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दिव्य चिंतन::चिता की राख से वसूली,ज़मीन बिहार सरकार की… निर्माण सरकार का और लाभ के हिस्सेदार सदगुरु !-हरीश मिश्र

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आलेख

हरीश मिश्र 

लोकतंत्र की पहचान केवल इस बात से नहीं होती कि सरकार सड़कें, पुल और इमारतें बनाती है। उसकी पहचान इस बात से भी होती है कि जीवन और मृत्यु जैसे सबसे संवेदनशील क्षणों में वह नागरिक के साथ किस रूप में खड़ी दिखाई देती है।

बिहार के पटना स्थित बांसघाट आधुनिक शवदाह गृह का मामला इसी कसौटी पर कई असहज प्रश्न खड़े करता है। लगभग 89 करोड़ रुपये की सार्वजनिक राशि से बने इस अत्याधुनिक परिसर को बिहार सरकार ने मात्र एक रुपये की लीज पर सदगुरु जग्गी वासुदेव द्वारा संचालित ईशा फाउंडेशन ( लाभ रहित मानव संस्थान ) को सौंप दिया। इसके बाद अंतिम संस्कार का शुल्क सामान्य सरकारी शवदाह गृहों की तुलना में कई गुना अधिक हो गया।

सरकार का तर्क है कि आधुनिक सुविधाओं, प्रशिक्षित कर्मचारियों और रखरखाव की लागत अधिक है। संस्था का दावा है कि वह सेवा की भावना से काम कर रही है और भविष्य में गरीबों के लिए निःशुल्क व्यवस्था भी करेगी। यदि ऐसा है तो स्वागत योग्य है। लेकिन प्रश्न यह है कि जिस परियोजना का निर्माण जनता के कर से हुआ, उसका संचालन इस प्रकार क्यों किया गया कि अंतिम संस्कार के लिए भी भारी कीमत चुकानी पड़े ?

यह केवल आर्थिक प्रश्न नहीं, नैतिक प्रश्न भी है। मृत्यु वह क्षण है जब परिवार सबसे अधिक असहाय होता है। उस समय सुविधा के नाम पर अतिरिक्त शुल्क लेना संवेदनशील शासन की अवधारणा से मेल नहीं खाता।

बिहार सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि एक रुपये की लीज का आधार क्या था ? क्या कोई खुली प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया अपनाई गई ? शुल्क निर्धारण किसने किया ? और यदि उद्देश्य सेवा है, तो आम नागरिक को राहत देने की व्यवस्था पहले दिन से क्यों नहीं बनाई गई ?

किसी संस्था का विरोध करना उद्देश्य नहीं है। यदि वह बेहतर प्रबंधन और गरिमापूर्ण अंतिम संस्कार उपलब्ध करा रही है तो उसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन सार्वजनिक संसाधनों पर निजी संचालन का अर्थ यह नहीं हो सकता कि नागरिक की जेब पर अतिरिक्त बोझ डाल दिया जाए।

राज्य का धर्म केवल विकास परियोजनाएं बनाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि उन परियोजनाओं का लाभ आम नागरिक को सुलभ और न्यायपूर्ण शर्तों पर मिले।

श्मशान कभी कमाई का केंद्र नहीं होना चाहिए। वहां मनुष्य अपना सबसे प्रिय संबंध खोकर पहुंचता है। यदि उस अंतिम यात्रा में भी व्यवस्था उसे ग्राहक की तरह देखने लगे, तो यह केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, सामाजिक संवेदनहीनता का संकेत है।

ईशा फाउंडेशन स्वयं को लाभ-रहित मानव सेवा संस्था बताता है। ऐसे में जब सरकार ने करोड़ों रुपये की सार्वजनिक संपत्ति मात्र एक रुपये की लीज पर सौंप दी, तो अंतिम संस्कार को महंगा बनाना कई सवाल खड़े करता है। यदि उद्देश्य सेवा है, तो उसका खर्च संस्था अपने अन्य आय-स्रोतों से भी वहन कर सकती थी। क्या चिता की राख भी कमाई का माध्यम बनेगी?

लोकतंत्र में सरकारों का मूल्यांकन इस बात से भी होगा कि उन्होंने नागरिक के जीवन को कितना सम्मान दिया और उसकी मृत्यु को कितना गरिमामय रहने दिया।

लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार ) हे।

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