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सतखिरिया प्राथमिक स्कूल के हालात: भवन के आस पास होने लगा कब्जा,खराब हो चुके हैंडपंप,पर जिम्मेदार बेखबर

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 निराकरण के लिए आवेदन दिया है :जन शिक्षक

रिपोर्ट धीरज जॉनसन,दमोह

दमोह जिले के सरकारी स्कूल और उनमें शिक्षा अर्जित कर रहे छात्रों के उज्जवल शैक्षणिक भविष्य के लिए लगातार उन्नयन और विकास के नाम पर प्रतिवर्ष योजनाएं और राशि व्यय की जाती रही है साथ ही स्कूल में पर्याप्त मात्रा में शिक्षक भी उपलब्ध करवाएं जाते है जिससे स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों लाभान्वित हो सके।
परंतु शहर के समीप रेल्वे ओवर ब्रिज, सागर- दमोह – बटियागढ़ बाईपास सड़क के निकट बने सरकारी प्राथमिक स्कूल के हालात देखकर लगता है कि या तो जिम्मेदार, बेखबर है या जानबूझकर आंख मूंदे हुए है और उन्हें छात्रों के भविष्य की तनिक भी चिंता नहीं है पर स्वयं की नोकरी को सलामत रखे है।


लगभग 40 छात्रों की दर्ज संख्या वाले सतखिरिया प्राथमिक स्कूल (बगीचा मोहल्ला) जिसकी दीवार पर स्थापना वर्ष 1997 लिखा हुआ है वहां जानकारी के अनुसार दो शिक्षक पदस्थ है पर धरातलीय स्थिति देखकर लगता है कि यहां पढ़ाई के नाम पर औपचारिकता निभाई जाती होगी, क्योंकि परिसर को देखकर अध्ययन अध्यापन का माहौल परिलक्षित नहीं होता है।

स्कूल के परिसर में अस्थाई कब्जा, भवन के दोनो तरफ झोपड़ी नुमा स्थान,मवेशी के लिए विश्राम के स्थान, दो टूटे हुए हैंडपंप, बाउंड्रीवाल और खेल मैदान दिखाई न देना शिक्षा के गिरते स्तर को प्रकट कर रहा था। ऐसा तो हो नहीं सकता कि जिम्मेदारों को जानकारी न हो, पर लगता है कि जब तक मामला प्रकाश में नहीं आता, तब तक सब मौन धारण किए हों और बाद में कार्यवाही करने का हवाला देते प्रतीत होते है।स्कूल की बदहाली पर जब जन शिक्षको से जानकारी प्राप्त की, तो उनका भी कुछ इसी तरह कहना था कि आवेदन दिया है कार्यवाही की जाएगी।
जन शिक्षक डी पी शुक्ला का कहना था कि ग्रामीण कब्जा किए हुए है आवेदन दिया है हैंडपंप टूटे हुए है,पानी नहीं निकल रहा है। तो वहीं दूसरे जन शिक्षक शरद गुप्ता का कहना था कि कुछ दिन पहले ही नियुक्ति हुई है मामला अभी तक संज्ञान में नहीं था,जो भी आवश्यक कार्यवाही होगी वह वरिष्ठ अधिकारियों को प्रेषित कर निराकरण करेंगे।


आश्चर्य का विषय है कि जहां स्कूल के हैंडपंप टूटे हुए है परिसर में कब्जा है तो छात्र, पढ़ाई और अन्य गतिविधियों में कैसे हिस्सा लेते होंगे और शिक्षक कार्यालयीन समय कैसे व्यतीत करते होंगे, इसे देखकर ऐसा भी प्रतीत होता है कि जब शहर के निकट के स्कूल में ऐसे हालात है तो सुदूर ग्रामीण अंचलों में शिक्षा का स्तर कहां तक पहुंचा होगा जिसका मूल्यांकन भी अवश्यंभावी प्रतीत होता है।

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