गिरीडीह (मधुवन) से सुरेन्द्र जैन
प्रातःकालीन धर्मसभा में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए राष्टसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि व्यक्ति और समाज का वास्तविक विकास तभी संभव है, जब जीवन में नीति, कृतज्ञता, सकारात्मक दृष्टिकोण और उत्तरदायित्व का समन्वय हो। उन्होंने कहा कि आज अनेक समस्याओं का मूल कारण जीवन मूल्यों से दूर होना है।मुनि श्री ने कहा कि नीति का अर्थ कुशलता, विवेक और निपुणता है, मायाचारी नहीं। जब नीति में छल, कपट, प्रपंच और स्वार्थ का समावेश हो जाता है, तब वह अनीति बन जाती है। विवेकपूर्ण व्यवहार व्यक्ति की पहचान है, जबकि दूसरों को हानि पहुँचाने वाली चतुराई अंततः स्वयं के पतन का कारण बनती है।धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाओं के पदाधिकारियों के दायित्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि समाज जिस व्यक्ति को दायित्व सौंपता है, उसके साथ अपना विश्वास भी जोड़ता है। इसलिए धार्मिक एवं सामाजिक निधि का उपयोग पूर्ण पारदर्शिता तथा उसके निर्धारित उद्देश्य के अनुरूप ही होना चाहिए।

मंदिर, पूजा, विधान, शांतिधारा एवं देव-द्रव्य के रूप में प्राप्त धन का उपयोग केवल देव, गुरु और धर्म के कार्यों में किया जाना चाहिए। समाज की निधि व्यक्तिगत सुविधा का साधन नहीं, बल्कि लोककल्याण की अमानत है, जिसके प्रत्येक उपयोग के लिए पदाधिकारी समाज के प्रति उत्तरदायी हैं।मुनि श्री ने कहा कि धार्मिक और सामाजिक कार्य करने वालों को आलोचनाओं से विचलित नहीं होना चाहिए। जैसे चलती हुई गाड़ी के साथ धूल और धुआँ उठना स्वाभाविक है, उसी प्रकार अच्छे कार्यों के साथ आलोचना भी आती है। व्यक्ति का ध्यान अपने लक्ष्य और कार्य की गति पर होना चाहिए, न कि आलोचनाओं पर। उन्होंने कहा कि यदि बन सकें तो अनुमोदक बनें, आलोचक नहीं। अच्छे कार्यों की सराहना करने वाला पुण्य अर्जित करता है, जबकि निरर्थक आलोचना करने वाला स्वयं पाप का भागी बनता है।
मुनि श्री ने वर्तमान समय में घटती कृतज्ञता पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज “यूज़ एंड थ्रो” और “गिव एंड टेक” की मानसिकता ने आत्मीय संबंधों को कमजोर किया है। मनुष्य को प्रकृति, परमात्मा, गुरु, माता-पिता तथा जीवन में सहयोग देने वाले प्रत्येक व्यक्ति के प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए। जब मन में सच्चा आभार जागता है तो शिकायतें समाप्त होती हैं, संबंध मधुर बनते हैं और जीवन में आनंद का संचार होता है।उन्होंने कहा कि व्यक्ति को समाज और परिवार दोनों के प्रति समान संवेदनशीलता रखनी चाहिए। केवल समाज में लोकप्रिय होना पर्याप्त नहीं, परिवार में भी प्रेम, सम्मान और आत्मीयता बनाए रखना आवश्यक है। संतुष्टि, मैत्री, कृतज्ञता और प्रेम—ये चार भाव जीवन को समृद्ध और सफल बनाते हैं। अपने भीतर भक्ति और कृतज्ञता का भाव जागृत कर व्यक्ति अपने चित्त को निर्मल बना सकता है तथा आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है।उपरोक्त जानकारी गुतायतन के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने दी।