सागर। सिद्धचक्र महामंडल विधान के सातवें दिन निर्यापक मुनि श्री अभय सागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि मनुष्य का जीवन केवल जीविका चलाने के लिए नहीं, बल्कि आत्मनिर्माण और चरित्र निर्माण के लिए होना चाहिए। उन्होंने कहा कि भिखारी भी भीख मांगकर अपना जीवन निर्वाह कर लेता है, किंतु मनुष्य जीवन का वास्तविक उद्देश्य धर्म, संस्कार और आत्मोन्नति है।
मुनि श्री ने कहा कि केवल घोषणा से कोई पूर्ण अधिकार प्राप्त नहीं होता। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे राष्ट्रपति चुनाव में निर्वाचित घोषित होने के बाद भी शपथ ग्रहण और हस्ताक्षर की विधि पूर्ण होने पर ही व्यक्ति विधिवत राष्ट्रपति कहलाता है, उसी प्रकार आध्यात्मिक जीवन में भी योग्यताओं की पूर्णता आवश्यक होती है। उन्होंने आहार की पवित्रता पर विशेष बल देते हुए कहा कि भोजन केवल शरीर का पोषण नहीं करता, बल्कि मन और संस्कारों को भी प्रभावित करता है। भोजन कराते समय अनावश्यक बातचीत या कटु चर्चा नहीं करनी चाहिए। प्रेमपूर्वक परोसा गया भोजन अमृत के समान होता है, जबकि नकारात्मक वातावरण में ग्रहण किया गया भोजन धीमे विष की तरह प्रभाव डालता है। उन्होंने कहा कि “दाल, भात और रोटी” के साथ यदि जीवन में क्षमा की दाल, प्रेम का भात और धैर्य की रोटी जुड़ जाए, तो जीवन सुखी और सुंदर बन सकता है।
इस अवसर पर मुनि श्री गरिष्ठ सागर महाराज ने कहा कि आज अधिकांश लोग शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक और आर्थिक समस्याओं से जूझ रहे हैं। इन समस्याओं का मूल कारण बाहरी परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि मनुष्य के अपने कर्म, विचार और जीवनशैली हैं। उन्होंने कहा कि समस्या का समाधान उन्हीं से मिल सकता है जिन्होंने स्वयं जीवन की कठिनाइयों पर विजय प्राप्त की हो।
उन्होंने बताया कि जीवन की तीन अवस्थाएँ—बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था—जितनी महत्वपूर्ण हैं, उतनी ही आवश्यक तीन प्रकार की शुद्धियाँ भी हैं—आहार की शुद्धि, विचार की शुद्धि और व्यवहार की शुद्धि। शुद्ध, सात्त्विक एवं पौष्टिक भोजन, सकारात्मक एवं पवित्र विचार तथा सभी के प्रति श्रेष्ठ व्यवहार ही स्वस्थ और सफल जीवन की आधारशिला हैं।
मुनि श्री ने कहा कि वर्तमान समय में बच्चों में फास्ट फूड, जंक फूड और पैकेटबंद खाद्य पदार्थों की आदत स्वयं अभिभावक डाल रहे हैं। पहले बच्चे घर का बना पौष्टिक भोजन खाते थे, जिससे उनका स्वास्थ्य और संस्कार दोनों सुरक्षित रहते थे। सुविधा और आधुनिकता की दौड़ में माता-पिता बच्चों को बाहर का भोजन उपलब्ध करा रहे हैं, जिसका दुष्प्रभाव उनके स्वास्थ्य और व्यक्तित्व पर पड़ रहा है।
दोनों संतों ने अपने संदेश में कहा कि यदि प्रत्येक व्यक्ति शुद्ध आहार, शुद्ध विचार और शुद्ध व्यवहार को जीवन में अपनाए तथा नई पीढ़ी को अच्छे संस्कारों के साथ स्वस्थ भोजन की आदत डाले, तो समाज अनेक समस्याओं से मुक्त होकर सुखी, स्वस्थ और संस्कारित बन सकता है।