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आदिवासी कहाँ हैं हमारे जीवन में ?विचारोत्तेजक विमर्श और देश के पहले आदिवासी टार्ज़न पर फ़िल्म

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राजेश बादल

आदिवासी एक तरह से हमारे पुरखों के ही वंशज हैं। फ़र्क़ यह कि हम तथाकथित सभ्यता का लबादा ओढ़े इमारतों के जंगल में रहने चले आए और वे प्रकृति की गोद में घने जंगलों में रहते रहे। हमने नई संस्कृति के नाम पर तरह तरह के कुटैव पाल लिए और वे निश्छल ,निर्मल जल की तरह समय की धारा में बहते रहे। फिर भी उन्होंने हमारे आधुनिक भारत को अपना लिया ,मगर हम अपने इन पंद्रह करोड़ आदिवासी भाइयों को तहे दिल से अंगीकार नहीं कर सके। इसके बावजूद वे देश के विकास में अपने ढंग से हमारे संग क़दम से क़दम मिलाते हुए साथ चल रहे हैं। इस प्रक्रिया में हम तो अपनी अनेक पुरानी परंपराएँ , आदर्श और नैतिक मूल्य तो भुला बैठे , लेकिन इस आदिवासी विरासत को आधुनिकीकरण के फेर में कहीं खो न दें,जो वे सदियों से सहेज रहे हैं। हमें इस पर मंथन करना ज़रूरी है।


निष्कर्ष के तौर पर यह कुछ बिंदु भारत के इकलौते इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में दो दिन पहले संपन्न आदिवासी साहित्य उत्सव -25 में उभरकर आए। भारत के लगभग सभी प्रदेशों से विद्वान ,आदिवासी साहित्य और उनकी ज़िंदगी के जानकार,विशेषज्ञ इस उत्सव में शिरक़त करने आए थे। तीन दिन चले इस उत्सव में अनेक सत्र हुए। इन स्तरों में विविध जनजातीय विषयों पर विमर्श हुआ। एक सत्र की अध्यक्षता मुझे भी करने का अवसर मिला। इसका विषय था –आदिवासी फ़िल्म निर्माण – स्वर और सरोकार। सत्र में कर्नाटक से डॉक्टर शांता नायक,केरल से श्रीमती ए बिंदु ,बंगाल से डॉक्टर देवयानी मुख़र्जी और मध्यप्रदेश के श्री मुकेश दरबार ने अपने विचार प्रकट किए। बिंदु जी ने आदिवासी मसलों पर अधिक गहराई से काम करने पर ज़ोर दिया तो शांता कुमार ने बंजारा जनजाति की परंपराओं तथा उन पर आधुनिकता के नाम पर हो रहे आक्रमण को रेखांकित किया।

देवयानी ने जानी मानी आदिवासी चित्रकार भूरीबाई पर अपनी फ़िल्म के बारे में बताया तो मुकेश दरबार ने ग़ैर आदिवासी होते हुए भी उनके लिए अपने काम की विस्तार से जानकारी दी।विचार विमर्श के बाद अन्य विद्वान अतिथियों ने अपने प्रश्नोत्तर से सत्र को अत्यंत रोचक बना दिया। इन विद्वानों में जाने माने कवि,लेखक और स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासी समुदाय के योगदान पर गहन शोध करने वाले डॉक्टर सुधीर सक्सेना,शैलचित्रों पर अरसे से काम कर रहीं अंतर्राष्ट्रीय जानकार डॉक्टर मीनाक्षी पाठक,बस्तर के जन जीवन पर अनेक पुस्तकों के लेखक श्री राजीव रंजन तथा आधी सदी से जनजाति विषयों पर प्रामाणिक पुरुष डॉक्टर बसंत निरगुणे समेत अनेक विषय विशेषज्ञ उपस्थित थे।


इसी सत्र में मैंने अपनी फ़िल्म चला गया चेन्द्रू दिखाई। यह फ़िल्म नौ दस साल पहले बनाई गई थी। यह फ़िल्म छत्तीसगढ़ के मुरिया आदिवासी चेन्द्रू और टेम्बू की दोस्ती की दास्तान है। टेम्बू एक बाघ था। चेन्द्रू उसके साथ खेलते खेलते बड़ा हुआ। इस अनूठी दोस्ती पर 1956 में स्वीडन के एक फ़िल्म निर्माता ने फ़िल्म बनाई और करोड़ों रूपए कमाए। बाद में वह चेन्द्रू को अपने साथ स्वीडन ले गया। वहाँ चेन्द्रू और टेम्बू को एक बड़े पिंजरे में रखा गया। लोग उसे टिकट लेकर देखने आते। फ़िल्म निर्माता ने उसे साल भर इसी तरह रखा और बेशुमार दौलत कमाई। क्रूरता देखिए कि वह इन दोनों को फ्लाइट से ले गया ,लेकिन

लौटते समय समंदर के रास्ते पानी के जहाज़ से भेज दिया। खारे पानी के वातावरण में लंबे समय तक रहने के कारण टेम्बू के फेफड़ों में संक्रमण हो गया और वह जहाज़ पर ही बीमार हो गया। उसका इलाज़ कराने में चेन्द्रू असमर्थ था। उसने एक सर्कस मालिक को टेंबू दे दिया। बाद में टेम्बू की सर्कस में मौत हो गई। चेन्द्रू अपने गाँव लौट आया। कोई 45 साल वह गुमनामी में रहा। मैंने उसे 26 साल पहले खोजा और अपने चैनल में दिखाया। इसके बाद देश ने फिर इस आदिवासी महानायक को याद किया। लेकिन प्रदेश सरकार ने उसके लिए कुछ नहीं किया। क़रीब दस साल पहले चेन्द्रू ने गुमनामी में दम तोड़ दिया। इस फ़िल्म का दर्दनाक अंत सबको दुखी कर देता है।यही है हमारी संवेदना का एक क्रूर पक्ष।

मैंने अपने संबोधन में बताया कि राज्य सभा टीवी का एक्ज़ीक्युटिव डायरेक्टर रहते हुए हम लोगों ने आदिवासी जनजीवन पर ; मैं भी भारत – धारावाहिक का निर्माण किया था। यह भारत में आदिवासियों पर अपने किस्म का अनूठा दस्तावेज़ीकरण था। इसके अलावा लगभग 32 आदिवासी जनजातियों के बारे में मैंने वीडियो दस्तावेज़ीकरण किया था और आदिवासी विषयों पर पचास से अधिक मेरी लघु फ़िल्में हैं।मैंने मानव संग्रहालय का आभार माना कि वह इस तरह के आयोजन करता है।उत्सव के आयोजन में संग्रहालय के निदेशक श्री अमिताभ पांडे और उनके सहयोगी डॉक्टर सुधीर श्रीवास्तव तथा हेमंत बहादुर सिंह परिहार की भूमिका सराहनीय हैं।

-लेखक देश के ख्यात वरिष्ठ पत्रकार हें।

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