कंसोटिया को नोटशीट भेजकर बता चुके हैं कि कुछ चीतों को कूनो से दूर अन्य स्थान पर तत्काल शिफ्ट करना पड़ेगा।

बीमारी फैलने की आशंका भी

उन्हें आशंका है कि कोई बीमारी फैल गई तो प्रजाति बड़े संकट में पड़ सकती है। सबसे तेज दौड़ने वाले वन्यप्राणी को ज्यादा समय तक बड़े बाड़ों में कैद रखना उसके स्वास्थ्य के लिए भी ठीक नहीं है। पर, उनकी कोई सुनने वाला नहीं है। संभवत: दो चीतों की मौत का कारण भी यही है।

मप्र के मुख्‍य सचिव भी असहाय

यह चिंता प्रदेश के मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैंस तक पहुंची, तो वे भी असहाय थे। उन्होंने सिर्फ इतना ही कहा कि हम सूचित कर चुके हैं, अब राज्य के अन्य स्थानों (गांधी सागर और नौरादेही अभयारण्यों) को जल्द तैयार करो और चीता संरक्षण में अपनी तरफ से कोई कसर मत छोड़ो।

यह है चिंता का असल कारण

किसी भी वन्यप्राणी को शिफ्ट करने के नियम होते हैं। उन्हें भेजने और पहुंचने के स्थान पर एक-एक माह क्वारंटाइन रखा जाता है। सितंबर में कूनो लाए गए चीतों को नामीबिया में अगस्त में ही क्वारंटाइन कर दिया गया था। दक्षिण अफ्रीका से 12 चीते अक्टूबर 2022 में लाना प्रस्तावित था, इसके लिए वहां सितंबर 2022 में सभी 12 चीतों को क्वारंटाइन कर दिया गया।

नौ माह से बाड़े में हैं चीते

चीता देने की नोटशीट राष्ट्रपति कार्यालय में अटक गई। छह माह चीते कूनो पहुंचे तो यहां भी क्वारंटाइन कर दिए गए। एक माह बाद इन्हें छोटे बाड़ों से आजाद किया तो 46 से 158 हेक्टेयर के बाड़ों में कैद हो गए। ये चीते नौ माह से बाड़ों में हैं। यदि सभी 17 चीतों को जंगल में छोड़ दिया जाता है तो उन्हें संभालना मुश्किल है, क्योंकि एक चीते के साथ तीन शिफ्ट में नौ कर्मचारियों की टीम लगानी पड़ रही है और कूनो पार्क में स्वीकृत पदों से 50 कर्मचारी कम हैं। वर्तमान में दक्षिण अफ्रिका का कोई भी चीता खुले जंगल में नहीं छोड़ा गया है।

चीतों को दौड़ाना ही पड़ेगा : विशेषज्ञ

1961 बैच के आइएएस, चीतों को भारत में बसाने का 1970 से प्रयास कर अनुबंध तक ले जाने वाले और उच्चतम न्यायालय द्वारा चीता परियोजना की देखरेख के लिए बनाई समिति के अध्यक्ष डा़ एमके रंजीत सिंह कहते हैं कि मप्र में जो हो रहा है, वह अंडों से भरी बास्केट में ठोकर मारने जैसा है। रेसहोर्स को बंद कर नहीं रखा जा सकता, उसे दौड़ाना ही पड़ेगा। हम नुमाइश के लिए चीते थोड़े लाए हैं। हमने राजस्थान के मुकुंदरा नेशनल पार्क में भेजने की भी सलाह दी, पर पता नहीं कोई क्यों नहीं मान रहा, जबकि वहां की सरकार तैयार है। चीता विशेषज्ञ दिव्यभानु सिंह छाबड़ा भी कहते हैं कि यह तो कामन सेंस है, सबसे तेज दौड़ने वाले प्राणी को दौड़ाना ही पड़ेगा। हालांकि, एनटीसीए के सदस्य सचिव डाक्‍टर एसपी यादव इस बारे में बात नहीं करना चाहते हैं। वे इतना कहते हैं कि कोई निर्णय लेंगे तो मीडिया को बता देंगे।

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