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दिव्य चिंतन:: सरकारी स्कूलों में घंटी बज रही है…क्या यह चेतावनी की आख़िरी घंटी है ?-हरीश मिश्र 

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आलेख

हरीश मिश्र

सरकारी स्कूलों के आंगन में इन दिनों उत्सव का मौसम है। कहीं प्रवेशोत्सव है, कहीं नए नाम से पुराने विद्यालय का उद्घाटन, कहीं रंगे हुए भवनों के सामने वृक्षारोपण की तस्वीरें खिंच रही हैं, तो कहीं साइकिल, लैपटॉप और गणवेश वितरण के कार्यक्रम चल रहे हैं। सरकारी दावों में अमावस्या में पूर्णिमा का उजाला दिखाई दे रहा है।

लेकिन आंकड़ों की दुनिया तस्वीर का दूसरा पहलू दिखाती है।

नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2005 में देश के लगभग 71 प्रतिशत बच्चे सरकारी विद्यालयों में पढ़ते थे। आज यह संख्या घटकर लगभग 49.24 प्रतिशत रह गई है। यानी पहली बार सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों की हिस्सेदारी आधे से भी कम हो गई। यह केवल एक सांख्यिकीय परिवर्तन नहीं, बल्कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था में घटते जनविश्वास का संकेत है।

प्रश्न यह नहीं कि निजी विद्यालय बढ़े क्यों ? प्रश्न यह है कि सरकारी विद्यालयों से विश्वास घटा क्यों ?

एक लाख से अधिक सरकारी विद्यालय आज भी ऐसे हैं, जहां पूरा स्कूल केवल एक शिक्षक के कंधों पर टिका है। वही पढ़ाता है, वही कार्यालय संभालता है, वही प्रशासनिक काम करता है, और कई बार विद्यालय की चौकीदारी भी उसी के हिस्से आती है। शिक्षा की गुणवत्ता का मूल्यांकन करने से पहले व्यवस्था की यह वास्तविकता देखना आवश्यक है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि सरकारी व्यवस्था पर सबसे कम भरोसा उसी वर्ग का दिखाई देता है, जो स्वयं उसका हिस्सा है। जब सरकारी अधिकारी, कर्मचारी और शिक्षक अपने बच्चों के लिए निजी विद्यालय चुनते हैं, तो समाज भी वही संदेश पढ़ता है। इसके बाद गरीब परिवार भी कर्ज लेकर निजी स्कूल की फीस भरने को मजबूर हो जाता है, क्योंकि उसे लगता है कि सरकारी विद्यालय में उसके बच्चों का भविष्य सुरक्षित नहीं है।

शिक्षा केवल भवन, रंग-रोगन और योजनाओं से नहीं चलती; वह शिक्षक, गुणवत्ता और विश्वास से चलती है। यदि इन तीनों में से किसी एक की भी कमी हो जाए, तो विद्यालय केवल भवन रह जाता है, शिक्षा का मंदिर नहीं।

सरकारें अक्सर नई इमारतों का उद्घाटन करती हैं, लेकिन शिक्षा की असली नींव उद्घाटन पट्टिकाओं से नहीं, कक्षा में खड़े शिक्षक से मजबूत होती है।

स्कूलों की घंटी आज भी समय पर बजती है। बच्चे भी आते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या वह घंटी पढ़ाई शुरू होने की सूचना दे रही है, या सरकारी शिक्षा व्यवस्था के लिए बजती हुई चेतावनी की आखिरी आवाज़ है?

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हे।

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