पठान विवाद पर त्वारित टिप्पणी
विजय सिंह राठौर,रायसेन
इन दिनों बॉलीवुड में मानो नग्नता परोसने की होड़ मची हुई हैं। इसके मूल कारण क्या वास्तव में अपने बुरे दौर से गुजर रहा बॉलीवुड है या फिर समाज को नग्नता की ओर धकेलने वाली समाज विरोधी सोच है। आज समय इसी पर विचार करने का हैं। दअरसल इन दिनो दीपिका ओर शाहरुख खान की आने वाली फिल्म पठान के एक गाने में परोसी गई नग्नता के साथ साथ भगवा रंग को

बेशर्म रंग गाने से जोड़ कर फ़िल्म के बायकॉट का ट्रेंड जोर पकड़ रहा हैं। सरकार के मंत्री इसमे घी डालने का काम कर रहे हैं। यह सब जानते हुये भी की आपकी सरकार में ही सेंसर बोर्ड ऐसे भावनाओ को ठेस पहुचाने वाले गाने या दृश्य को कैसे रिलीज करने की अनुमति दे देता हैं। खैर विवाद को अपनी जगह छोड़ दे तो सबसे बड़ा मुद्दा अब भी ऐसे विवादों में दब कर रह जाता है। क्योंकि इन दिनों बॉलीवुड से ज्यादा कमाई साउथ की मूवी कर रही है हिंदी डब होने के बाद साउथ की फिल्में बिना नग्नता और भावनाओं को भड़काये अच्छी खासी कमाई कर रही है। जबकि इनके फार्मूले से अलग हटकर बॉलीवुड अब भी नग्नता ओर ऐसे विवादित कंटेंट के भरोसे फिल्मों को उतार रहा हैं। बॉलीवुड के तीन सुपर हीरो को एक गुटखा बेंचने के लिए मजबूर कर देने वाले साऊथ फिल्मों से टक्कर लेने के लिए बॉलीवुड अभिनेता और अभिनेत्री कुछ भी करने को तैयार हैं।

अभी कुछ दिन पहले अभिनेता रणवीर सिंह नंगे होकर फ़ोटो शूट करा रहे थे। तो उनकी पत्नी दीपिका भला उनसे कैसे पीछे रहती सो उन्होंने भी पठान के गाने में कोई कसर नही छोड़ी। खैर यह भी भारतीय संविधान के तहत उनका निजी मामला हो सकता हैं। लेकिन किसी की भावनाओं को आहत न हो इसका तो ख्याल रखना ही चाहिए था न। वेसे फ़िल्म देखना किसी का निजी मामला हैं लेकिन यह भी सच है कि फिल्में समाज को दिशा भी देती हैं। इसलिए इन विवादों से अलग हटकर यह सरकार की जिम्मेदारी बनती हैं कि किसी की भावनाओं को आहत न किया जाए इसका ध्यान तो रखना ही चाहिए न। ओर सेंसर बोर्ड यदि ऐसे गानों को रिलीज कर भी रहा हैं तो इसे ‘A’ सर्टिफिकेट देकर रिलीज करना चाहिए था। ताकि समाज में एक निश्चित उम्र सीमा तक ही ऐसे वीडियो गाने फिल्में पहुँच सके। ओर यदि इस बीमारी का समय पर सरकार इलाज नही कर पाती हैं तो यह वायरस समाज मे भी जल्द कोरोना जैसे फेल सकता हैं। इसलिए हमारे देश के जिम्मेदार नेताओ को चाहिए कि ऐसे विवाद खड़े कर अपने अपने दल को लाभ पहुचाने से ज्यादा इस पर काम कर ले कि यह कितनी गंभीर बीमारी भारत मे फैल रही है। जिसका समय पर यदि इलाज नही किया गया तो समाज मे अन्य किस्म के नए नए अपराध और भी देखने को मिल सकते हैं। और भारत की संस्कृति केवल किताबो तक सिमट कर रह जाएगी। ओर जब वायरस समाज मे फैल जाएगा तो फिर इसका इलाज ढूढते नजर मत आना..!!

लेखक-विजय सिंह राठौर, मप्र शासन से अधिमान्य पत्रकार हैं।