सागर। भाग्योदय तीर्थ सागर में चातुर्मास कर रहे निर्यापक मुनि श्री अभय सागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि मनुष्य का जीवन अनेक प्रकार की परिस्थितियों से होकर गुजरता है। कभी सुख मिलता है, कभी दुःख आता है और कभी विपरीत परिस्थितियां उसे भीतर तक झकझोर देती हैं। ऐसी ही एक परिस्थिति में एक व्यक्ति के मन में विचार आया कि मैंने संसार के विषय- भोगों को खूब भोगा, फिर भी मन को वह सुख और शांति क्यों नहीं मिली जिसकी मैं अपेक्षा करता हूं?
सौभाग्य से उसे गुरु महाराज का सानिध्य मिला। उसने प्रश्न किया भगवन मैंने धर्म की आराधना और उपासना तो की है, फिर भी संसार से मेरा मोह और दुःख समाप्त क्यों नहीं हुआ ? गुरु महाराज ने समझाया कि धर्म करने का हमारा वास्तविक उद्देश्य समझना आवश्यक है। अनेक बार हम धर्म इसलिए करते हैं कि आगामी जीवन में सुख-सुविधाएं मिलें,धन-संपत्ति बढ़े, परिवार में सुख हो या सांसारिक इच्छाएं पूरी हों,लेकिन शास्त्रों का संदेश इससे कहीं ऊंचा है।
धर्म का उद्देश्य भोगों की प्राप्ति नहीं, बल्कि कर्मों की निर्जरा और आत्मकल्याण है।
मुनि श्री ने कहा कि यदि धर्म की आराधना केवल भोग प्राप्त करने के लिए की जा रही है, तो हमने धर्म के वास्तविक स्वरूप को अभी समझा ही नहीं है। हमें भावना रखनी चाहिए, हे भगवान मेरा अशुभ उपयोग दूर हो,मेरा जीवन शुभ उपयोग में लगे और अनंतकाल से आत्मा के साथ बंधे कर्मों का क्षय हो।
संसार में मनुष्य अक्सर अपने दुःख से कम और दूसरे के सुख से अधिक दुखी होता है। किसी पड़ोसी ने बड़ा मकान बना लिया तो उसे देखकर अपने छोटे मकान का दुःख होने लगता है। जबकि सच्चा साधक अपने सुख-दुःख से ऊपर उठकर आत्मा के कल्याण की ओर देखता है।
मनुष्य जन्म मिला है तो मृत्यु निश्चित है। पापों में प्रवृत्ति हुई तो अधोगति का मार्ग खुलेगा और संसार का विस्तार बढ़ेगा। इसलिए हमें विचार करना चाहिए कि हमारा अगला कदम संसार को बढ़ाने वाला है या संसार से मुक्त कराने वाला।
सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र, रत्नत्रय की प्राप्ति ही जीवन की वास्तविक उपलब्धि है। मिथ्यात्व के साथ मिलने वाला स्वर्ग भी कल्याणकारी नहीं, जबकि सम्यक्त्व के साथ मिला साधारण जीवन भी आत्मकल्याण की दिशा में ले जाने वाला है। इसलिए धर्म को सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति का साधन न बनाएं। धर्म को आत्मा की शुद्धि और कर्मों की निर्जरा का माध्यम बनाएं। जीवन की सबसे बड़ी भावना यही हो कि समाधिमरण प्राप्त हो, कर्मों का क्षय हो अनंतकालीन संसार से आत्मा का छुटकारा हो। यदि हमारी आराधना इस भावना के साथ होगी, तो एक दिन हम भी जिनेंद्र भगवान के अनंत गुणों और आत्मिक वैभव को प्राप्त कर सकते हैं।मुनि श्री प्रभात सागर महाराज ने भी धर्मसभा को संबोधित किया।